By: Ravindra Sikarwar
भारत ने अपनी पूर्वी सीमा पर देश की सबसे संवेदनशील और रणनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण जगह यानी सिलिगुड़ी कॉरिडोर (जिसे चिकन नेक भी कहा जाता है) को पूरी तरह अभेद्य बनाने का बड़ा कदम उठाया है। यह मात्र 20-22 किलोमीटर चौड़ा गलियारा ही एकमात्र स्थलीय संपर्क है जो असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और मेघालय जैसे सात बहनों को भारत की मुख्य भूमि से जोड़ता है। अगर यह गलियारा कभी कट जाए तो पूरा पूर्वोत्तर भारत मुख्य देश से अलग-थलग हो सकता है। इसी खतरे को देखते हुए भारत सरकार ने यहां अब तक की सबसे बड़ी और आधुनिक सैन्य तैनाती शुरू कर दी है।
तीन नए अत्याधुनिक मिलिट्री स्टेशन और फॉरवर्ड बेस बनाए जा रहे हैं जो 24 घंटे किसी भी हमले का मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम होंगे। इनमें असम के धुबरी क्षेत्र में लाचित बोरफुकन के नाम पर बन रहा मिलिट्री स्टेशन, बिहार के किशनगंज में दूसरा बड़ा बेस और पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले के चोपड़ा में तीसरा फॉरवर्ड बेस शामिल है। खास बात यह है कि चोपड़ा बेस बांग्लादेश की सीमा से महज एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ये आधार सिर्फ सैनिकों के ठिकाने नहीं होंगे बल्कि इनमें रैपिड रिएक्शन फोर्स, पैरा स्पेशल फोर्सेज, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर यूनिट्स, ड्रोन सर्विलांस सिस्टम, हाई-एल्टीट्यूड रडार और सबसे खास बात यह कि राफेल लड़ाकू विमान, ब्रह्मोस सुपरसॉनिक क्रूज मिसाइल और रूस से आई एस-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम की तैनाती होगी।
ये सभी हथियार और सैन्य इकाइयां मिलकर सिलिगुड़ी कॉरिडोर को हवा, जमीन और साइबर सभी तरह के खतरों से पूरी तरह सुरक्षित बनाएंगे। सूत्रों के मुताबिक इन बेस पर तैनात जवानों को कुछ ही मिनटों में किसी भी दिशा में तैनात होने की ट्रेनिंग दी जा रही है। साथ ही हाई-स्पीड रेलवे और ऑल-वेदर रोड नेटवर्क का काम भी तेजी से चल रहा है ताकि जरूरत पड़ने पर भारी हथियार और सैनिक तुरंत पहुंच सकें।
इस बड़े सैन्य कदम के पीछे सबसे बड़ी वजह पड़ोसी देश बांग्लादेश का तेजी से बदलता रुख है। शेख हसीना की सरकार जाने के बाद सत्ता में आई अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस की नीतियों में भारत के बजाय चीन और पाकिस्तान को स्पष्ट तरजीह दिख रही है। बांग्लादेश ने चीन से 2.2 अरब डॉलर में जे-10सी लड़ाकू विमान खरीदने का करार किया है। साथ ही चीनी मदद से ड्रोन और मिसाइल तकनीक विकसित करने की योजना है। पाकिस्तान ने भी बांग्लादेश को JF-17 ब्लॉक-3 लड़ाकू विमान देने की पेशकश की है। ये सभी कदम भारत के लिए सीधा खतरा हैं क्योंकि बांग्लादेश की 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा में से बड़ा हिस्सा सिलिगुड़ी कॉरिडोर के ठीक बगल में है।
सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बांग्लादेश में चीन या पाकिस्तान की सेना की मौजूदगी बढ़ी तो सिलिगुड़ी कॉरिडोर पर दो तरफा (चीन से उत्तर और बांग्लादेश से दक्षिण-पश्चिम) दबाव बन सकता है। यही वजह है कि भारत ने अब कोई जोखिम नहीं उठाने का फैसला किया है। न सिर्फ थल सेना बल्कि वायुसेना के राफेल स्क्वाड्रन को भी हाशिमारा और तेजपुर एयरबेस पर अलर्ट मोड पर रखा गया है। ब्रह्मोस मिसाइलों की अतिरिक्त रेजिमेंट भी पूर्वी सेक्टर में तैनात की जा रही है जो 900 किलोमीटर तक के लक्ष्य को नष्ट कर सकती हैं।
यह पहली बार है जब भारत ने सिलिगुड़ी कॉरिडोर को इतनी भारी और मल्टी-लेयर सुरक्षा दी है। पहले यहां सिर्फ कुछ पैदल ब्रिगेड और सीमा सुरक्षा बल ही तैनात थे, लेकिन अब पूरा इलाका एक हाई-टेक किले में तब्दील हो रहा है। ड्रोन, सैटेलाइट, रडार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सर्विलांस सिस्टम की मदद से कोई भी संदिग्ध गतिविधि तुरंत पकड़ में आएगी।
संक्षेप में कहें तो भारत ने साफ संदेश दे दिया है कि सिलिगुड़ी कॉरिडोर से कोई समझौता नहीं होगा। यह गलियारा देश की जीवनरेखा है और इसे बचाने के लिए भारत हर कीमत चुकाने को तैयार है। आने वाले दिनों में इस क्षेत्र में और भी बड़े सैन्य अभ्यास और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट देखने को मिलेंगे।
