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by-Ravindra Sikarwar

नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 2006 के कुख्यात निठारी हत्याकांड से जुड़े अंतिम लंबित मामले में आरोपी सुरेंद्र कोली को बलात्कार और हत्या के आरोपों से बरी कर दिया है। न्यायालय ने कोली की क्षमादान याचिका को स्वीकार करते हुए उनकी सजा को रद्द कर दिया और उन्हें तुरंत जेल से रिहा करने का निर्देश जारी किया है, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में आवश्यक न हो। यह फैसला चीफ जस्टिस बी आर गवई, जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने सुनाया।

यह घटना निठारी कांड के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जहां कोली को पहले कई मामलों में दोषी ठहराया गया था, लेकिन हाल के वर्षों में अधिकांश सजाएं रद्द हो चुकी हैं। इस फैसले से कोली, जो लंबे समय से जेल में बंद थे, अब स्वतंत्र हो सकेंगे।

निठारी हत्याकांड का पृष्ठभूमि:
निठारी हत्याकांड उत्तर प्रदेश के नोएडा स्थित निठारी गांव में 2006 में सामने आया था। 29 दिसंबर 2006 को व्यवसायी मोनिंदर सिंह पंधेर के घर के पीछे एक नाले से आठ बच्चों की हड्डियों की खोज हुई, जिसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। इसके बाद संपत्ति के आसपास की खुदाई में और भी कई कंकाल मिले, जो मुख्य रूप से गरीब परिवारों के लापता बच्चों और युवतियों के थे। स्थानीय इलाके से कई बच्चे और महिलाएं गायब हो चुकी थीं।

पुलिस ने पंधेर और उनके घरेलू नौकर सुरेंद्र कोली को गिरफ्तार किया। उन पर बच्चों और महिलाओं का अपहरण, बलात्कार, हत्या करने और यहां तक कि नरभक्षण (कैनिबलिज्म) के गंभीर आरोप लगे। कोली पर विशेष रूप से लड़कियों की हत्या करने, उनके शवों को खंडित करने और पिछवाड़े में फेंकने का इल्जाम था। कुल 19 प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज की गईं, जो 19 लड़कियों से जुड़ी अपराधों से संबंधित थीं। यह मामला सामाजिक न्याय, गरीबी और पुलिस जांच की कमियों को उजागर करने वाला बना।

इस विशेष मामले का विवरण:
यह फैसला 14 वर्षीय एक लड़की के बलात्कार और हत्या से जुड़े मामले पर आधारित है। सीबीआई की विशेष अदालत ने कोली और पंधेर दोनों को बलात्कार, हत्या और साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ जैसे अपराधों के लिए मौत की सजा सुनाई थी।

ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोली की सजा को बरकरार रखा और मौत की सजा की पुष्टि की, लेकिन पंधेर को बरी कर दिया। कोली ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जिसे 2011 में खारिज कर दिया गया। उनकी पुनर्विचार याचिका भी खारिज हो गई। हालांकि, जनवरी 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोली की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया, क्योंकि राष्ट्रपति के पास दया याचिका के निपटारे में “अनावश्यक विलंब” हुआ था।

अन्य मामलों में बरीआशी:
निठारी कांड से जुड़े कुल मामलों में कोली और पंधेर पर कई मुकदमे चले। अक्टूबर 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोली को 12 मामलों में और पंधेर को दो मामलों में बरी कर दिया था, जहां सीबीआई कोर्ट ने दोनों को मौत की सजा दी थी। पंधेर पर कुल छह मामले थे: तीन में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें बरी किया, एक में हाईकोर्ट ने, और एक में अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम, 1956 के तहत सजा पूरी हो चुकी थी। एक अन्य निठारी मामले में सजा के खिलाफ अपील दायर नहीं की गई।

जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई और पीड़ित परिवारों की इन बरीआशी के खिलाफ अपीलों को खारिज कर दिया। लेकिन कोली इस विशेष मामले की आजीवन कारावास की सजा के कारण जेल में ही रहे। अब यह अंतिम मामला भी बंद हो गया है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला और तर्क:
सुप्रीम कोर्ट ने कोली की क्षमादान याचिका को मंजूर करते हुए उनकी सजा को रद्द कर दिया। पीठ ने कहा कि मामले में साक्ष्य अपर्याप्त थे और जांच में गंभीर खामियां थीं। कोर्ट ने निर्देश दिया कि कोली को तत्काल रिहा किया जाए, जब तक कि कोई अन्य कानूनी बाध्यता न हो।

यह फैसला निठारी पीड़ित परिवारों के लिए झटका है, जिन्होंने न्याय की मांग की थी। कई परिवारों ने पहले ही सीबीआई की जांच पर सवाल उठाए थे, जिसमें प्रारंभिक पुलिस जांच को “लापरवाह” बताया गया। कोली की रिहाई से मामले में नई बहस छिड़ सकती है, लेकिन कानूनी रूप से सभी मुकदमे अब बंद हो चुके हैं।

निठारी कांड ने भारत में बाल सुरक्षा और जांच प्रक्रिया पर बहस छेड़ी थी, और यह फैसला उसकी लंबी कानूनी लड़ाई का अंत दर्शाता है। कोली की रिहाई के बाद सामाजिक और कानूनी प्रभावों पर नजरें टिकी हैं।

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