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By: Ravindra |Sikarwar

केरल राज्य का तिरुवरप्पु श्रीकृष्ण मंदिर विश्व के सबसे असाधारण मंदिरों में से एक है। यहाँ विराजमान भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति को भूख इतनी तीव्र लगती है कि पूरे वर्ष में मंदिर केवल दो मिनट के लिए बंद होता है। ये दो मिनट भी इसलिए, ताकि भगवान थोड़ा विश्राम कर लें, न कि इसलिए कि मंदिर वास्तव में बंद हो। दिन में ठीक 11:58 से 12:00 बजे तक का यह छोटा-सा अंतराल ही एकमात्र समय है जब पट बंद रहते हैं, बाकी 23 घंटे 58 मिनट मंदिर पूरी तरह खुला रहता है। यहाँ तक कि सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण के समय भी पट नहीं बंद किए जाते। इस अनोखी परंपरा के पीछे एक गहरी आस्था और चमत्कारिक कथा छिपी है, जिसे सुनकर हर श्रद्धालु आश्चर्यचकित रह जाता है।

कंस वध के बाद भूखे श्रीकृष्ण का वही स्वरूप
लोक कथाओं और मंदिर की प्राचीन परंपरा के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा में मामा कंस का वध किया था, तब युद्ध के बाद वे अत्यधिक थक गए थे और भूख से व्याकुल हो रहे थे। उस समय उनके शरीर में जो कमज़ोरी और भूख का भाव था, उसी अवस्था में उनकी मूर्ति यहाँ स्थापित हुई। मान्यता है कि यह विग्रह इतना जीवंत है कि आज भी उसे भूख लगती है। यदि समय पर भोग न लगे तो मूर्ति का शरीर वास्तविक रूप से दुबला होने लगता है, कमर की करधनी नीचे खिसक जाती है और चेहरे पर क्लांति के भाव दिखाई देने लगते हैं। इसीलिए यहाँ दिन में दस बार नैवेद्य चढ़ाया जाता है। सुबह से रात तक अलग-अलग समय पर दूध, फल, खीर, पंचामृत, अप्पम, पायस आदि भोग लगते हैं, ताकि भगवान को कभी भूख न लगे।

आदि शंकराचार्य ने बदली सैकड़ों वर्ष पुरानी परंपरा
प्राचीन काल में यह मंदिर भी अन्य मंदिरों की तरह दिन-रात में कुछ समय के लिए बंद होता था और विशेष रूप से ग्रहण के समय तो पूरी तरह बंद कर दिया जाता था। उस समय जब ग्रहण समाप्त होता, पुजारी मंदिर खोलते तो देखते कि भगवान की मूर्ति भूख से अत्यधिक दुबली हो चुकी होती थी। कमर की पट्टी नीचे सरक चुकी होती और शरीर में शिथिलता दिखाई देती। एक बार आदि शंकराचार्य जी केरल यात्रा के दौरान इसी मंदिर में पहुँचे। उन्होंने भी यह दृश्य देखा और तुरंत आदेश दिया कि अब से इस मंदिर को कभी भी पूरी तरह बंद नहीं किया जाएगा, चाहे ग्रहण ही क्यों न हो। शंकराचार्य जी ने कहा कि यह विग्रह इतना जीवंत है कि इसे भूख नहीं सहन होती, इसलिए इसे निरंतर भोग लगना चाहिए। तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि ग्रहण में भी केवल पर्दा कर दिया जाता है, पट बंद नहीं होते और भोग लगता रहता है।

