By: Ravindra Sikarwar
छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को एक और मजबूती मिली है। सुकमा जिले के घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों में गुरुवार सुबह सुरक्षाबलों और माओवादियों के बीच हुई भीषण मुठभेड़ में तीन नक्सली मारे गए। इनमें एक महिला माओवादी भी शामिल है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, मारे गए नक्सलियों के शव बरामद कर लिए गए हैं और कुछ हथियार भी जब्त किए गए हैं। सर्च ऑपरेशन अभी भी जारी है, जिससे और नक्सलियों के मारे जाने या घायल होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
यह मुठभेड़ सुकमा जिले के गोलापल्ली थाना क्षेत्र के जंगलों में हुई। सूत्रों के मुताबिक, खुफिया जानकारी के आधार पर डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) की टीम ने इलाके में सर्चिंग शुरू की थी। सुबह के समय जब जवान एक पहाड़ी पर पहुंचे, तो वहां छिपे बैठे माओवादियों ने अचानक फायरिंग शुरू कर दी। जवानों ने तुरंत जवाबी कार्रवाई की और मोर्चा संभाल लिया। दोनों पक्षों से रुक-रुक कर गोलीबारी चली, जो काफी देर तक जारी रही। इस दौरान तीन माओवादी मारे गए।
सुकमा के पुलिस अधीक्षक किरण चव्हाण ने इस घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि मुठभेड़ स्थल से तीन शव बरामद हुए हैं, जिनमें एक महिला का भी है। साथ ही कुछ हथियार और गोला-बारूद भी मिले हैं। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन अभी पूरा नहीं हुआ है और अतिरिक्त बलों को इलाके में तैनात किया गया है ताकि कोई नक्सली भाग न सके। पूरे क्षेत्र में सतर्कता बढ़ा दी गई है।
मारे गए नक्सलियों की पहचान किस्टाराम एरिया कमेटी के सदस्यों के रूप में हुई है। इनमें माड़वी जोगा (उर्फ मुन्ना या जगत), सोढ़ी बंड़ी और नुप्पो बाजनी (महिला) शामिल हैं। ये सभी एरिया कमेटी मेंबर (एसीएम) रैंक के थे और नक्सली संगठन में सक्रिय भूमिका निभाते थे। इन पर कई आपराधिक मामले दर्ज थे और ये इलाके में सुरक्षाबलों पर हमले और आईईडी लगाने जैसे कार्यों में शामिल रहे थे। इनकी मौत से किस्टाराम एरिया कमेटी को बड़ा झटका लगा है, जो बस्तर के दक्षिणी हिस्से में माओवादी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र मानी जाती है।
यह कार्रवाई केंद्र सरकार के ‘मिशन 2026’ का हिस्सा है, जिसके तहत मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य रखा गया है। गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार इस अभियान पर जोर दिया है और छत्तीसगढ़ को नक्सल मुक्त बनाने के लिए विशेष रणनीति अपनाई जा रही है। बस्तर संभाग में डीआरजी, सीआरपीएफ की कोबरा यूनिट और अन्य बलों की संयुक्त टीमें लगातार ऑपरेशन चला रही हैं। इस साल छत्तीसगढ़ में अब तक 284 नक्सलियों को मुठभेड़ में मार गिराया जा चुका है, जिनमें से अधिकांश बस्तर के सात जिलों (सुकमा, बीजापुर, दंतेवाड़ा आदि) से हैं।
नक्सलवाद छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाकों में लंबे समय से चुनौती बना हुआ है। माओवादी विकास कार्यों को बाधित करने, सुरक्षाबलों पर हमले करने और स्थानीय लोगों को डराने-धमकाने का काम करते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षाबलों की सक्रियता से नक्सली संगठन कमजोर पड़ रहा है। कई नक्सली सरेंडर कर रहे हैं और उनके हथियारों की बरामदगी बढ़ रही है। सुकमा जैसे संवेदनशील जिलों में सड़कें, स्कूल और अस्पताल जैसी सुविधाएं पहुंचाई जा रही हैं, जिससे स्थानीय लोग मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं।
यह सफलता सुरक्षाबलों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। डीआरजी के जवान, जो ज्यादातर स्थानीय आदिवासी युवा हैं और पूर्व नक्सलियों को शामिल कर बनाई गई यूनिट है, जंगल की भौगोलिक स्थिति को अच्छी तरह समझते हैं। उनकी बहादुरी और खुफिया जानकारी ने इस ऑपरेशन को सफल बनाया। राज्य सरकार और केंद्र की नीतियों से नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की गति तेज हुई है, जिससे माओवादियों का जनसमर्थन कम हो रहा है।
फिलहाल इलाके में शांति बहाल करने के प्रयास जारी हैं। सुरक्षाबल पूरी मुस्तैदी से काम कर रहे हैं ताकि नक्सलवाद की जड़ें पूरी तरह खत्म हो सकें। यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि संगठित और सूचना आधारित कार्रवाई से नक्सल समस्या पर काबू पाया जा सकता है। आने वाले दिनों में ऐसे ऑपरेशन और तेज होने की उम्मीद है, जिससे छत्तीसगढ़ जल्द ही नक्सल मुक्त राज्य बन सके।
