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by-Ravindra Sikarwar

मुंबई: टाटा समूह की परोपकारी संस्था टाटा ट्रस्ट्स से लंबे समय से जुड़े रहे प्रमुख ट्रस्टी मेहली मिस्त्री ने आधिकारिक तौर पर अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। यह फैसला हाल के महीनों में संगठन के भीतर उभरे मतभेदों के बाद आया है, जहां उनकी पुनर्नियुक्ति को लेकर गहन चर्चा हुई थी। मिस्त्री ने अपने इस्तीफे में दिवंगत रतन टाटा के आदर्शों—जैसे पारदर्शिता, नैतिक शासन और सार्वजनिक हित—का जिक्र करते हुए कहा कि वे किसी भी विवाद से ट्रस्ट की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने से बचाना चाहते हैं। उनका यह कदम न केवल टाटा ट्रस्ट्स के आंतरिक संघर्ष को समाप्त करता है, बल्कि समूह की विरासत को मजबूत रखने की दिशा में एक परिपक्व कदम माना जा रहा है।

पृष्ठभूमि: मिस्त्री का टाटा ट्रस्ट्स से गहरा नाता
मेहली मिस्त्री, जो शापूरजी पलोनजी परिवार के सदस्य और पूर्व टाटा सन्स चेयरमैन साइरस मिस्त्री के चचेरे भाई हैं, टाटा ट्रस्ट्स के साथ दशकों से जुड़े हुए थे। 2022 में रतन टाटा के उत्तराधिकार योजना के तहत उन्हें तीन प्रमुख ट्रस्ट्स—सर रतन टाटा ट्रस्ट, सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और बाई हीराबाई जे.एन. टाटा नावसारी चैरिटेबल इंस्टीट्यूशन ट्रस्ट—में ट्रस्टी नियुक्त किया गया था। ये ट्रस्ट्स टाटा सन्स के 66% शेयरों को नियंत्रित करते हैं, जो टाटा स्टील, एयर इंडिया और टाटा मोटर्स जैसी कंपनियों के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

मिस्त्री रतन टाटा के करीबी सहयोगी थे और ट्रस्ट्स की रणनीतिक बैठकों में पर्दे के पीछे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते थे। उन्होंने उच्च शिक्षा, छात्रवृत्ति और सामाजिक कल्याण परियोजनाओं में सक्रिय योगदान दिया, खासकर सर रतन टाटा ट्रस्ट के तहत, जिसका कोष लगभग 5,000 करोड़ रुपये का है। हालांकि, रतन टाटा के निधन (अक्टूबर 2024) के बाद ट्रस्ट्स के चेयरमैन के रूप में नोएल टाटा के नेतृत्व में आंतरिक मतभेद उभरने लगे। मिस्त्री को लाइफटाइम ट्रस्टी के रूप में पुनर्नियुक्त करने का प्रस्ताव अक्टूबर 2024 में पारित हुआ था, लेकिन हालिया घटनाओं ने इसे पटरी से उतार दिया।

विवाद का उदय: पुनर्नियुक्ति पर मतभेद और कानूनी कदम
पिछले कुछ महीनों से टाटा ट्रस्ट्स के भीतर दो गुटों के बीच तनाव बढ़ता जा रहा था। एक ओर नोएल टाटा, उद्योगपति वेणु श्रीनिवासन और पूर्व रक्षा सचिव विजय सिंह जैसे ट्रस्टी थे, जो संगठन की दिशा को लेकर सतर्क रुख अपनाए हुए थे। दूसरी ओर मिस्त्री और उनके समर्थक पारदर्शिता और रतन टाटा की विरासत को बनाए रखने पर जोर दे रहे थे। विशेष रूप से, विजय सिंह की टाटा सन्स बोर्ड में पुनर्नियुक्ति को लेकर विवाद हुआ, जिसके बाद सिंह ने इस्तीफा दे दिया।

अक्टूबर 2025 में यह विवाद चरम पर पहुंच गया। 28 अक्टूबर को हुई बोर्ड बैठक में नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने मिस्त्री की लाइफटाइम ट्रस्टी के रूप में पुनर्नियुक्ति के खिलाफ वोट किया, जिससे उनकी कार्यकाल 27 अक्टूबर को समाप्त हो गया। इससे पहले, मिस्त्री ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के समक्ष एक सावधानीपूर्ण आवेदन (कैविएट) दाखिल किया था, जिसमें कहा गया था कि ट्रस्टी सूची में कोई बदलाव करने से पहले उन्हें सुनवाई का अवसर दिया जाए। इस कदम ने संगठन को कानूनी जटिलताओं की ओर धकेल दिया था, और केंद्र सरकार की नजर भी इस पर पड़ी थी।