दो मिनट का विश्राम और कुल्हाड़ी वाली चाबी
मंदिर की सबसे रोचक परंपरा दो मिनट के उस विश्राम की है। ठीक 11:58 बजे पट बंद होते हैं और 12 बजे फिर खुल जाते हैं। इन दो मिनटों में भगवान को विश्राम करने दिया जाता है। मुख्य पुजारी के पास मंदिर की चाबी के साथ-साथ एक कुल्हाड़ी भी रहती है। यदि कभी चाबी से ताला न खुले या कोई तकनीकी समस्या आए, तो पुजारी को कुल्हाड़ी से ताला तोड़कर भी भगवान को भोग लगाने का अधिकार है। भोग में एक सेकंड की भी देरी स्वीकार नहीं की जाती। यही कारण है कि यहाँ का समय अत्यंत कठोरता से पालन किया जाता है।

अभिषेक के समय भी दिखती है भूख की पीड़ा
हर रोज़ होने वाले अभिषेक के समय भी यह चमत्कार देखने को मिलता है। अभिषेक में कुछ मिनट लगते हैं और उस दौरान नैवेद्य नहीं चढ़ाया जा सकता। जैसे ही अभिषेक शुरू होता है, मूर्ति का सिर पहले सूखने लगता है, फिर धीरे-धीरे पूरा शरीर। चंदन, दूध, शहद आदि से स्नान कराने के बाद भी यदि कुछ देर भोग न लगे तो शरीर में फिर से वह शुष्कता लौट आती है। पुजारी और श्रद्धालु इसे प्रत्यक्ष देखते हैं। यह दृश्य इतना जीवंत होता है कि पहली बार आने वाला व्यक्ति आश्चर्य से स्तब्ध रह जाता है। यह कोई मिथक नहीं, बल्कि यहाँ आने वाले लाखों भक्तों का अनुभव है।

प्रसाद की अनोखी महिमा – जीवन भर भूखे नहीं रहने की गारंटी
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका प्रसाद है। यहाँ आने वाले हर भक्त को प्रसाद लेना अनिवार्य है। बिना प्रसाद लिए कोई भी भक्त मंदिर से बाहर नहीं जा सकता। पट बंद होने से ठीक पहले, यानी 11:57 बजे, पुजारी जोर-जोर से घोषणा करते हैं – “प्रसादम् लो, प्रसादम् लो!” ताकि कोई भक्त प्रसाद से वंचित न रह जाए। मान्यता है कि जो व्यक्ति यहाँ का प्रसाद एक बार भी जीभ पर रख लेता है, उसका जीवन भर भोजन का प्रबंध स्वयं श्रीकृष्ण करते हैं। उसे कभी भूखा नहीं सोना पड़ता। न केवल भोजन, बल्कि जीवन की अन्य मूलभूत आवश्यकताओं का भी ध्यान भगवान रखते हैं। अनेक भक्तों ने अपने जीवन में इस प्रसाद की महिमा का अनुभव किया है।

प्राचीनता और स्थापत्य की शोभा
तिरुवरप्पु श्रीकृष्ण मंदिर लगभग 1500 वर्ष प्राचीन है। यह केरल के पारंपरिक वास्तुकला शैली में निर्मित है। लकड़ी की नक्काशी, तांबे की छत और विशाल प्रांगण इसे और भी मनोरम बनाते हैं। मंदिर कोट्टायम जिले में एर्नाकुलम-कोट्टायम मार्ग पर स्थित है और देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहाँ दर्शन करने आते हैं। यहाँ का वातावरण इतना पवित्र और शांत होता है कि भक्त घंटों बैठकर भगवान की लीला में खोए रहते हैं।

यह मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि भगवान की जीवंत उपस्थिति का प्रमाण है। यहाँ भूखे श्रीकृष्ण अपने भक्तों को जीवन भर भोजन देने का वचन देते हैं और स्वयं दो मिनट भी भूख सहन नहीं कर पाते। यह परस्पर प्रेम और विश्वास का अनुपम उदाहरण है। जो भी यहाँ आता है, वह न केवल प्रसाद ले जाता है, बल्कि भगवान के उस असीम प्रेम को हृदय में समेट कर ले जाता है।

जय श्रीकृष्ण!

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