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by-Ravindra Sikarwar

नई दिल्ली के कर्तव्य पथ पर एक अनूठी प्रदर्शनी का आयोजन किया गया है, जो कश्मीर की समृद्ध और समन्वित सांस्कृतिक विरासत को उजागर करती है। इस प्रदर्शनी में कश्मीर घाटी के सार्वजनिक भवनों, मंदिरों, मस्जिदों और अन्य ऐतिहासिक स्थलों पर उकेरे गए सदियों पुराने शिलालेखों को प्रदर्शित किया गया है। यह आयोजन हिंदू-मुस्लिम संस्कृतियों के अद्भुत मिश्रण को दर्शाता है, जो कश्मीर की साझा पहचान का प्रतीक है। यह प्रदर्शनी न केवल इतिहास प्रेमियों के लिए, बल्कि उन सभी के लिए एक प्रेरणा है, जो कश्मीर की सांस्कृतिक एकता को समझना चाहते हैं।

प्रदर्शनी का अवलोकन:
‘कश्मीर की समन्वित विरासत: शिलालेखों की कहानी’ नामक यह प्रदर्शनी 25 सितंबर 2025 से कर्तव्य पथ पर शुरू हुई और यह एक महीने तक चलेगी। इसका उद्घाटन केंद्रीय संस्कृति मंत्री ने किया, जिन्होंने इसे कश्मीर की सांस्कृतिक विविधता को राष्ट्रीय मंच पर लाने का एक महत्वपूर्ण कदम बताया। प्रदर्शनी में 8वीं से 19वीं शताब्दी तक के 50 से अधिक शिलालेखों की प्रतिकृतियां और डिजिटल प्रस्तुतियां शामिल हैं, जो कश्मीर के मंदिरों, मस्जिदों, दरगाहों, और अन्य सार्वजनिक संरचनाओं से संकलित किए गए हैं। इन शिलालेखों में संस्कृत, फारसी, अरबी, और स्थानीय कश्मीरी भाषाओं में लिखे गए ग्रंथ शामिल हैं, जो क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक सहिष्णुता को दर्शाते हैं।

प्रदर्शनी को चार खंडों में बांटा गया है:
प्राचीन मंदिरों के शिलालेख: इसमें 8वीं से 12वीं शताब्दी के हिंदू मंदिरों, जैसे शंकराचार्य मंदिर और मार्तंड सूर्य मंदिर, पर संस्कृत में लिखे गए शिलालेख शामिल हैं। ये शिलालेख धार्मिक भजनों, राजवंशों के वर्णन और दान पत्रों को दर्शाते हैं।

इस्लामी स्मारकों के शिलालेख: 14वीं शताब्दी से शुरू हुए सुल्तानकालीन और मुगलकालीन मस्जिदों और दरगाहों, जैसे जामा मस्जिद श्रीनगर और हजरतबल दरगाह, पर फारसी और अरबी में लिखे गए शिलालेख प्रदर्शित किए गए हैं। ये शिलालेख कुरान की आयतों, सुल्तानों के आदेशों और स्थानीय कविताओं को दर्शाते हैं।

साझा स्थलों के शिलालेख: कुछ स्थान, जैसे अवंतीपुर मंदिर और खानकाह-ए-मौला, दोनों समुदायों द्वारा पूजित हैं। इनके शिलालेख हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक हैं।

लोक कथाओं और कश्मीरी भाषा: स्थानीय कश्मीरी भाषा में लिखे गए शिलालेख, जो कविताओं, कहानियों और सामाजिक नियमों को दर्शाते हैं, प्रदर्शनी का एक विशेष हिस्सा हैं।