ट्रस्ट्स के अन्य सदस्यों—जैसे पूर्व सिटी बैंक इंडिया सीईओ प्रामित झावेरी, वकील डेरियस खंबाटा और परोपकारी जेहांगिर एच.सी. मिस्त्री—ने वेणु श्रीनिवासन की पुनर्नियुक्ति का समर्थन किया था, लेकिन मिस्त्री का मामला अलग हो गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद टाटा समूह की निर्णय लेने की प्रक्रिया को अस्थिर कर सकता था, जो भारत के सबसे बड़े कॉर्पोरेट समूह के लिए हानिकारक होता।

इस्तीफे का पत्र: रतन टाटा के शब्दों के साथ भावुक विदाई
मिस्त्री ने सभी ट्रस्टीज, जिसमें चेयरमैन नोएल टाटा भी शामिल हैं, को संबोधित एक भावपूर्ण पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने अपना इस्तीफा औपचारिक रूप से घोषित किया। पत्र में उन्होंने कहा, “रतन एन. टाटा के प्रति मेरी निष्ठा में यह जिम्मेदारी शामिल है कि टाटा ट्रस्ट्स को किसी विवाद में न धकेला जाए। किसी भी मामले को तेज करने से संगठन की प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है।” उन्होंने आगे जोड़ा, “इसलिए, रतन टाटा की भावना में, जो हमेशा सार्वजनिक हित को अपने से ऊपर रखते थे, मैं आशा करता हूं कि अन्य ट्रस्टीज आगे के कार्यों में पारदर्शिता, अच्छे शासन और सार्वजनिक हित के सिद्धांतों से निर्देशित रहेंगे।”

पत्र का समापन रतन टाटा के एक प्रसिद्ध उद्धरण से किया गया: “मैं विदा लेते हुए वह उद्धरण दोहराता हूं जो श्री रतन एन. टाटा अक्सर मुझसे कहते थे—’कोई भी संस्था जिसकी सेवा करता है, उससे बड़ा नहीं होता।'” यह शब्द न केवल मिस्त्री के व्यक्तिगत जुड़ाव को दर्शाते हैं, बल्कि टाटा समूह की संस्थागत संस्कृति को भी प्रतिबिंबित करते हैं। स्रोतों के अनुसार, यह पत्र मिस्त्री के करीबी लोगों द्वारा एएनआई को साझा किया गया, जिससे सभी अटकलों पर विराम लग गया।

प्रभाव और भविष्य की संभावनाएं:
मिस्त्री का इस्तीफा टाटा ट्रस्ट्स के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। वे अब भी टाटा एजुकेशन एंड डेवलपमेंट ट्रस्ट (टीईडीटी) के बोर्ड में बने रह सकते हैं, लेकिन मुख्य ट्रस्ट्स से उनका जुड़ाव समाप्त हो गया है। यह कदम समूह की एकजुटता को बहाल करने में मदद करेगा, खासकर जब टाटा सन्स के 18% शेयर शापूरजी पलोनजी परिवार के पास हैं, जो साइरस मिस्त्री के निधन (2022) के बाद भी विवादों का केंद्र रहा है।

विश्लेषकों का कहना है कि यह घटना टाटा ट्रस्ट्स की उत्तराधिकार प्रक्रिया को और मजबूत बनाएगी। एक विशेषज्ञ ने टिप्पणी की, “मिस्त्री का फैसला रतन टाटा की विरासत को सम्मान देने वाला है, जो हमेशा संस्था को व्यक्ति से ऊपर रखते थे।” ट्रस्ट्स ने अब तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है, लेकिन स्रोतों के मुताबिक, नोएल टाटा के नेतृत्व में सामान्य कार्यप्रणाली बहाल हो रही है।

यह घटना कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर भी बहस छेड़ती है, जहां परिवारिक संबंधों और संस्थागत हितों का संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण होता है। टाटा ट्रस्ट्स, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास में अरबों रुपये खर्च करता है, आगे भी अपनी परोपकारी भूमिका निभाते रहेंगे। अधिक जानकारी के लिए टाटा ट्रस्ट्स की आधिकारिक वेबसाइट पर संपर्क किया जा सकता है। मेहली मिस्त्री के इस कदम से टाटा समूह के समर्थक उनके योगदान को याद कर रहे हैं, और आशा है कि यह फैसला संगठन को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा।

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