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by-Ravindra Sikarwar

भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों में तनाव बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा भारतीय वस्तुओं पर 50% का भारी-भरकम टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने के बाद, स्थिति और भी गंभीर हो गई है। अमेरिका का यह कदम भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखने के जवाब में उठाया गया है।

व्यापार वार्ता पर रोक:
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक कड़ा बयान जारी करते हुए कहा है कि जब तक यह मुद्दा सुलझ नहीं जाता, तब तक भारत के साथ कोई और व्यापारिक बातचीत नहीं होगी। इस बयान ने दोनों देशों के बीच संबंधों को एक नए निचले स्तर पर पहुंचा दिया है। अमेरिका का यह रुख भारत पर अपनी विदेश नीति में बदलाव लाने का दबाव डालने के लिए माना जा रहा है।

भारत का कड़ा रुख:
अमेरिका के इस रवैये पर भारत ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। भारत सरकार ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मामले में एक साहसिक बयान देते हुए कहा है कि भारत इसके लिए ‘भारी कीमत’ चुकाने को भी तैयार है। प्रधानमंत्री का यह बयान दर्शाता है कि भारत अपनी संप्रभुता और विदेश नीति पर किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं है।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव:
इस व्यापार विवाद का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर दिखना शुरू हो गया है। टैरिफ की घोषणा के बाद से भारतीय शेयर बाजार में हलचल मची हुई है और निवेशकों में घबराहट का माहौल है। विभिन्न उद्योगों में भी चिंता बढ़ रही है। विशेष रूप से, फिरोजाबाद के कांच उद्योग पर इसका गहरा प्रभाव पड़ने की आशंका है। अमेरिका भारतीय कांच उत्पादों का एक बड़ा आयातक है, और 50% का टैरिफ लगने से इस उद्योग को भारी नुकसान हो सकता है।

यह विवाद न केवल दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों को प्रभावित कर रहा है, बल्कि भू-राजनीतिक मोर्चे पर भी इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।

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