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By: Yogendra Singh

New Delhi : भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए उन्हें ‘पाखंड’ का पर्याय बताया है। हाल ही में विपक्षी दलों द्वारा ‘संविधान खतरे में है’ के नारों पर पलटवार करते हुए प्रसाद ने कहा कि जो नेता देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन राष्ट्रपति का सम्मान नहीं कर सकते, उन्हें संविधान की दुहाई देने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। भाजपा सांसद का यह बयान उस समय आया है जब टीएमसी और भाजपा के बीच पश्चिम बंगाल में प्रशासनिक और संवैधानिक मर्यादाओं को लेकर टकराव चरम पर है।

राष्ट्रपति के सम्मान पर सवाल और विपक्ष की दोहरी राजनीति

New Delhi रविशंकर प्रसाद ने अपने संबोधन में विशेष रूप से राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के संदर्भ में टीएमसी नेताओं की पुरानी टिप्पणियों और ममता बनर्जी के रुख की आलोचना की। उन्होंने कहा कि भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति के प्रति विपक्ष का रवैया हमेशा से नकारात्मक रहा है। प्रसाद के अनुसार, “एक ओर आप (ममता बनर्जी) और आपकी पार्टी के नेता देश के प्रथम नागरिक के खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते हैं, और दूसरी ओर आप हाथ में संविधान की प्रति लेकर लोकतंत्र बचाने का ढोंग करती हैं।”

भाजपा ने इसे विपक्ष की ‘दोहरी राजनीति’ करार दिया है। प्रसाद ने तर्क दिया कि संविधान केवल एक किताब नहीं बल्कि एक जीवंत परंपरा है, जिसका सबसे बड़ा प्रतीक राष्ट्रपति का पद होता है। जब आप उस पद की गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं, तो आप स्वतः ही संविधान का अपमान कर रहे होते हैं।

‘संविधान खतरे में’ बनाम ‘बंगाल में लोकतंत्र की स्थिति’

New Delhi रविशंकर प्रसाद ने ममता बनर्जी के उस विमर्श (Narrative) को भी चुनौती दी जिसमें वह केंद्र सरकार पर संविधान को नष्ट करने का आरोप लगाती हैं। प्रसाद ने सवाल किया कि क्या संदेशखाली जैसी घटनाएं या बंगाल में चुनाव के बाद होने वाली हिंसा संविधान के अनुरूप है? उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में जिस तरह से विपक्षी नेताओं की आवाज दबाई जाती है और राजभवन के साथ निरंतर टकराव की स्थिति बनी रहती है, वह असली संवैधानिक संकट है।

भाजपा सांसद ने तंज कसते हुए कहा कि ‘संविधान खतरे में है’ का नारा केवल उन लोगों के लिए एक ढाल बन गया है जो अपनी प्रशासनिक विफलताओं और भ्रष्टाचार के मामलों से ध्यान भटकाना चाहते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि मोदी सरकार के कार्यकाल में संविधान सुरक्षित है, लेकिन उन लोगों के लिए खतरा जरूर है जो इसे अपनी जागीर समझते आए हैं।

संवैधानिक पदों का राजनीतिकरण और भविष्य की राह

New Delhi लेख के इस अंतिम भाग में प्रसाद ने संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर बात की। उन्होंने ममता बनर्जी को सलाह दी कि वे राजनीति के लिए संवैधानिक मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखा न लांघें। उन्होंने पश्चिम बंगाल में राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच चल रहे ताजा विवाद का जिक्र करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री का आचरण एक राज्य के मुखिया जैसा नहीं, बल्कि एक उग्र राजनेता जैसा हो गया है।

प्रसाद ने निष्कर्ष के तौर पर कहा कि देश की जनता अब इस तरह के ‘चयनात्मक विलाप’ (Selective Outcry) को समझ चुकी है। उन्होंने जोर दिया कि लोकतंत्र में विरोध का स्थान है, लेकिन वह विरोध देश की सर्वोच्च संस्थाओं और उनके प्रमुखों के अपमान की कीमत पर नहीं होना चाहिए। इस राजनैतिक खींचतान ने एक बार फिर केंद्र और राज्यों के बीच के संबंधों और संवैधानिक नैतिकता पर नए सिरे से विचार करने को विवश कर दिया है।

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