By: Ravindra Sikarwar
नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चली आ रही व्यापार वार्ता में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। सूत्रों के अनुसार, भारत ने अपना अंतिम प्रस्ताव रख दिया है, जिसमें अमेरिका द्वारा लगाए गए कुल 50 प्रतिशत टैरिफ को घटाकर 15 प्रतिशत करने और रूस से कच्चे तेल की खरीद पर लगी अतिरिक्त 25 प्रतिशत पेनाल्टी को पूरी तरह समाप्त करने की मांग की गई है। यह प्रस्ताव दोनों देशों के बीच चल रही द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। हाल ही में दिल्ली में हुई बैठकों के बाद नए साल में कोई ठोस समझौता होने की संभावना बढ़ गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की सख्त नीतियों के बावजूद बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है।
टैरिफ की वजह और भारत का पक्ष
अमेरिका ने अगस्त 2025 में भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया था, जिसमें 25 प्रतिशत रेसिप्रोकल (पारस्परिक) था और शेष 25 प्रतिशत रूस से तेल आयात करने के लिए दंडात्मक। अमेरिकी पक्ष का तर्क है कि रूसी तेल की खरीद से मॉस्को को यूक्रेन युद्ध जारी रखने में आर्थिक मदद मिल रही है। भारत ने इस पेनाल्टी को अनुचित बताते हुए इसका लगातार विरोध किया है। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि ऊर्जा आयात बाजार आधारित और राष्ट्रीय हितों पर निर्भर होता है, न कि किसी दबाव में।
भारत ने जोर दिया है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देता है और सस्ते स्रोतों से तेल खरीदना उपभोक्ताओं के हित में है। अब अंतिम प्रस्ताव में पेनाल्टी हटाने के साथ-साथ कुल टैरिफ को 15 प्रतिशत तक सीमित करने की मांग रखी गई है, जो भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत देगी। विशेष रूप से कपड़ा, रसायन, समुद्री उत्पाद और अन्य क्षेत्रों को फायदा होगा।
रूसी तेल आयात में आई गिरावट
प्रस्ताव की मजबूती की एक बड़ी वजह रूस से तेल आयात में हालिया कमी है। नवंबर 2025 में अमेरिका ने रोसनेफ्ट और लुकोइल जैसी प्रमुख रूसी कंपनियों पर नए प्रतिबंध लगाए, जिसके बाद भारत का आयात तेजी से घटा। रिपोर्ट्स के अनुसार, नवंबर में औसतन 1.7-1.8 मिलियन बैरल प्रति दिन था, जो दिसंबर में घटकर 1.2-1.3 मिलियन बैरल प्रति दिन रह गया। कुछ अनुमानों में यह और नीचे 0.8-1 मिलियन बैरल तक पहुंचने की संभावना है।
यह गिरावट भारतीय रिफाइनरियों की सतर्कता का नतीजा है, जो प्रतिबंधों से बचने के लिए वैकल्पिक स्रोतों की ओर मुड़ रही हैं। सऊदी अरामको और अबू धाबी जैसी कंपनियों से अतिरिक्त आपूर्ति की बात चल रही है। अमेरिकी पक्ष को यह बदलाव सकारात्मक लग रहा है, जिससे टैरिफ राहत की संभावना बढ़ी है। हालांकि, भारत ने स्पष्ट किया है कि यह कोई स्थायी प्रतिबद्धता नहीं, बल्कि बाजार स्थितियों पर निर्भर है।
व्यापार समझौते की दिशा और उम्मीदें
दोनों देश एक व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) पर काम कर रहे हैं, जिसमें बाजार पहुंच, टैरिफ कम करना और आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करना शामिल है। हाल की बैठकों में कृषि क्षेत्र खोलने जैसे मुद्दों पर मतभेद रहे, लेकिन ऊर्जा और रक्षा सहयोग पर सहमति बढ़ी है। अमेरिकी अधिकारियों ने बातचीत को “सकारात्मक” बताया है, जबकि भारतीय पक्ष टैरिफ राहत को प्राथमिकता दे रहा है।
नए साल में समझौते की घोषणा की उम्मीद है, जो द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य पूरा करने में मदद करेगा। वर्तमान में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार है, लेकिन टैरिफ से भारतीय निर्यात प्रभावित हुआ है। राहत मिलने से अर्थव्यवस्था को नया बल मिलेगा।
आगे की चुनौतियां और रणनीति
ट्रंप प्रशासन की संरक्षणवादी नीतियां वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर रही हैं, लेकिन भारत ने विविधीकरण की रणनीति अपनाई है। न्यूजीलैंड जैसे देशों से नए समझौते और अन्य स्रोतों से ऊर्जा आयात इसी का हिस्सा हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रस्ताव संतुलित है और दोनों पक्षों के हितों को ध्यान में रखता है। अगर अमेरिका सहमत होता है, तो यह रिश्तों में नया अध्याय खोलेगा।
कुल मिलाकर, यह वार्ता न केवल आर्थिक बल्कि भू-राजनीतिक महत्व की है। भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखते हुए व्यापारिक लाभ सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है। आने वाले दिनों में और बैठकें होने की संभावना है, जिनसे अंतिम फैसला निकल सकता है।
