By: Ravindra Sikarwar
लखनऊ: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से प्रेरित अखिल भारतीय साहित्य परिषद के अवध प्रांत इकाई ने राजधानी में एक महत्वपूर्ण चार सत्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में संघ के साहित्यिक तथा वैचारिक योगदान पर गहन मंथन हुआ। बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय सभागार में आयोजित इस सम्मेलन में देशभर से आए विद्वानों, साहित्यकारों और विचारकों ने भाग लिया। मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित नवमनोनीत राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. पवनपुत्र बादल ने संघ की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि संघ ने सनातन धर्म की प्राचीन परंपराओं को संरक्षित रखते हुए उन्हें आधुनिक संदर्भों में आगे बढ़ाया है। उन्होंने वैचारिक क्षेत्र में सक्रिय लोगों से अपील की कि संघ से जुड़े साहित्य पर गहराई से शोध किया जाए और इससे जुड़ी विभिन्न भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास हो।

संगोष्ठी की शुरुआत उद्घाटन सत्र से हुई, जिसमें डॉ. कुमार तरल, राजीव वर्मा वत्सल और द्वारिका प्रसाद रस्तोगी ने स्वागत भाषण दिया तथा वाणी वंदना प्रस्तुत की। प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रांत अध्यक्ष विजय त्रिपाठी ने की। उन्होंने साहित्यकारों को संबोधित करते हुए संघ साहित्य के व्यापक प्रचार-प्रसार पर बल दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत साहित्य की रचना करना आज की जरूरत है और नए कार्यकर्ताओं को संगठन से जोड़ने का काम साहित्य के माध्यम से किया जा सकता है। इस सत्र में डॉ. पवनपुत्र बादल का उनके गृह प्रांत की इकाई द्वारा विशेष अभिनंदन किया गया, जो उनके नवीन दायित्व को देखते हुए काफी उत्साहजनक रहा।
द्वितीय सत्र प्रो. रीता तिवारी की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। इस सत्र में विद्वानों ने संघ से संबंधित विभिन्न पुस्तकों और ग्रंथों पर केंद्रित अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। चर्चा का मुख्य फोकस संघ के विचारकों द्वारा रचित साहित्य पर रहा, जिसमें राष्ट्र निर्माण, संस्कृति संरक्षण और सामाजिक समरसता जैसे विषय प्रमुख थे। विद्वानों ने बताया कि संघ का साहित्य केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने वाला है।
तृतीय सत्र में डॉ. सत्य प्रकाश तिवारी, डॉ. महेंद्र सिंह और आदर्श द्विवेदी ने ‘समग्र चिंतन प्रवाह’ नामक पुस्तक पर आधारित विस्तृत विमर्श किया। इस सत्र में संघ के वैचारिक ढांचे को समझाने पर जोर दिया गया। विद्वानों ने तर्क दिया कि संघ का चिंतन प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा से प्रेरित है और यह आधुनिक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है। उन्होंने संघ साहित्य को राष्ट्र की सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।
समापन सत्र यानी चतुर्थ सत्र में मुख्य अतिथि डॉ. पवनपुत्र बादल ने भविष्य की दिशा पर मार्गदर्शन प्रदान किया। उन्होंने कहा कि साहित्यकारों की जिम्मेदारी है कि वे संघ के योगदान को जन-जन तक पहुंचाएं और गलतफहमियों को दूर करें। संघ ने हमेशा सनातन मूल्यों को जीवंत रखा है और राष्ट्रहित को सर्वोपरि माना है। उनके उद्बोधन ने उपस्थित सभी लोगों को प्रेरित किया। आभार प्रदर्शन सर्वेशम पाण्डेय ‘विभी’ ने किया।
कार्यक्रम में कई प्रमुख साहित्यकार और विद्वान उपस्थित रहे, जिनमें शिवमंगल सिंह मंगल, मनमोहन बाराकोटी, डॉ. एस. के. गोपाल, डॉ. कुमुद पाण्डेय, सुशील वर्मा और ममता पंकज जैसे नाम शामिल थे। यह संगोष्ठी न केवल संघ साहित्य की समृद्धि को उजागर करने में सफल रही, बल्कि साहित्य के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की दिशा में नए संकल्प भी जगाने वाली साबित हुई। अखिल भारतीय साहित्य परिषद जैसी संस्थाएं संघ की वैचारिक विरासत को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। ऐसे आयोजन युवा पीढ़ी को सनातन संस्कृति और राष्ट्रभक्ति से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन सकते हैं।
इस तरह की संगोष्ठियां संघ के शताब्दी वर्ष (2025) के संदर्भ में और भी प्रासंगिक हो जाती हैं, जब संघ अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर रहा है। डॉ. बादल ने अपने संबोधन में इसकी ओर इशारा करते हुए कहा कि संघ का साहित्य और चिंतन आने वाली पीढ़ियों के लिए पाथेय का काम करेगा। कुल मिलाकर, यह आयोजन साहित्यिक जगत में संघ के योगदान को नई ऊर्जा प्रदान करने वाला साबित हुआ।
