by-Ravindra Sikarwar
नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित विजयादशमी उत्सव में सरसंघचालक मोहन भागवत ने देशवासियों से आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने का आह्वान किया। उन्होंने वैश्विक व्यापारिक तनावों के बीच स्वदेशी उत्पादन को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि परस्पर निर्भरता को असहायता में नहीं बदलना चाहिए। इसके साथ ही, उन्होंने हाल ही में हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद मिले अंतरराष्ट्रीय समर्थन का भी जिक्र किया, जो भारत की वैश्विक स्थिति को रेखांकित करता है।
विजयादशमी उत्सव और RSS का शताब्दी वर्ष:
विजयादशमी का यह उत्सव RSS के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह संगठन का स्थापना दिवस भी है। इस वर्ष, RSS ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे किए, जिसे भव्य समारोह के साथ मनाया गया। नागपुर के रेशमबाग मैदान में आयोजित इस कार्यक्रम में हजारों स्वयंसेवकों ने भाग लिया। परंपरागत रूप से, इस अवसर पर सरसंघचालक का संबोधन देश के लिए दिशा-निर्देशक माना जाता है। इस बार भी, मोहन भागवत का संबोधन सामाजिक, आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर केंद्रित रहा।
आत्मनिर्भरता पर जोर:
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में भारत को आत्मनिर्भर बनाने की अपील की। उन्होंने वैश्विक व्यापार तनावों का हवाला देते हुए कहा कि वैश्वीकरण के इस दौर में देशों के बीच परस्पर निर्भरता स्वाभाविक है, लेकिन इसे असहायता का कारण नहीं बनने देना चाहिए। “हमें अपनी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर होने के बजाय स्वदेशी उत्पादन और नवाचार को बढ़ावा देना होगा। आत्मनिर्भर भारत ही वैश्विक चुनौतियों का सामना कर सकता है,” उन्होंने कहा।
उन्होंने स्वदेशी तकनीक, कृषि, और छोटे-मझोले उद्योगों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर बल दिया। भागवत ने ‘वोकल फॉर लोकल’ की अवधारणा को दोहराते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक को स्थानीय उत्पादों को अपनाकर देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करना चाहिए। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर अत्यधिक निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है।
पहलगाम हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय समर्थन:
मोहन भागवत ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हाल ही में हुए आतंकी हमले का उल्लेख किया, जिसमें निर्दोष नागरिकों और सुरक्षा बलों को निशाना बनाया गया था। उन्होंने इस हमले की निंदा करते हुए कहा कि भारत आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई में दृढ़ है। उन्होंने यह भी बताया कि इस हमले के बाद कई देशों ने भारत के साथ एकजुटता दिखाई और आतंकवाद की निंदा की। “यह समर्थन दर्शाता है कि भारत की वैश्विक साख बढ़ रही है और दुनिया हमारी संप्रभुता और शांति के प्रयासों का सम्मान करती है,” उन्होंने कहा।
भागवत ने आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने की अपील की और कहा कि भारत को अपनी आंतरिक सुरक्षा को और मजबूत करना होगा। उन्होंने स्वयंसेवकों और नागरिकों से सामाजिक एकता और सतर्कता बनाए रखने का आग्रह किया ताकि देश को किसी भी खतरे से बचाया जा सके।
सामाजिक एकता और सांस्कृतिक मूल्य:
RSS प्रमुख ने अपने संबोधन में सामाजिक एकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत की ताकत उसकी विविधता में निहित है, और सभी समुदायों को एकजुट होकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देना चाहिए। उन्होंने हिंदू संस्कृति के मूल्यों को अपनाने की बात कही, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यह किसी भी समुदाय के खिलाफ नहीं है। “हमारी संस्कृति समावेशी है, और हमें इसे मजबूत करने के लिए मिलकर काम करना होगा,” उन्होंने कहा।
उन्होंने युवाओं से सामाजिक कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की अपील की। शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में RSS के कार्यों का उल्लेख करते हुए उन्होंने स्वयंसेवकों को इन प्रयासों को और तेज करने का निर्देश दिया।
RSS का शताब्दी वर्ष और भविष्य की योजनाएं:
RSS के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर मोहन भागवत ने संगठन के योगदान की चर्चा की। उन्होंने कहा कि RSS ने पिछले एक सदी में सामाजिक सेवा, शिक्षा, और राष्ट्रीय एकता के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। उन्होंने भविष्य की योजनाओं का भी जिक्र किया, जिसमें ग्रामीण भारत को सशक्त बनाने, युवाओं को प्रशिक्षित करने, और डिजिटल तकनीक के माध्यम से संगठन के कार्यों को और विस्तार देने की बात शामिल थी।
उन्होंने स्वयंसेवकों से आह्वान किया कि वे समाज के हर वर्ग तक पहुंचें और राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने में अपनी भूमिका निभाएं। “हमारा लक्ष्य एक ऐसे भारत का निर्माण है जो आत्मनिर्भर, समृद्ध, और एकजुट हो,” उन्होंने कहा।
सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रिया:
मोहन भागवत के संबोधन को देश भर में व्यापक रूप से चर्चा का विषय बनाया गया है। कई सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय एकता पर उनके विचारों का समर्थन किया है। हालांकि, कुछ विपक्षी दलों ने उनके बयानों को वैचारिक आधार पर देखते हुए आलोचना भी की। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संबोधन RSS की भविष्य की रणनीति को दर्शाता है, जो आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक एकता पर केंद्रित है।
मोहन भागवत का विजयादशमी संबोधन न केवल RSS के शताब्दी वर्ष का उत्सव था, बल्कि यह देश के सामने मौजूदा चुनौतियों और भविष्य की दिशा को रेखांकित करने वाला एक महत्वपूर्ण अवसर भी था। आत्मनिर्भरता, राष्ट्रीय सुरक्षा, और सामाजिक एकता पर उनके विचार भारत के विकास के लिए एक रोडमैप की तरह हैं। यह संबोधन देशवासियों को यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि कैसे वे अपने स्तर पर राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सकते हैं।
