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By: Ravindra Sikarwar

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक और बाबरी मस्जिद खुदाई टीम के प्रमुख सदस्य केके मोहम्मद ने एक बार फिर विवादित धार्मिक स्थलों को लेकर खुलकर अपनी राय रखी है। उनका स्पष्ट मत है कि वाराणसी का ज्ञानवापी परिसर और मथुरा की ईदगाह-कृष्ण जन्मभूमि जैसे स्थान हिंदुओं के लिए मक्का-मदीना से कम पवित्र नहीं हैं। इसलिए मुस्लिम समाज को उदारता दिखाते हुए इन दोनों स्थानों पर अपना दावा छोड़ देना चाहिए, ताकि वहाँ भव्य मंदिरों का पुनर्निर्माण हो सके और देश में सदियों पुराना तनाव खत्म हो। केके मोहम्मद का मानना है कि ये दो जगहें हिंदू आस्था के केंद्र बिंदु हैं, जिन्हें लौटाने से पूरे देश में आपसी भाईचारा बढ़ेगा और अयोध्या की तरह शांतिपूर्ण समाधान का रास्ता खुलेगा।

साथ ही, केके मोहम्मद ने हिंदू संगठनों और आम हिंदू समाज को भी संदेश दिया है कि सिर्फ तीन स्थानों – अयोध्या, काशी और मथुरा – को छोड़कर देश की हर मस्जिद पर दावा ठोंकने की होड़ नहीं लगानी चाहिए। उनका कहना है कि अगर हिंदू पक्ष भी हर छोटी-बड़ी मस्जिद के पीछे पड़ गया तो विवाद कभी खत्म नहीं होगा और देश का माहौल हमेशा गरमाया रहेगा। दोनों समुदायों के जिम्मेदार नेताओं को बंद कमरों में बैठकर बात करनी चाहिए, न कि अदालतों या सड़कों पर तमाशा करना चाहिए। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि रामजन्मभूमि विवाद के समय भी मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग समझौते को तैयार था, लेकिन वामपंथी-मार्क्सवादी इतिहासकारों ने जानबूझकर माहौल बिगाड़ दिया था। इरफान हबीब जैसे लोग और जेएनयू का एक खेमा बार-बार तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करता रहा, जिससे सुलह की हर कोशिश नाकाम हो गई।

केके मोहम्मद खुद 1976-77 में पद्मश्री बीबी लाल के नेतृत्व में चली अयोध्या खुदाई का हिस्सा थे और उन्होंने अपनी आँखों से वहाँ मंदिर के अवशेष देखे थे। बाद में वे ASI के उत्तर क्षेत्र के निदेशक भी रहे। उनकी किताबें और साक्षात्कार अक्सर यह साबित करते हैं कि अधिकांश विवादित स्थलों पर मंदिर तोड़कर ही मस्जिदें बनाई गई थीं। इसके बावजूद वे कभी उग्र नहीं हुए, बल्कि हमेशा संवाद और सौहार्द की बात करते रहे। आज भी केरल के कोझिकोड में रहते हुए उन्हें कट्टरपंथी संगठनों से जान से मारने की धमकियाँ मिलती रहती हैं। राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा में उन्हें न्योता मिला था, पर स्वास्थ्य कारणों से वे जा नहीं पाए। फिर भी उनका मानना अटल है कि अगर मुस्लिम समाज काशी और मथुरा को स्वेच्छा से लौटा दे तो यह न केवल हिंदुओं के लिए बड़ा तोहफा होगा, बल्कि पूरे देश के लिए एक नया युग शुरू होगा, जहाँ धर्म के नाम पर खून-खराबा हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।

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