by-Ravindra Sikarwar
नेपाल में सरकार के भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ युवाओं के नेतृत्व में व्यापक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, जिन पर भारत करीबी नजर रख रहा है। सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने के फैसले के बाद शुरू हुए इन विरोध प्रदर्शनों में कम से कम 19 लोगों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों लोग घायल हुए हैं। हालांकि, सरकार ने बाद में सोशल मीडिया पर से प्रतिबंध हटा लिया है, लेकिन विरोध प्रदर्शन जारी हैं और अब इनका मुख्य उद्देश्य भ्रष्टाचार और कुशासन को समाप्त करना है।
विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि:
- तात्कालिक कारण: विरोध प्रदर्शनों का तात्कालिक कारण 4 सितंबर को सरकार का 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों, जिनमें फेसबुक, व्हाट्सएप और यूट्यूब भी शामिल हैं, पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय था। सरकार का तर्क था कि इन प्लेटफॉर्मों ने देश में पंजीकरण नहीं कराया था और सरकार की मांगों का पालन करने में विफल रहे थे।
- अंतर्निहित कारण: यह प्रतिबंध सिर्फ एक चिंगारी साबित हुआ। इन विरोध प्रदर्शनों ने सरकार के भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और आर्थिक कठिनाइयों के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन का रूप ले लिया है। यह आंदोलन नेपाल के युवाओं में व्याप्त गहरे असंतोष और गुस्से को दर्शाता है, जो लंबे समय से इन मुद्दों से जूझ रहे हैं।
सरकार की प्रतिक्रिया:
- प्रतिबंध हटाना: प्रारंभिक कार्रवाई, जिसमें प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किया गया और इसके परिणामस्वरूप कई मौतें हुईं, के बाद नेपाल सरकार ने सोशल मीडिया पर से प्रतिबंध हटा लिया।
- सख्त कार्रवाई: विरोध प्रदर्शनों को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षा बलों ने रबर की गोलियों के साथ-साथ असली गोलियों का भी इस्तेमाल किया, जिससे बड़ी संख्या में लोगों की जान गई और सैकड़ों लोग घायल हुए।
भारत का रुख:
भारत, नेपाल के एक करीबी और महत्वपूर्ण पड़ोसी के रूप में, वहां की स्थिति पर बारीकी से नजर रखे हुए है। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं, और नेपाल में स्थिरता भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है।
वर्तमान स्थिति:
सोशल मीडिया पर से प्रतिबंध हटने के बावजूद, सरकार के कुशासन और भ्रष्टाचार को लेकर लोगों का गुस्सा और विरोध प्रदर्शन जारी हैं। यह दिखाता है कि यह आंदोलन केवल सोशल मीडिया के उपयोग की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था, बल्कि यह नेपाल में बेहतर शासन और व्यवस्था की गहरी मांग को दर्शाता है।
