By: Ravindra Sikarwar
ग्वालियर शहर के तेजी से बढ़ते महलगांव क्षेत्र और उसके आसपास की पचास हजार से अधिक आबादी के लिए प्रस्तावित अंडरपास लंबे समय से चर्चा में है, लेकिन जमीनी स्तर पर अब तक इसका निर्माण शुरू नहीं हो सका है। हैरानी की बात यह है कि इस परियोजना के लिए टेंडर प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, भूमिपूजन भी किया जा चुका है, इसके बावजूद काम आगे नहीं बढ़ पाया है। वजह साफ है—निर्माण के लिए आवश्यक जमीन और विभागीय अनुमतियों का अभाव।
महलगांव अंडरपास को शहर की यातायात व्यवस्था सुधारने की दिशा में एक अहम परियोजना माना जा रहा है। इस क्षेत्र में लगातार बढ़ रही आबादी, नए रिहायशी कॉलोनियों और व्यावसायिक गतिविधियों के चलते सड़क पर वाहनों का दबाव तेजी से बढ़ा है। रेलवे क्रॉसिंग और मुख्य मार्ग पर लगने वाले जाम से लोगों को रोजाना लंबा इंतजार करना पड़ता है। अंडरपास बनने से न केवल यातायात सुगम होता, बल्कि स्कूल, अस्पताल और दफ्तर जाने वाले हजारों लोगों को राहत मिलती।
परियोजना की सबसे बड़ी अड़चन एजी (महालेखाकार) कार्यालय से जुड़ी जमीन को लेकर है। अंडरपास के प्रस्तावित मार्ग में एजी ऑफिस की भूमि आ रही है, जिसके उपयोग के लिए संबंधित विभाग से अनुमति आवश्यक है। लंबे समय से पत्राचार और बैठकों का दौर चल रहा है, लेकिन अब तक अंतिम स्वीकृति नहीं मिल पाई है। बिना इस अनुमति के निर्माण कार्य आगे बढ़ाना संभव नहीं है।
दूसरी ओर, अंडरपास के लिए कुछ निजी जमीनों के अधिग्रहण की भी जरूरत है। प्रशासन की योजना के अनुसार इन जमीनों को अधिग्रहित कर मुआवजा दिया जाना था, लेकिन जमीन मालिकों से सहमति नहीं बन पाई है। कहीं मुआवजे की राशि को लेकर असहमति है, तो कहीं कानूनी प्रक्रियाओं के कारण मामला अटका हुआ है। नतीजतन, निजी भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया भी अधूरी बनी हुई है।
स्थानीय लोगों में इस देरी को लेकर गहरी नाराजगी है। उनका कहना है कि वर्षों पहले जिस परियोजना की घोषणा की गई थी, वह अब तक सिर्फ फाइलों और बैठकों तक सीमित है। टेंडर और भूमिपूजन होने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि जल्द ही निर्माण कार्य शुरू होगा, लेकिन अब स्थिति जस की तस बनी हुई है। रोजाना लगने वाले जाम और दुर्घटनाओं के खतरे से लोग परेशान हैं।
नगर निगम और लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों का कहना है कि जैसे ही जमीन और अनुमति से जुड़ी समस्याएं सुलझेंगी, निर्माण कार्य शुरू कर दिया जाएगा। अधिकारियों के अनुसार, परियोजना को लेकर सरकार गंभीर है और प्रयास किए जा रहे हैं कि एजी ऑफिस से आवश्यक अनुमति जल्द मिल सके। साथ ही, निजी जमीन अधिग्रहण के लिए भी जमीन मालिकों से बातचीत जारी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इन अड़चनों को दूर नहीं किया गया, तो परियोजना की लागत भी बढ़ सकती है। निर्माण में देरी का सीधा असर बजट पर पड़ता है, जिससे भविष्य में अतिरिक्त धन की जरूरत पड़ सकती है। इसके अलावा, आम जनता को होने वाली असुविधा अलग है।
कुल मिलाकर, महलगांव अंडरपास परियोजना फिलहाल प्रक्रियागत उलझनों का शिकार बनी हुई है। एक तरफ शहर की बढ़ती जरूरतें हैं, तो दूसरी ओर अनुमति और जमीन से जुड़े मसले। अब देखना यह है कि प्रशासन इन बाधाओं को कितनी जल्दी दूर कर पाता है और कब इस महत्वपूर्ण अंडरपास का सपना हकीकत में बदल पाता है।
