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By: Ravindra Sikarwar

नई दिल्ली: भारत की अर्थव्यवस्था को मिल रही राहत की एक बड़ी खबर सामने आई है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देश में बेरोजगारी दर 2017-18 के 6 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में महज 3.2 प्रतिशत रह गई है। यह गिरावट पिछले छह वर्षों की नीतिगत पहलों और आर्थिक सुधारों का परिणाम है, जो लाखों युवाओं को रोजगार के अवसर प्रदान करने में सफल रही हैं। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (मोस्पी) द्वारा जारी वार्षिक आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के अनुसार, 15 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों के लिए यह दर सामान्य स्थिति (यूजुअल स्टेटस) पर आधारित है। इस सकारात्मक प्रवृत्ति ने न केवल सरकार को उत्साहित किया है, बल्कि अर्थशास्त्रियों को भी आशा बंधाई है कि भारत 2026 तक 8 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि हासिल कर सकता है। हालांकि, मासिक आंकड़ों में उतार-चढ़ाव दिख रहा है, जैसे अगस्त 2025 में 5.1 प्रतिशत और सितंबर में 5.2 प्रतिशत, लेकिन दीर्घकालिक रुझान सकारात्मक बने हुए हैं।

यह उपलब्धि तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब हम 2017-18 की स्थिति को याद करते हैं। उस समय बेरोजगारी दर 6 प्रतिशत के ऊंचे स्तर पर थी, जो मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र की मंदी, औद्योगिक सुस्ती और शहरीकरण की चुनौतियों से उपजी थी। पीएलएफएस सर्वेक्षण, जो 2017 से शुरू हुआ, ने देशभर में 1 लाख से अधिक परिवारों का डेटा एकत्र किया, जिसमें ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्र शामिल हैं। 2023-24 के आंकड़ों में श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) 57.9 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो पिछले वर्षों से 4 प्रतिशत अधिक है। कार्य भागीदारी दर (डब्ल्यूपीआर) भी 56.7 प्रतिशत हो गई, जो दर्शाता है कि अधिक लोग सक्रिय रूप से रोजगार की तलाश में हैं और उसे प्राप्त कर रहे हैं। विशेष रूप से, ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी 2.8 प्रतिशत तक सिमट गई, जबकि शहरी इलाकों में यह 5.4 प्रतिशत रही। महिलाओं की भागीदारी में 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो लिंग समानता की दिशा में एक बड़ा कदम है।

सरकार की कौन-सी योजनाएं इस सफलता की वास्तुकार बनीं? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को बढ़ावा दिया, जिससे 2023-24 में 1.3 करोड़ नई नौकरियां सृजित हुईं। ‘मनरेगा’ योजना ने ग्रामीण रोजगार को मजबूत किया, जबकि ‘प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना’ (पीएमकेवीवाई) ने 1.5 करोड़ युवाओं को प्रशिक्षण देकर उन्हें बाजार-उन्मुख कौशल प्रदान किए। डिजिटल इंडिया और स्टार्टअप इंडिया ने आईटी और ई-कॉमर्स क्षेत्रों में लाखों अवसर पैदा किए। इसके अलावा, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं जैसे भारतमाला और सागरमाला ने निर्माण क्षेत्र में रोजगार विस्फोटक वृद्धि की। श्रम एवं रोजगार मंत्री ने कहा, “यह गिरावट केवल आंकड़ों की नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की समृद्धि की कहानी है। हमारा लक्ष्य 2025 तक शून्य बेरोजगारी नहीं, बल्कि समावेशी रोजगार है।”

हालांकि, पूरी तस्वीर चमकदार नहीं है। मासिक पीएलएफएस बुलेटिन, जो जनवरी 2025 से शुरू हुआ, मौसमी उतार-चढ़ाव को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, जुलाई 2025 में दर 5.2 प्रतिशत घटी, लेकिन युवा बेरोजगारी (15-29 वर्ष) अभी भी 12.8 प्रतिशत पर बनी हुई है। शहरी क्षेत्रों में यह 19 प्रतिशत तक पहुंच जाती है, खासकर महिलाओं के लिए जहां यह 20.1 प्रतिशत है। राज्यों में असमानता स्पष्ट है – गोवा, केरल और मेघालय में दर 6 प्रतिशत से ऊपर है, जबकि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में यह 2.5 प्रतिशत से नीचे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह क्षेत्रीय असंतुलन शिक्षा, कौशल और औद्योगीकरण की कमी से उपजा है। एक अर्थशास्त्री ने टिप्पणी की, “बेरोजगारी में कमी सतही लग सकती है यदि हम गुणवत्ता पर ध्यान न दें। अधिकांश नौकरियां असंगठित क्षेत्र में हैं, जहां वेतन और सुरक्षा की कमी है।”

इस संदर्भ में, सरकार ने नई पहलें शुरू की हैं। अप्रैल 2025 में ‘एआई करियर फॉर वुमेन’ कार्यक्रम लॉन्च किया गया, जो महिलाओं को कृत्रिम बुद्धिमत्ता क्षेत्र में प्रशिक्षित करेगा। इसी तरह, ‘प्रगति’ और ‘सरस्वती’ छात्रवृत्तियां इंजीनियरिंग छात्राओं को बढ़ावा देंगी। युवा बेरोजगारी से निपटने के लिए ‘स्टैंड-अप इंडिया’ को विस्तार दिया गया, जो अनुसूचित जाति/जनजाति उद्यमियों को ऋण प्रदान करता है। वैश्विक स्तर पर, भारत की बेरोजगारी दर अब अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के वैश्विक औसत 5.1 प्रतिशत से नीचे है, जो देश को आकर्षक निवेश गंतव्य बनाता है। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) में 15 प्रतिशत वृद्धि हुई, जिसने विनिर्माण क्षेत्र को गति दी।

भविष्य की चुनौतियां क्या हैं? जलवायु परिवर्तन से कृषि रोजगार प्रभावित हो रहा है, जबकि ऑटोमेशन नौकरियों को विस्थापित कर सकता है। लेकिन सकारात्मक पक्ष यह है कि पीएलएफएस की मासिक रिपोर्टिंग से नीतियां अधिक त्वरित होंगी। 2024-25 के प्रथम तिमाही आंकड़ों में एलएफपीआर 55.6 प्रतिशत रही, जो निरंतर सुधार दर्शाती है। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि यदि वर्तमान गति बनी रही, तो 2030 तक बेरोजगारी 2 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यह न केवल आर्थिक विकास का इंजन बनेगा, बल्कि सामाजिक स्थिरता भी सुनिश्चित करेगा।

कुल मिलाकर, 6 प्रतिशत से 3.2 प्रतिशत की यह गिरावट भारत की आर्थिक लचीलापन का प्रमाण है। सरकार, निजी क्षेत्र और नागरिकों की संयुक्त प्रयासों से ही यह संभव हुआ। अब जरूरत है कि यह प्रगति सभी वर्गों तक पहुंचे, ताकि ‘विकसित भारत 2047’ का सपना साकार हो। युवा ऊर्जा को सही दिशा देकर हम एक समृद्ध राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।

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