By: Ravindra Sikarwar
नई दिल्ली: त्योहारों के मौसम में जहां लोग घर बैठे फूड और सामान की त्वरित डिलीवरी पर निर्भर रहते हैं, वहीं गिग वर्कर्स की राष्ट्रव्यापी हड़ताल ने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (IFAT) और तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन (TGPWU) के नेतृत्व में डिलीवरी पार्टनर्स ने 25 दिसंबर (क्रिसमस) और 31 दिसंबर (नए साल की पूर्व संध्या) को अखिल भारतीय हड़ताल का ऐलान किया है। इस हड़ताल से स्विगी, जोमैटो, ब्लिंकिट, जेप्टो, अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसी प्रमुख कंपनियों की सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। विशेष रूप से नए साल की शाम पार्टी के लिए ऑर्डर करने वालों को देरी या रद्दीकरण का सामना करना पड़ सकता है। यूनियनों का कहना है कि यह विरोध लंबे समय से चली आ रही समस्याओं के खिलाफ है, जिसमें कम वेतन, असुरक्षित कामकाजी हालात और सामाजिक सुरक्षा की कमी शामिल है।
हड़ताल का कारण: गिरती कमाई और बढ़ते जोखिम
गिग इकॉनमी में काम करने वाले लाखों डिलीवरी पार्टनर्स पिछले कुछ वर्षों से खराब होती स्थितियों से जूझ रहे हैं। प्लेटफॉर्म कंपनियां तेज डिलीवरी (जैसे 10 मिनट मॉडल) को बढ़ावा दे रही हैं, जिससे सड़क पर दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ गया है। यूनियन नेता शैक सलाउद्दीन ने कहा कि वर्कर्स को अनिश्चित कमाई, एल्गोरिदम आधारित भेदभाव और बिना वजह आईडी ब्लॉक करने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। लंबे काम के घंटे, कोई तय ब्रेक नहीं और दुर्घटना में पर्याप्त बीमा की कमी भी बड़ी शिकायतें हैं।
हाल ही में लागू हुए सोशल सिक्योरिटी कोड (नवंबर 2025) के तहत प्लेटफॉर्म्स को वर्कर्स के लिए फंड में योगदान देना अनिवार्य है, लेकिन यूनियनों का आरोप है कि इसका क्रियान्वयन अभी कमजोर है। कर्नाटक जैसे राज्यों में गिग वर्कर्स के लिए विशेष कानून बने हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव नहीं दिख रहा। इस हड़ताल को यूनियनों ने “न्याय, सम्मान और सुरक्षा” की मांग के रूप में पेश किया है।
प्रमुख मांगें क्या हैं?
डिलीवरी वर्कर्स की मुख्य मांगें इस प्रकार हैं:
- पारदर्शी और उचित वेतन संरचना, जिसमें वास्तविक काम के घंटे और खर्च को ध्यान में रखा जाए।
- 10 मिनट डिलीवरी जैसे खतरनाक मॉडल को तुरंत बंद करना।
- बिना उचित प्रक्रिया के आईडी ब्लॉक करने या पेनल्टी लगाने पर रोक।
- सुरक्षा उपकरण, बेहतर दुर्घटना बीमा और स्वास्थ्य कवर प्रदान करना।
- एल्गोरिदम में भेदभाव खत्म कर बराबर काम का बंटवारा।
- तय ब्रेक, मजबूत ऐप सपोर्ट और प्लेटफॉर्म व ग्राहकों से सम्मानजनक व्यवहार।
- पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ सुनिश्चित करना।
ये मांगें न केवल कंपनियों से बल्कि केंद्र व राज्य सरकारों से भी की गई हैं। यूनियनों ने सरकार से प्लेटफॉर्म्स को सख्ती से रेगुलेट करने और गिग वर्कर्स को यूनियन बनाने का अधिकार देने की अपील की है।
हड़ताल का संभावित असर
क्रिसमस और नए साल की पूर्व संध्या पर ऑर्डरों की बाढ़ आती है। पिछले वर्षों में 31 दिसंबर को रिकॉर्ड ऑर्डर दर्ज किए गए थे। इस बार हड़ताल से बड़े शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और गुरुग्राम में सबसे ज्यादा असर पड़ने की उम्मीद है। कुछ इलाकों में पहले ही देरी और अनुपलब्धता की शिकायतें आई हैं। कंपनियां वैकल्पिक व्यवस्था करने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर भागीदारी से सेवाएं ठप हो सकती हैं।
25 दिसंबर को कुछ शहरों में फ्लैश स्ट्राइक और रैलियां हुईं, जिससे局部 प्रभाव पड़ा। 31 दिसंबर को “मेगा स्ट्राइक” की योजना है, जो ज्यादा व्यापक हो सकती है।
गिग वर्कर्स कौन होते हैं?
गिग वर्कर्स वे फ्रीलांस या ठेके पर काम करने वाले लोग हैं जो ऐप-आधारित प्लेटफॉर्म्स पर डिलीवरी, ट्रांसपोर्ट या अन्य सेवाएं देते हैं। भारत में इनकी संख्या करीब एक करोड़ है। ये नियमित कर्मचारी नहीं होते, इसलिए उन्हें स्थायी नौकरी की सुरक्षा, पेंशन या बीमा जैसे लाभ नहीं मिलते। फिर भी, ये ई-कॉमर्स और फूड डिलीवरी की रीढ़ हैं।
उपभोक्ताओं के लिए सलाह
अगर आप नए साल की पार्टी प्लान कर रहे हैं तो पहले से तैयारी कर लें। 31 दिसंबर को ऑर्डर देने से पहले विकल्प तलाशें या लोकल स्टोर्स से खरीदारी करें। यूनियनों ने आम लोगों से सहयोग की अपील की है, क्योंकि यह लड़ाई बेहतर कामकाजी हालात के लिए है।
यह हड़ताल गिग इकॉनमी की गहरी समस्याओं को उजागर कर रही है। सरकार और कंपनियों को जल्द बातचीत कर समाधान निकालना चाहिए, ताकि लाखों वर्कर्स को न्याय मिले और उपभोक्ताओं को असुविधा न हो। आने वाले दिनों में इस आंदोलन का और विस्तार हो सकता है।
