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by-Ravindra Sikarwar

दिल्ली: आज जिसे हम भारत की राजधानी के रूप में जानते हैं, उसकी कहानी सिर्फ कुछ सदियों पुरानी नहीं बल्कि लगभग तीन हज़ार वर्षों से भी अधिक पुरानी है। पुरातत्वविदों, इतिहासकारों और विभिन्न ग्रंथों में दर्ज प्रमाण बताते हैं कि यह शहर केवल राजनीतिक सत्ता का केंद्र ही नहीं रहा बल्कि यहाँ की धरती पर कई सभ्यताओं का उत्थान और पतन हुआ। दिल्ली की ज़मीन जैसे-जैसे खुदाई में खुलती जाती है, वैसे-वैसे यह परत दर परत अपनी प्राचीनता और रहस्यों को उजागर करती जाती है।

प्रारंभिक सभ्यता की झलक:
दिल्ली के आस-पास हुए पुरातात्विक उत्खननों से यह स्पष्ट होता है कि यहाँ की सभ्यता हड़प्पा-उत्तर काल से जुड़ी हुई थी। पुराना किला (पुराना क़िला या इन्द्रप्रस्थ क्षेत्र) से मिली हुई मिट्टी के बर्तन, सिक्के और हड्डियों के अवशेष बताते हैं कि यहाँ लगभग 1000 ईसा पूर्व से मानव बस्तियाँ मौजूद थीं। यही नहीं, महाभारत में वर्णित इन्द्रप्रस्थ नगरी का उल्लेख भी यहीं से जोड़ा जाता है। यह वह जगह थी जहाँ पांडवों ने अपनी राजधानी स्थापित की थी।

महाभारत और इन्द्रप्रस्थ का रहस्य:
महाभारत जैसे महाकाव्य को अगर ऐतिहासिक दृष्टि से देखें, तो उसमें वर्णित इन्द्रप्रस्थ की भव्यता और समृद्धि की छवियाँ आज भी दिल्ली की धरती से मेल खाती हैं। कहा जाता है कि यमुना के तट पर स्थित यह नगर पत्थरों से बनी विशाल इमारतों और किलों से घिरा था। पुराना किला क्षेत्र से मिली पेंटेड ग्रे वेयर (Painted Grey Ware) सभ्यता की वस्तुएँ महाभारत काल से जुड़ाव को और मज़बूत करती हैं।

मौर्य और गुप्त काल में दिल्ली:
मौर्य साम्राज्य के समय दिल्ली प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र था। यहाँ अशोक के शासनकाल के अवशेष और शिलालेख भी मिले हैं। गुप्त काल में दिल्ली व्यापार का प्रमुख केंद्र बनी। इस दौरान यहाँ से निकलने वाले मार्ग मध्य एशिया तक फैले हुए थे।

मध्यकालीन दिल्ली की बुनियाद:
दिल्ली का असली राजनीतिक महत्व तब बढ़ा जब यहाँ पर दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई। 12वीं शताब्दी में कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुतुब मीनार का निर्माण शुरू करवाया। इसी दौर में मेहरौली और आसपास के क्षेत्रों में मस्जिदों और मकबरों का निर्माण हुआ। यह दिल्ली की उस परत को उजागर करता है जिसमें इस्लामी स्थापत्य कला की शुरुआत हुई।

कुतुब मीनार और क़ुतुब परिसर:
कुतुब मीनार आज भी दिल्ली की पहचान है। यह केवल एक मीनार नहीं बल्कि यह उस समय की तकनीकी, स्थापत्य और सांस्कृतिक श्रेष्ठता का प्रतीक है। क़ुतुब परिसर में बने लौह स्तंभ (Iron Pillar) से भी यह सिद्ध होता है कि प्राचीन भारतीय धातुकर्म कितनी उन्नत अवस्था में था।

सात शहरों की कहानी:
इतिहासकारों के अनुसार दिल्ली को सात (कई लोग आठ भी मानते हैं) ऐतिहासिक शहरों ने मिलकर आकार दिया है। ये शहर अपनी-अपनी परत छोड़ते गए और आज की दिल्ली में समाहित हो गए:

  1. इन्द्रप्रस्थ (महाभारत काल)
  2. लल कोट (तोमर वंश द्वारा स्थापित)
  3. किला राय पिथौरा (पृथ्वीराज चौहान का किला)
  4. सिरी (अलाउद्दीन खिलजी का नगर)
  5. तुगलकाबाद (ग़यासुद्दीन तुगलक द्वारा निर्मित)
  6. फीरोज़ाबाद (फीरोज शाह तुगलक का शहर)
  7. शाहजहानाबाद (मुगल सम्राट शाहजहां की राजधानी, लाल किला और जामा मस्जिद इसी काल की पहचान)

इनमें से हर शहर ने दिल्ली की मिट्टी में अपनी एक परत छोड़ी है, और पुरातत्वविद जब भी खुदाई करते हैं, तो उन्हें उसी परत का प्रमाण मिलता है।

मुगलों का स्वर्णिम काल:
16वीं शताब्दी में बाबर ने पानीपत की लड़ाई जीतकर मुगल साम्राज्य की नींव रखी। हुमायूं और अकबर के दौर में दिल्ली भले ही राजधानी नहीं रही, लेकिन शाहजहां ने 17वीं शताब्दी में इसे अपनी राजधानी बनाया और शाहजहानाबाद बसाया। लाल किला, जामा मस्जिद और चांदनी चौक इसी समय के निर्माण हैं। इस दौर की भव्यता और स्थापत्य कला ने दिल्ली को विश्व पटल पर विशिष्ट बना दिया।

औपनिवेशिक दिल्ली:
ब्रिटिश काल में दिल्ली की कहानी ने नया मोड़ लिया। 1911 में अंग्रेजों ने राजधानी को कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित कर दिया और नई दिल्ली की नींव रखी। एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने आधुनिक दिल्ली का नक्शा तैयार किया। राष्ट्रपति भवन, इंडिया गेट और संसद भवन उसी दौर की पहचान हैं।

आधुनिक उत्खनन और खोजें:
पुराना किला और इसके आसपास हाल के वर्षों में हुए खुदाई कार्यों ने कई रहस्यों को उजागर किया है। यहाँ से मिली Painted Grey Ware, लाल मृद्भांड और सिक्के साफ तौर पर दिल्ली की 3000 साल पुरानी सभ्यता को प्रमाणित करते हैं। इसी तरह हुमायूं के मकबरे और तुगलकाबाद क्षेत्र में भी पुरातात्विक प्रमाण मिलते रहे हैं।

दिल्ली का सांस्कृतिक मिश्रण:
दिल्ली केवल राजनीतिक सत्ता का केंद्र नहीं रही, बल्कि यह सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक मेलजोल का प्रतीक रही है। यहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई परंपराएँ आपस में घुलमिलकर रहती रही हैं। चांदनी चौक की गलियों से लेकर लोधी गार्डन की कब्रगाहों तक, हर जगह इतिहास सांस लेता है।

दिल्ली और उसके रहस्य:
आज भी दिल्ली की मिट्टी में कई राज दफ़्न हैं। पुरातत्वविद मानते हैं कि अगर व्यवस्थित और गहन खुदाई की जाए तो यहाँ से हड़प्पा सभ्यता से भी पुराने प्रमाण मिल सकते हैं। यमुना किनारे बसे इस नगर ने समय के साथ कई साम्राज्यों का उत्थान और पतन देखा, और हर युग ने दिल्ली को नया रूप दिया।

परत-दर-परत खुलती कहानी:
दिल्ली का इतिहास किसी किताब की तरह है, जिसमें हर अध्याय एक परत बनकर अगले अध्याय को जन्म देता है। इन्द्रप्रस्थ से लेकर नई दिल्ली तक की यह यात्रा सिर्फ इमारतों और किलों की नहीं, बल्कि सभ्यता, संस्कृति और मानवीय आकांक्षाओं की यात्रा है।

निष्कर्ष:
आज जब हम दिल्ली की सड़कों पर चलते हैं, तो यह सोचना भी रोमांचकारी होता है कि हमारे कदमों के नीचे 3000 साल पुराना इतिहास दफ़्न है। यह शहर सिर्फ राजधानी नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की आत्मा है। यहाँ की हर ईंट, हर पत्थर और हर दीवार एक कहानी कहती है—एक ऐसी कहानी जो परत-दर-परत खुलती जा रही है और आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान और प्रेरणा का स्रोत बन रही है।

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