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by-Ravindra Sikarwar

मुंबई: सोशल मीडिया पर एक भारतीय प्रबंधक का एक भावुक और विचारोत्तेजक संदेश तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने कार्यस्थल में फैल रही विषाक्त संस्कृति के खिलाफ कड़ी चेतावनी दी है। यह संदेश रेडिट के ‘r/IndianWorkplace’ सबरेडिट पर पोस्ट किया गया था, जहां एक तकनीकी क्षेत्र के चीफ टेक्निकल ऑफिसर (सीटीओ) ने अपनी पेशेवर यात्रा के अनुभव साझा करते हुए भावी नेताओं को सहानुभूति, संतुलित कार्य-जीवन और मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी है। यह पोस्ट न केवल हजारों लाइक्स और कमेंट्स बटोर चुकी है, बल्कि कर्मचारियों और प्रबंधकों के बीच व्यापक बहस को जन्म दे रही है, जो भारतीय कॉर्पोरेट जगत में व्याप्त विषाक्तता की समस्या को उजागर कर रही है।

संदेश का पूरा विवरण:
पोस्ट का शीर्षक “कार्यस्थल विषाक्तता” रखा गया था, जिसमें लेखक ने अपनी शुरुआती करियर की कठिनाइयों से लेकर वर्तमान सफलता तक की कहानी बयां की। वे भारत के आईटी सेक्टर में अपने प्रारंभिक दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि कैसे 12 से 14 घंटे की लंबी शिफ्टें, वीकेंड पर काम की मजबूरी और आपात स्थितियों में बिना अतिरिक्त भुगतान के उपलब्ध रहने की अपेक्षा ने उनके जीवन को प्रभावित किया। उन्होंने “ऑथोरिटेरियन मैनेजमेंट” की आलोचना की, जो अधीनस्थों पर दबाव डालता है और लंबे काम के घंटों को उत्पादकता का पैमाना मानता है। रिमोट वर्क को लेकर भी उन्होंने विरोध की संस्कृति का जिक्र किया, जहां प्रबंधक कर्मचारियों की निजी जिंदगी को नजरअंदाज कर देते हैं।

लेखक ने पत्रकार एड जिट्रॉन के शब्दों “बिजनेस इडियट्स” का हवाला देते हुए ऐसे नेताओं को जिम्मेदार ठहराया, जो व्यावसायिक अज्ञानता के कारण विषाक्त माहौल बनाते हैं। लेकिन यह संदेश केवल शिकायतों तक सीमित नहीं है। उन्होंने अपनी कनाडा में स्थापित व्यवसाय की सफलता का श्रेय दिया, जहां उन्होंने इन नकारात्मक अनुभवों से सीख ली। वे बताते हैं कि कैसे उनकी कंपनी ने कोविड-19 से पहले ही रिमोट वर्क को अपनाया और चार-दिवसीय कार्य सप्ताह लागू किया, जिससे कर्मचारियों का मनोबल बढ़ा। पोस्ट में भावी टीम लीडर्स को चेतावनी दी गई है: “अगर आप सहानुभूति और संतुलन को नजरअंदाज करेंगे, तो आपकी टीम टूट जाएगी। नेतृत्व का मतलब नियंत्रण नहीं, बल्कि प्रेरणा देना है।” उन्होंने जोर दिया कि विषाक्तता न केवल व्यक्तिगत स्तर पर हानि पहुंचाती है, बल्कि संगठन की लंबी अवधि की सफलता को भी नष्ट कर देती है।

वायरल होने की वजह और सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं:
यह पोस्ट 8 अक्टूबर, 2025 को रेडिट पर शेयर की गई और कुछ ही घंटों में वायरल हो गई। एक्स (पूर्व ट्विटर) और लिंक्डइन पर इसे साझा करने वाले उपयोगकर्ताओं ने इसे “सच्चाई का आईना” बताया। एक यूजर ने लिखा, “यह संदेश हर भारतीय मैनेजर को पढ़ना चाहिए। लंबे घंटे काम करवाना उत्पादकता नहीं, बल्कि दासता है।” एक अन्य ने कहा, “मैंने भी ऐसी विषाक्तता झेली है, और यह पोस्ट मुझे नई उम्मीद देती है कि बदलाव संभव है।” रेडिट पर 500 से अधिक कमेंट्स में से अधिकांश सहमति जताते हुए अपनी कहानियां साझा कर रहे थे, जैसे कि माइक्रोमैनेजमेंट, ब्रेक लेने पर निगरानी और प्रोमोशन के लिए आक्रामकता को बढ़ावा।

