Iran–Israel conflictIran–Israel conflict
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Report by: Himanshu, Edited by: Ravindra Sikarwar

Iran–Israel conflict : पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष केवल क्षेत्रीय टकराव भर नहीं है, बल्कि यह वैश्विक राजनीति, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की दिशा तय करने वाला मोड़ बन चुका है। ईरान, अमेरिका और इज़रायल के बीच बढ़ती सैन्य कार्रवाई ने दुनिया को दो खेमों में बांट दिया है। भारत सहित कई देशों में इस संघर्ष को लेकर अलग-अलग विचार सामने आ रहे हैं। भारत सरकार ने संतुलित और सावधानीपूर्ण प्रतिक्रिया दी है, जो उसकी पारंपरिक कूटनीतिक नीति के अनुरूप मानी जा रही है।

शक्ति बनाम कूटनीति: किसकी जीत?

Iran–Israel conflict पश्चिमी मीडिया लंबे समय से ईरान की राजनीतिक व्यवस्था और मानवाधिकार रिकॉर्ड की आलोचना करता रहा है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से वहां की शासन प्रणाली को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस चलती रही है। हाल के वर्षों में ईरान में हुए प्रदर्शनों को भी वैश्विक मंच पर व्यापक कवरेज मिला। साथ ही, परमाणु कार्यक्रम को लेकर ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तनाव लगातार बना रहा है।

हालिया घटनाक्रम में अमेरिका के नेतृत्व में इज़रायल द्वारा की गई सैन्य कार्रवाई को लेकर कई सवाल उठे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कार्यकाल की शुरुआत में “अंतहीन युद्धों” से दूरी बनाने की बात कही थी, लेकिन पश्चिम एशिया में हालात ने उस वादे पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ अमेरिका की नजदीकी भी इस संघर्ष के संदर्भ में चर्चा का विषय बनी हुई है।

दूसरी ओर, ईरान ने भी मिसाइल और ड्रोन हमलों के जरिए जवाबी कार्रवाई की है। फारस की खाड़ी और आसपास के क्षेत्रों में तनाव बढ़ने से वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में अवरोध उत्पन्न होता है, तो इसका सीधा प्रभाव भारत जैसे तेल आयातक देशों पर पड़ सकता है।

अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और संप्रभुता का प्रश्न

Iran–Israel conflict यह संघर्ष केवल दो या तीन देशों के बीच की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और कूटनीतिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता से भी जुड़ा हुआ है। अतीत में भी परमाणु समझौतों और वार्ताओं को अचानक समाप्त किए जाने से तनाव बढ़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता दी जाती, तो स्थिति इस स्तर तक नहीं पहुंचती।

युद्ध को “आज़ादी” या “सुरक्षा” के नाम पर उचित ठहराने की कोशिशें अक्सर जटिल वास्तविकताओं को सरल रूप में प्रस्तुत करती हैं। इतिहास बताता है कि सैन्य समाधान स्थायी शांति की गारंटी नहीं देते। इसके विपरीत, वे क्षेत्रीय अस्थिरता, शरणार्थी संकट और आर्थिक असुरक्षा को बढ़ा सकते हैं।

आज आवश्यकता है कि वैश्विक समुदाय संयम और संवाद को प्राथमिकता दे। यदि बल प्रयोग की प्रवृत्ति हावी होती रही, तो नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। ईरान युद्ध दुनिया के लिए यह स्पष्ट संदेश देता है कि शक्ति प्रदर्शन की राजनीति अंततः वैश्विक अस्थिरता को जन्म देती है।

संघर्ष को और फैलने से पहले रोकना ही विश्व शांति और स्थिरता के हित में होगा।

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