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by-Ravindra Sikarwar

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए 31 अगस्त से 1 सितंबर तक चीन के तियानजिन शहर का दौरा करेंगे। यह 2018 के बाद उनकी पहली चीन यात्रा होगी। यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिका और भारत के बीच व्यापार को लेकर तनाव अपने चरम पर है। इस यात्रा को भारत-चीन संबंधों को स्थिर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, खासकर 2020 में गलवान घाटी की झड़प के बाद।

अमेरिका के साथ व्यापार तनाव के बीच चीन यात्रा:
यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर 50% तक का टैरिफ लगा दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के इस कदम की आलोचना करते हुए कहा था कि भारत रूस की “युद्ध मशीन” को बढ़ावा दे रहा है। इस व्यापार तनाव के बीच, प्रधानमंत्री मोदी की चीन यात्रा को एक कूटनीतिक संतुलन के रूप में देखा जा रहा है। भारत अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए अमेरिका के दबाव के बावजूद रूस के साथ अपने संबंधों को बनाए रखे हुए है, और अब चीन जैसे शक्तिशाली पड़ोसी के साथ भी संबंधों को सामान्य करने की कोशिश कर रहा है।

SCO शिखर सम्मेलन और द्विपक्षीय वार्ता का महत्व:
SCO, एक यूरेशियाई राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संगठन है जिसमें चीन, भारत, रूस, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे प्रमुख देश शामिल हैं। इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बैठक होने की संभावना है। दोनों नेताओं ने आखिरी बार अक्टूबर 2024 में रूस के कज़ान में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात की थी।

इस बैठक का उद्देश्य सीमा पर तनाव कम करना, व्यापार संबंधों को बहाल करना, और दोनों देशों के बीच सैन्य स्तर पर विश्वास बहाल करने जैसे मुद्दों पर चर्चा करना हो सकता है। यह यात्रा भारत-चीन के बीच रिश्तों को सामान्य बनाने की दिशा में एक अहम मोड़ साबित हो सकती है।

गलवान के बाद पहली यात्रा:
2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़पों के बाद भारत और चीन के संबंधों में काफी कड़वाहट आ गई थी। प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा दोनों देशों के बीच राजनयिक बातचीत को फिर से शुरू करने और भविष्य के संबंधों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यह भारत की उस विदेश नीति को भी दर्शाता है, जिसमें वह विभिन्न भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच अपने हितों को साधने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपना रहा है।

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