by-Ravindra Sikarwar
इंदौर: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में भारतीय रेलवे को ‘सिस्टेमिक फेल्योर’ (व्यवस्थागत विफलता) का दोषी मानते हुए ट्रेन की चपेट में आने से तीन व्यक्तियों की मौत के लिए उत्तरदायी ठहराया है। कोर्ट ने रेलवे को मृतकों के परिजनों को कुल 18 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है, साथ ही रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर खामियों पर कड़ी टिप्पणी की है।
यह मामला 2018 का है, जब इंदौर-उज्जैन रेलखंड पर स्थित एक अनधिकृत क्रॉसिंग पर तीन लोग ट्रेन की चपेट में आकर मारे गए थे। पीड़ितों में दो युवक और एक महिला शामिल थे, जो स्थानीय गांव के निवासी थे। हादसा उस समय हुआ जब वे रेलवे ट्रैक पार कर रहे थे और तेज रफ्तार ट्रेन ने उन्हें कुचल दिया। मृतकों के परिवारों ने रेलवे के खिलाफ मुकदमा दायर किया, जिसमें दावा किया गया कि रेलवे ने क्रॉसिंग पर कोई चेतावनी बोर्ड, गेटमैन या बैरियर नहीं लगाया था, जिसके कारण यह दुर्घटना हुई।
जस्टिस विवेक रुसिया और जस्टिस वीके गुप्ता की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान रेलवे की दलीलों को खारिज कर दिया। रेलवे ने तर्क दिया था कि ट्रैक पर चलना अवैध है और पीड़ितों की लापरवाही के कारण हादसा हुआ। लेकिन कोर्ट ने कहा कि रेलवे की जिम्मेदारी केवल ट्रेन चलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यात्रियों और स्थानीय निवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उसका कर्तव्य है। कोर्ट ने पाया कि उक्त क्रॉसिंग पर वर्षों से लोग आवागमन कर रहे थे, लेकिन रेलवे ने कोई स्थायी समाधान जैसे अंडरपास, ओवरब्रिज या गेट नहीं बनाया।
कोर्ट की टिप्पणी में कहा गया, “यह एक सिस्टेमिक फेल्योर है। रेलवे जानबूझकर ऐसी क्रॉसिंग्स को अनदेखा करता रहा है, जहां रोजाना सैकड़ों लोग ट्रैक पार करते हैं। केवल चेतावनी बोर्ड लगाना या कानूनी रूप से ट्रैक पर चलने को प्रतिबंधित करना पर्याप्त नहीं है। रेलवे को सक्रिय रूप से सुरक्षा उपाय करने चाहिए।” बेंच ने रेलवे के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि मध्य प्रदेश में ही हजारों ऐसी अनधिकृत क्रॉसिंग्स हैं, जहां हर साल दर्जनों मौतें होती हैं, लेकिन सुधार के नाम पर कुछ नहीं किया जाता।
मुआवजे के बंटवारे में कोर्ट ने प्रत्येक मृतक के परिजनों को 6 लाख रुपये देने का निर्देश दिया, जिसमें ब्याज भी शामिल है। यह राशि रेलवे को तीन महीने के अंदर जमा करानी होगी। कोर्ट ने रेल मंत्रालय को भी निर्देश दिए कि पूरे राज्य में ऐसी खतरनाक क्रॉसिंग्स की पहचान कर 2 वर्षों के अंदर स्थायी सुरक्षा व्यवस्था लागू की जाए, जैसे फुट ओवरब्रिज या मैनेड गेट।
यह फैसला रेलवे की सुरक्षा नीतियों पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है और भविष्य में मामलों में पीड़ितों को राहत दिलाने का आधार बनेगा। रेलवे ने अभी तक इस फैसले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन सूत्रों के अनुसार अपील पर विचार किया जा रहा है।
