By: Ravindra Sikarwar
मध्य प्रदेश की डॉ. मोहन यादव सरकार के दो वर्ष पूरे होने पर जहां विभागीय उपलब्धियां गिनाई जा रही हैं, वहीं राज्य की वित्तीय स्थिति पर सवाल उठ रहे हैं। वित्त विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 तक प्रदेश पर कुल **कर्ज 4.65 लाख करोड़ रुपये** हो चुका है, जो वित्त वर्ष 2025-26 के कुल बजट 4.21 लाख करोड़ रुपये से करीब 44 हजार करोड़ अधिक है। चालू वित्त वर्ष में ही सरकार ने लगभग 49,600 करोड़ रुपये का नया ऋण लिया है, यानी औसतन रोजाना करीब 125 करोड़ रुपये का कर्ज। यह स्थिति वित्तीय अनुशासन और दीर्घकालिक स्थिरता पर बहस छेड़ रही है।
कर्ज की बढ़ती राशि और दैनिक औसत
सरकार के कार्यकाल में कर्ज की रफ्तार तेज रही है। वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने विभागीय उपलब्धियों में इसे भी शामिल किया, इसे पूंजीगत निवेश का हिस्सा बताया। विभाग का तर्क है कि कर्ज राज्य की संपत्तियां बढ़ाने के लिए लिया जाता है और हर बार अधिसूचना में स्पष्ट किया जाता है कि यह पूंजीगत व्यय के लिए है। अधिकारी बताते हैं कि ये धनराशि बांधों, नहरों, सड़कों, भवनों, ऊर्जा क्षेत्र और सहकारी संस्थाओं में निवेश के रूप में उपयोग हो रही है, जो भविष्य में राजस्व उत्पन्न करेंगी। अपर मुख्य सचिव मनीष रस्तोगी ने कहा कि विकसित देश भी विकास के लिए कर्ज लेते हैं और मध्य प्रदेश में स्थायी संपत्तियां खड़ी हो रही हैं। यदि कर्ज बंद हुआ तो विकास कार्य ठप हो जाएंगे।
लाड़ली बहना योजना का वित्तीय दबाव
राज्य की प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं में लाड़ली बहना सबसे महंगी है। मासिक सहायता राशि 1250 रुपये से बढ़ाकर 1500 रुपये कर दी गई, जिससे मासिक व्यय 1540 करोड़ से बढ़कर करीब 1850 करोड़ रुपये हो गया। सरकार ने 2028 तक इसे 3000 रुपये प्रति माह करने का वादा किया है और मुख्यमंत्री ने भविष्य में 5000 रुपये की इच्छा भी जताई है। यह योजना सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका बढ़ता बोझ राजस्व और कर्ज के बीच असंतुलन पैदा कर रहा है।
सरकार का पक्ष: निवेश और विकास दर
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने विधानसभा के विशेष सत्र में कहा कि पिछले दो वर्षों में राज्य ने 14-15 प्रतिशत की विकास दर हासिल की है। उनका दावा है कि कर्ज का बड़ा हिस्सा पिछली सरकारों से विरासत में मिला था। वित्त मंत्री देवड़ा ने इसे गर्व का विषय बताया, कहा कि हर कर्ज का ब्याज समय पर चुकाया जा रहा है और यह राज्य के पूंजीगत विकास के लिए आवश्यक निवेश है। विभाग का कहना है कि सरकारी संपत्तियों का मूल्य देनदारियों से कई गुना अधिक है, हालांकि इसका कोई सार्वजनिक मूल्यांकन नहीं किया गया।
उठते सवाल और पारदर्शिता की कमी
विशेषज्ञों और विपक्ष का मानना है कि जब कुल कर्ज बजट से अधिक हो जाए तो यह चिंता का विषय है। रोजाना 125 करोड़ का कर्ज राजस्व व्यय संतुलन की कमजोरी दर्शाता है। लोक कल्याण योजनाओं के लिए दीर्घकालिक फंडिंग प्लान की कमी और संपत्तियों के मूल्यांकन का सार्वजनिक न होना पारदर्शिता पर सवाल उठाता है। पूंजीगत व्यय से संपत्तियां बनती हैं, लेकिन अत्यधिक कर्ज भविष्य की पीढ़ियों पर बोझ डाल सकता है।
मध्य प्रदेश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, लेकिन कर्ज प्रबंधन और राजस्व स्रोतों को मजबूत करने की जरूरत है। सरकार इसे विकास का ईंधन बता रही है, जबकि आलोचक वित्तीय जोखिम चेतावनी दे रहे हैं। आने वाले समय में देखना होगा कि यह निवेश कितना फायदेमंद साबित होता है और राज्य की वित्तीय सेहत कैसे सुधारती है।