कुछ कमेंट्स में आलोचना भी थी, जहां उपयोगकर्ताओं ने कहा कि ऐसी पोस्ट्स जागरूकता तो फैलाती हैं, लेकिन व्यावहारिक समाधान कम हैं। कुल मिलाकर, यह बहस ने #EndWorkplaceToxicity जैसे हैशटैग को ट्रेंडिंग बना दिया, जो अब 50,000 से अधिक पोस्ट्स के साथ चल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वायरल संदेश जनरेशन Z और मिलेनियल्स की बढ़ती जागरूकता को दर्शाता है, जो अब विषाक्त संस्कृति को बर्दाश्त करने से इनकार कर रहे हैं।

भारतीय कार्यस्थल में विषाक्तता की पृष्ठभूमि:
भारतीय कॉर्पोरेट संस्कृति में विषाक्तता कोई नई समस्या नहीं है। गैलप के 2024 ग्लोबल वर्कप्लेस सर्वे के अनुसार, 86 प्रतिशत भारतीय कर्मचारी अपने कार्यस्थल पर संघर्षरत हैं, जिसमें तनाव, थकान और असुरक्षा प्रमुख हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह समस्या “हाईएस्ट टॉलरेंस फॉर टॉक्सिसिटी” से उपजी है, जहां लंबे काम के घंटे को समर्पण का प्रतीक माना जाता है। उद्यमी अंकुर वारिकू ने हाल ही में पांच चेतावनी संकेत बताए: विश्वास की कमी, भय-आधारित माहौल, अस्पष्ट अपेक्षाएं, नकारात्मक व्यवहार को पुरस्कृत करना और सीमाओं का उल्लंघन।

ममाएर्थ की सह-संस्थापक गजल अलघ ने भी टॉक्सिक मैनेजर्स के पांच लक्षण साझा किए: नियंत्रण की चाह, आज्ञाकारिता पर जोर, विचारों के बजाय अनुमोदन की तलाश, ‘हां-मैन’ टीम बनाना और कठिन बातचीत से बचना। एक हालिया रेडिट थ्रेड में, एक सेल्स प्रोफेशनल ने बताया कि कैसे उनके मैनेजर की धमकीपूर्ण शैली को प्रमोशन मिला, जो आक्रामकता को नेतृत्व का पर्याय बना देती है। एक अन्य घटना में, यूके-आधारित कंपनी में एक भारतीय मैनेजर ने ब्रेक लिमिट (दिन में दो 30-मिनट के ब्रेक) और माइक्रोसॉफ्ट टीम्स पर ब्रेक नोटिफिकेशन जैसी सख्ती थोप दी, जिससे सहकर्मियों ने विद्रोह किया।

ये उदाहरण दर्शाते हैं कि विषाक्तता न केवल व्यक्तिगत स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, बल्कि उत्पादकता को भी 20-30 प्रतिशत कम कर देती है, जैसा कि हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू की एक रिपोर्ट में कहा गया है।

संदेश का प्रभाव और आगे की राह:
यह वायरल पोस्ट भारतीय कार्यस्थलों में सकारात्मक बदलाव की मांग को तेज कर रही है। लेखक ने अपनी कंपनी के उदाहरण से दिखाया कि सहानुभूतिपूर्ण नेतृत्व से न केवल कर्मचारी संतुष्ट रहते हैं, बल्कि व्यवसाय भी फलता-फूलता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि संगठनों को 360-डिग्री फीडबैक, एग्जिट इंटरव्यू और ओपन कम्युनिकेशन को बढ़ावा देना चाहिए। कर्मचारियों के लिए, सीमाएं निर्धारित करना और सहकर्मियों से समर्थन लेना महत्वपूर्ण है।

अंत में, यह संदेश एक चेतावनी के साथ समाप्त होता है: “विषाक्तता फैलाने वाले नेता इतिहास बन जाएंगे, लेकिन सहानुभूतिपूर्ण नेता याद रखे जाएंगे।” जैसे-जैसे यह बहस फैल रही है, उम्मीद है कि भारतीय कंपनियां अधिक मानवीय संस्कृति की ओर कदम बढ़ाएंगी, जहां काम केवल कमाई का साधन न हो, बल्कि विकास का मंच बने।

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