समन्वित संस्कृति का महत्व:
कश्मीर लंबे समय से अपनी समन्वित संस्कृति, जिसे ‘कश्मीरियत’ के नाम से जाना जाता है, के लिए प्रसिद्ध रहा है। यह प्रदर्शनी इस बात का जीवंत प्रमाण है कि कैसे हिंदू और मुस्लिम परंपराएं सदियों से एक-दूसरे के साथ मिलकर फली-फूली हैं। उदाहरण के लिए, प्रदर्शनी में एक 16वीं शताब्दी का शिलालेख है, जो श्रीनगर की एक मस्जिद पर संस्कृत और फारसी में लिखा गया है, जिसमें एक हिंदू राजा द्वारा मस्जिद के निर्माण के लिए दान देने का उल्लेख है। इसी तरह, हजरतबल दरगाह के पास एक मंदिर के शिलालेख में स्थानीय मुस्लिम कारीगरों द्वारा मंदिर की मरम्मत का विवरण है।

प्रदर्शनी में डिजिटल तकनीक का उपयोग भी किया गया है। आगंतुक क्यूआर कोड स्कैन करके शिलालेखों के अनुवाद, ऐतिहासिक संदर्भ और ऑडियो-विजुअल प्रस्तुतियां देख सकते हैं। एक विशेष वीआर (वर्चुअल रियलिटी) जोन भी बनाया गया है, जहां आगंतुक कश्मीर के ऐतिहासिक स्थलों का डिजिटल दौरा कर सकते हैं।

आयोजन का उद्देश्य:
केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अनुसार, इस प्रदर्शनी का उद्देश्य कश्मीर की सांस्कृतिक एकता को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रचारित करना है। यह आयोजन विशेष रूप से युवाओं को लक्षित करता है, ताकि वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ सकें और कश्मीरियत की भावना को समझ सकें। मंत्रालय ने इसे ‘अमृत महोत्सव’ पहल का हिस्सा बताया, जो भारत की आजादी के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में सांस्कृतिक आयोजनों को बढ़ावा देता है।

आयोजकों ने यह भी बताया कि प्रदर्शनी का एक हिस्सा स्थानीय कश्मीरी कारीगरों और विद्वानों के सहयोग से तैयार किया गया है। इसमें श्रीनगर के स्थानीय इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने योगदान दिया है, जिन्होंने शिलालेखों के संरक्षण और अनुवाद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रदर्शनी में कश्मीरी हस्तशिल्प, जैसे पश्मीना शॉल और कागजी माचिए, की बिक्री के लिए स्टॉल भी लगाए गए हैं, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगा।

आगंतुकों के लिए जानकारी:
प्रदर्शनी कर्तव्य पथ पर सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक खुली रहेगी, और प्रवेश निःशुल्क है। स्कूलों और कॉलेजों के लिए विशेष गाइडेड टूर की व्यवस्था की गई है, जिसमें विशेषज्ञों द्वारा शिलालेखों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि समझाई जाएगी। आयोजकों ने सुझाव दिया है कि आगंतुक पहले से ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कर लें, ताकि भीड़ से बचा जा सके। रजिस्ट्रेशन के लिए आधिकारिक वेबसाइट (kashmirculture.in) पर जाएं।

सांस्कृतिक प्रभाव और भविष्य की योजनाएं:
यह प्रदर्शनी कश्मीर की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और इसे वैश्विक मंच पर ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आयोजकों का कहना है कि भविष्य में इसे अन्य शहरों, जैसे मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता, में भी ले जाया जाएगा। इसके अलावा, शिलालेखों का एक डिजिटल संग्रह तैयार किया जा रहा है, जो ऑनलाइन उपलब्ध होगा, ताकि दुनिया भर के लोग कश्मीर की समन्वित संस्कृति को जान सकें।

कश्मीर की यह प्रदर्शनी न केवल इतिहास को जीवंत करती है, बल्कि यह भी सिखाती है कि विविधता में एकता ही भारत की ताकत है। यदि आप कश्मीर की सांस्कृतिक गहराई को समझना चाहते हैं, तो यह प्रदर्शनी अवश्य देखें। अधिक जानकारी के लिए आधिकारिक चैनलों पर नजर रखें।

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