By: Ravindra Sikarwar
नई दिल्ली: संसद के शीतकालीन सत्र में गुरुवार को लोकसभा का माहौल पूरी तरह से गरमा गया। केंद्र सरकार द्वारा पेश किया गया विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक 2025, जिसे संक्षिप्त रूप से VB-G RAM G बिल या लोकप्रिय भाषा में ‘जी राम जी’ बिल कहा जा रहा है, ध्वनिमत से पारित हो गया। यह विधेयक महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) की जगह लेगा और ग्रामीण परिवारों को सालाना 125 दिनों का गारंटीड रोजगार प्रदान करने का प्रावधान करता है। हालांकि, विधेयक के पारित होने की प्रक्रिया विपक्ष के तीव्र विरोध और सदन में जबरदस्त हंगामे के बीच पूरी हुई।
विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस, ने इसे मनरेगा की मूल भावना पर हमला करार दिया। विपक्ष का मुख्य आरोप था कि सरकार महात्मा गांधी का नाम हटाकर राष्ट्रपिता का अपमान कर रही है और ग्रामीण रोजगार की गारंटी को कमजोर बना रही है। सदन में विपक्षी सांसदों ने जोरदार नारेबाजी की, अपनी सीटों से उठकर वेल में आ गए और विधेयक की प्रतियां फाड़कर स्पीकर की कुर्सी की ओर फेंक दीं। हालात इतने बिगड़ गए कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को बार-बार सदन को शांत करने की अपील करनी पड़ी। हंगामे के कारण कार्यवाही कई बार बाधित हुई, लेकिन अंततः विधेयक पारित हो गया। पारित होने के तुरंत बाद सदन की कार्यवाही शुक्रवार सुबह 11 बजे तक स्थगित कर दी गई।
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विधेयक पर सरकार की ओर से जवाब देते हुए विपक्ष के आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि यह विधेयक ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर और समृद्ध बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। मनरेगा में पहले केवल 100 दिनों का रोजगार था, जबकि नए कानून में इसे बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है। शिवराज ने विपक्ष, विशेष रूप से कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि मूल रूप से यह योजना सिर्फ नरेगा थी, लेकिन 2009 के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर वोट बैंक की राजनीति के लिए महात्मा गांधी का नाम जोड़ा गया था। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार का इरादा किसी मौजूदा योजना को खत्म करना नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आजीविका को और मजबूत बनाना है। मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि महात्मा गांधी के आदर्श सरकार के दिल में बसते हैं और यह विधेयक गांधीजी के ग्राम स्वराज के सपने को साकार करने वाला है।
विधेयक पर बहस बुधवार से शुरू हुई थी और कुल मिलाकर करीब 14 घंटे तक चली। इस दौरान 98 सांसदों ने अपने विचार रखे। विपक्ष ने लगातार मांग की कि विधेयक को स्थायी समिति (स्टैंडिंग कमिटी) को भेजा जाए ताकि इसके प्रावधानों पर विस्तृत परीक्षण हो सके। विपक्ष का कहना था कि नया कानून मनरेगा की मांग-आधारित (डिमांड-ड्रिवन) प्रकृति को बदलकर आपूर्ति-आधारित (सप्लाई-ड्रिवन) बना देगा, जिससे ग्रामीण मजदूरों के अधिकार कमजोर होंगे। इसके अलावा, फंडिंग का बोझ राज्यों पर डालने और कृषि के पीक सीजन में योजना को रोकने जैसे प्रावधानों पर भी तीव्र आपत्ति जताई गई।
दूसरी ओर, सत्तापक्ष ने विधेयक को ग्रामीण विकास की नई दिशा बताया। उनका तर्क था कि पिछले दो दशकों में ग्रामीण भारत में बड़े बदलाव आए हैं और अब पुरानी योजना की जगह एक आधुनिक, पारदर्शी और तकनीक-आधारित फ्रेमवर्क की जरूरत है। नए विधेयक में एआई और मोबाइल ऐप जैसी तकनीकों का उपयोग अनिवार्य किया गया है, जिससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा और मजदूरी का भुगतान तेजी से होगा। साथ ही, जल संरक्षण, इंफ्रास्ट्रक्चर और आजीविका सृजन जैसे क्षेत्रों पर फोकस बढ़ाया गया है।
विधेयक के पारित होने के बाद विपक्षी सांसदों ने संसद परिसर में महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास प्रदर्शन किया। उन्होंने बैनर और तख्तियां लेकर नारे लगाए कि ‘मनरेगा बचाओ, गांधीजी का अपमान बंद करो’। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने घोषणा की कि इस मुद्दे को वे संसद से बाहर सड़कों तक ले जाएंगे।
यह विधेयक अब राज्यसभा में जाएगा, जहां भी विपक्ष के कड़े विरोध की संभावना है। कुल मिलाकर, यह घटना संसद के शीतकालीन सत्र की सबसे गरमागरम बहसों में से एक बन गई है, जो ग्रामीण रोजगार, राजनीतिक विरासत और विकास के मॉडल पर गहरे मतभेदों को उजागर करती है। ग्रामीण भारत की लाखों परिवारों की आजीविका से जुड़ा यह मुद्दा आने वाले दिनों में और चर्चा में रहेगा।
