India Vs Bharat: चमकदार इंडिया और संघर्षरत भारत
आज के रंगीन और तेज़ रफ्तार समय में क्या आपको भी यह महसूस नहीं होता कि हमारे देश की असली तस्वीर कहीं धुंधली होती जा रही है? एक ओर चमकता-दमकता ‘इंडिया’ है, जो वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास से भरा खड़ा है, वहीं दूसरी ओर वही ‘इंडिया’ अपने ही आंगन में बसे ‘भारत’ को दिशा देने के नाम पर हांकने लगता है। यह विरोधाभास किसी कल्पना का नहीं, बल्कि हमारी रोज़मर्रा की सच्चाई का हिस्सा बन चुका है।

India Vs Bharat: तरक्की की परतों के नीचे दबा यथार्थ
भारत ने बीते दशकों में उल्लेखनीय प्रगति की है। उद्योग, तकनीक, रक्षा, सिनेमा और वैश्विक पहचान—हर क्षेत्र में देश ने अपनी क्षमता साबित की है। ऊंची इमारतें, एक्सप्रेसवे, मॉल संस्कृति, वैश्विक ब्रांड और अंग्रेज़ी में पारंगत युवा—ये सब ‘शाइनिंग इंडिया’ की तस्वीर बनाते हैं। लेकिन इसी चमक के पीछे एक ऐसा भारत भी है, जो महानगरों के फुटपाथों पर रात गुज़ारता है, जो सहायता और सब्सिडी पर जीवन चलाने को मजबूर है, और जहां किसान कर्ज़ व अनिश्चितता के बोझ तले दबा हुआ है।
India Vs Bharat: गणतंत्र और ‘गण’ की अनदेखी
गणतंत्र का मूल आधार उसका ‘गण’ होता है—अर्थात अंतिम व्यक्ति। सवाल यह है कि क्या आज इस गण की भूमिका केवल मतदान तक सीमित होकर रह गई है? बेरोज़गारी से जूझता युवा, अवसरों से वंचित ग्रामीण भारत और हाशिए पर खड़ा आम नागरिक—क्या उनकी आवाज़ नीति निर्धारण तक पहुंच पा रही है? यदि नहीं, तो गणतंत्र का संतुलन अस्थिर होना स्वाभाविक है।
राष्ट्र, धर्म और नैतिक संतुलन
राष्ट्र की आत्मा नैतिक मूल्यों से बनती है। धर्म इस आत्मा को दिशा देता है, पर कोई भी धर्म राष्ट्र से ऊपर नहीं हो सकता। इतिहास गवाह है कि राष्ट्रधर्म की स्थापना के लिए ही महाभारत जैसा संघर्ष हुआ। आज आवश्यकता है यह समझने की कि धर्म और राष्ट्र एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। धर्म के नाम पर अन्याय को ढंकना राष्ट्र के साथ छल है।
रामराज्य: एक कल्याणकारी दृष्टि
रामराज्य कोई सत्ता का प्रतीक नहीं, बल्कि सुशासन और लोककल्याण का आदर्श है। तुलसीदास ने जिस रामराज्य की कल्पना की, उसमें भय, विषमता और शोषण का स्थान नहीं था। वहां प्रेम, कर्तव्य और न्याय जीवन के आधार थे। गणतंत्र दिवस हमें यही याद दिलाता है कि केवल नारों से नहीं, बल्कि नीति और व्यवहार में इस आदर्श को उतारकर ही गणतंत्र सार्थक बन सकता है।
इस गणतंत्र दिवस पर प्रश्न केवल इतना है—क्या हम उस रामराज्य की भावना के एक अंश के भी निकट हैं?
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