by-Ravindra Sikarwar
मराठा आरक्षण की मांग महाराष्ट्र में एक प्रमुख मुद्दा बनी हुई है, जिसने एक बार फिर सरकार और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। इस आंदोलन के प्रमुख चेहरा, कार्यकर्ता मनोज जरांगे-पाटिल, ने अपनी मांगों को लेकर आंदोलन तेज करने की धमकी दी है, जिससे सरकार पर एक कानूनी ढांचे के भीतर समाधान खोजने का दबाव बढ़ गया है।
आंदोलन का वर्तमान परिदृश्य:
मनोज जरांगे ने हाल ही में एक सार्वजनिक सभा में चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने उनकी मांगों को समय पर पूरा नहीं किया तो वे अपना विरोध और भी उग्र करेंगे। उनका कहना है कि मराठा समुदाय को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में कुणबी जाति के तहत आरक्षण दिया जाए। जरांगे का तर्क है कि मराठा कुणबी हैं और उन्हें ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए।
इस मांग को लेकर उन्होंने पहले भी बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन और भूख हड़ताल की है, जिससे राज्य में राजनीतिक और सामाजिक माहौल काफी गरमा गया था।
सरकार के सामने चुनौतियां:
राज्य सरकार के लिए यह मुद्दा बेहद जटिल है। सरकार ने मराठा समुदाय को आरक्षण देने के लिए कई प्रयास किए हैं, लेकिन ये सभी न्यायिक चुनौतियों का सामना कर चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही 2021 में मराठा आरक्षण को असंवैधानिक करार दिया था, यह कहते हुए कि यह 50% की आरक्षण सीमा का उल्लंघन करता है।
अब, सरकार के सामने दोहरी चुनौती है:
- कानूनी ढांचा: सरकार को एक ऐसा समाधान खोजना होगा जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप हो और कानूनी रूप से टिकाऊ हो।
- सामाजिक संतुलन: मराठा समुदाय को ओबीसी श्रेणी में शामिल करने से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) समुदायों में विरोध पैदा हो सकता है, जिससे राज्य में सामाजिक तनाव बढ़ने की संभावना है।
संभावित समाधान और आगे की राह:
सरकार इस मुद्दे पर एक कमीशन का गठन करने और मराठा समुदाय की सामाजिक और शैक्षिक स्थिति का अध्ययन करने पर विचार कर रही है ताकि आरक्षण के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया जा सके। हालांकि, जरांगे और उनके समर्थक तत्काल समाधान की मांग कर रहे हैं और किसी भी देरी को स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं।
यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार किस तरह से इस संवेदनशील मुद्दे को संभालती है और क्या वह एक ऐसा रास्ता निकाल पाती है जो आंदोलनकारियों को संतुष्ट करे और कानूनी रूप से भी स्वीकार्य हो।
