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By: Ravindra Sikarwar

25 दिसंबर को महान स्वतंत्रता सेनानी, दूरदर्शी शिक्षाविद् और समाज सुधारक पंडित मदन मोहन मालवीय की जयंती मनाई जाती है। उन्हें राष्ट्र ने श्रद्धापूर्वक ‘महामना’ की उपाधि दी, जो उनके व्यापक व्यक्तित्व का प्रतीक है। राजनीति, शिक्षा, संस्कृति और समाज सुधार के क्षेत्र में उनके योगदान ने भारतीय इतिहास में अमिट छाप छोड़ी है। आज भी उनके विचार और कार्य युवा पीढ़ी को प्रेरित करते हैं, खासकर शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का आधार मानने की उनकी सोच।

जीवन परिचय और प्रारंभिक संघर्ष
पंडित मदन मोहन मालवीय का जन्म 25 दिसंबर 1861 को प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता पंडित ब्रजनाथ संस्कृत विद्वान और भगवत कथा वाचक थे। बचपन से ही मालवीय जी ने संस्कृत और धार्मिक ग्रंथों का गहन अध्ययन किया। उन्होंने इलाहाबाद के धर्म ज्ञानोपदेश पाठशाला में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और बाद में म्योर सेंट्रल कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल की।

आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की और शुरुआत में शिक्षक के रूप में कार्य किया। बाद में उन्होंने वकालत अपनाई और इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की। लेकिन उनका मन सार्वजनिक जीवन की ओर अधिक आकर्षित था। 1886 में कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में भाग लेकर उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। वे चार बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए – 1909 (लाहौर), 1918 (दिल्ली), 1930 और 1932 में। महात्मा गांधी ने उन्हें ‘महामना’ की उपाधि दी, जबकि रवींद्रनाथ टैगोर और डॉ. एस. राधाकृष्णन ने भी उनके योगदान की सराहना की।

स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
मालवीय जी स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख स्तंभ थे। वे नरम दल के नेता थे, लेकिन असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। उन्होंने गिरमिटिया मजदूरी प्रथा (इंडेंटर्ड लेबर) को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे ब्रिटिश उपनिवेशों में भारतीय मजदूरों की स्थिति सुधरी। गंगा की रक्षा के लिए 1905 में गंगा महासभा की स्थापना की और 1916 में अविरल गंगा रक्षा समझौता करवाया।

वे हिंदू महासभा के संस्थापक सदस्य थे और साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए प्रयासरत रहे। हरिजन उत्थान और छुआछूत उन्मूलन में भी उनका योगदान उल्लेखनीय है। 2014 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी योगदान
मालवीय जी का सबसे बड़ा और स्थायी योगदान शिक्षा के क्षेत्र में है। वे मानते थे कि राष्ट्र की प्रगति शिक्षित नागरिकों पर निर्भर है। उनका शिक्षा दर्शन समग्र विकास पर आधारित था – शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक। वे शिक्षा को केवल नौकरी का साधन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, विवेक जागरण और राष्ट्रभक्ति की प्रक्रिया मानते थे।

उन्होंने स्पष्ट कहा था कि जनकल्याण और राष्ट्र उत्थान के लिए शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने पर जोर दिया, क्योंकि उनका मानना था कि स्थानीय भाषाओं में शिक्षा अधिक सुलभ और प्रभावी होगी। वे प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य और निःशुल्क बनाने के पक्षधर थे।

उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की स्थापना है। 1916 में स्थापित यह विश्वविद्यालय एशिया का सबसे बड़ा आवासीय विश्वविद्यालय है, जहां कला, विज्ञान, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, कृषि आदि सभी विषयों की शिक्षा दी जाती है। मालवीय जी ने इसे प्राचीन भारतीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का संगम बनाने का सपना देखा था। वे 1919 से 1938 तक इसके कुलपति रहे। बीएचयू आज भी उनके दर्शन को जीवंत रखे हुए है।

इसके अलावा, वे भारत में स्काउट एंड गाइड आंदोलन के संस्थापकों में से एक थे और हिंदी पत्रकारिता को बढ़ावा देने के लिए हिंदुस्तान टाइम्स के हिंदी संस्करण की शुरुआत की।

आज के संदर्भ में प्रासंगिकता
आज के दौर में, जब शिक्षा व्यावसायिकता की ओर झुक रही है, मालवीय जी के विचार हमें याद दिलाते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य निर्माण और राष्ट्र सेवा होना चाहिए। उनकी मातृभाषा में शिक्षा की वकालत आज राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्रतिबिंबित होती है। सामाजिक सद्भाव, संस्कृति संरक्षण और राष्ट्रप्रेम उनके जीवन के मूल मंत्र थे, जो वर्तमान भारत के लिए उतने ही प्रासंगिक हैं।

महामना का जीवन हमें सिखाता है कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में कार्य करना ही सच्ची सफलता है। उनकी जयंती पर हमें उनके आदर्शों को अपनाने का संकल्प लेना चाहिए।

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