Spread the love

by-Ravindra Sikarwar

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के चाईबासा स्थित सदर अस्पताल में एक दिल दहला देने वाली घटना ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां थैलेसीमिया से जूझ रहे पांच नाबालिग बच्चों को रक्त आधान के दौरान संक्रमित खून चढ़ाया गया, जिसके बाद उनकी जांच में एचआईवी वायरस की पुष्टि हुई। यह मामला 18 अक्टूबर 2025 को तब सामने आया जब एक सात वर्षीय बच्चे की फॉलो-अप जांच में एचआईवी पॉजिटिव रिपोर्ट आई। बच्चे के परिवार ने डिप्टी कमिश्नर और राज्य अधिकारियों के पास शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद झारखंड हाईकोर्ट ने शुक्रवार को स्वत: संज्ञान लेते हुए जांच के आदेश दिए। इस घटना ने न केवल माता-पिता को स्तब्ध कर दिया है, बल्कि पूरे राज्य में चिकित्सा लापरवाही के खिलाफ आक्रोश की लहर पैदा कर दी है।

घटना का पूरा विवरण: कैसे फैला संक्रमण?
सदर अस्पताल का ब्लड बैंक इस मामले का केंद्र बिंदु है। प्रारंभिक जांच में पता चला कि सितंबर 2025 के प्रारंभ में एक सात वर्षीय थैलेसीमिया मरीज को संक्रमित रक्त चढ़ाया गया था। थैलेसीमिया एक आनुवंशिक रक्त विकार है, जिसमें मरीजों को हर 15-30 दिनों में रक्त आधान की आवश्यकता पड़ती है। इस बच्चे को उपचार शुरू होने के बाद से अब तक लगभग 25 यूनिट रक्त चढ़ाया जा चुका था। 18 अक्टूबर को हुई रूटीन जांच में एचआईवी की पुष्टि हुई, जिसके बाद परिवार ने ब्लड बैंक तकनीशियन पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए शिकायत की।

इसके बाद रांची से भेजी गई पांच सदस्यीय चिकित्सा टीम ने 25 अक्टूबर को अस्पताल का दौरा किया। टीम में स्वास्थ्य सेवा निदेशक डॉ. दिनेश कुमार, डॉ. शिप्रा दास, डॉ. एस.एस. पासवान, डॉ. भगत, चाईबासा सिविल सर्जन डॉ. सुशांतो कुमार मांझी, डॉ. शिवचरण हंसदा और डॉ. मीनू कुमारी शामिल थे। टीम ने ब्लड बैंक, पीआईसीयू वॉर्ड का निरीक्षण किया और प्रभावित बच्चों के परिवारों से विस्तृत जानकारी ली। जांच के दौरान चार और बच्चे एचआईवी पॉजिटिव पाए गए, जिससे कुल संख्या पांच हो गई। ये सभी बच्चे विभिन्न ब्लड ग्रुप्स के थे, जो संकेत देता है कि संक्रमण एक ही दानकर्ता से नहीं, बल्कि अलग-अलग स्रोतों से फैला। अधिकांश रक्त आधान सरकारी संस्थानों में हुए, हालांकि कुछ मामलों में निजी स्रोतों से रक्त लिया गया था।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि संक्रमण के दो संभावित कारण हो सकते हैं: या तो दानकर्ताओं में एचआईवी की स्क्रीनिंग न की गई हो, या दूषित सुइयों का उपयोग हुआ हो। जिले में वर्तमान में 515 एचआईवी पॉजिटिव मरीज और 56 थैलेसीमिया केस हैं, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है।

सरकारी प्रतिक्रिया: निलंबन, जांच और सहायता
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने घटना को गंभीर बताते हुए तत्काल कार्रवाई की। उन्होंने एक्स पर पोस्ट कर कहा, “चाईबासा में थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों को एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ाए जाने की खबरों के बाद पश्चिमी सिंहभूम के सिविल सर्जन और अन्य संबंधित अधिकारियों को निलंबित करने के निर्देश दिए गए हैं।” निलंबित अधिकारियों में सिविल सर्जन डॉ. सुशांतो मांझी, सदर अस्पताल के एचआईवी यूनिट प्रभारी डॉक्टर और ब्लड बैंक तकनीशियन शामिल हैं। स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने इसे “अत्यंत गंभीर मामला” करार देते हुए उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की, जो एक सप्ताह में रिपोर्ट सौंपेगी। समिति को यह तय करने का निर्देश दिया गया है कि संक्रमित रक्त ब्लड बैंक से आया या बाहरी स्रोतों से।

मुख्यमंत्री ने प्रभावित परिवारों को 2 लाख रुपये की आर्थिक सहायता और मुफ्त उपचार की घोषणा की। विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया गया है, जो रक्त दानकर्ताओं का डेटाबेस ट्रेस करेगी, अतिरिक्त टेस्ट कराएगी और प्रक्रियागत खामियों की पहचान करेगी। अंसारी ने कहा, “प्रारंभिक जांच में एक थैलेसीमिया मरीज में एचआईवी संक्रमण की पुष्टि हुई है। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि दोषी बख्शे न जाएं।”

राजनीतिक विवाद: विपक्ष का तीखा प्रहार
यह मामला राजनीतिक रंग ले चुका है। भाजपा नेता प्रतुल शाह देव ने मुख्यमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा, “थैलेसीमिया के कारण पांच बच्चों को एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ाया गया। कुछ अधिकारियों को निलंबित करके आंखें बंद करने की कोशिश हो रही है। स्वास्थ्य मंत्री को बर्खास्त करें और वरिष्ठ अधिकारियों पर कार्रवाई करें।” उन्होंने सभी जिम्मेदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की। विपक्ष ने स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही को “जीवन लीला” करार दिया, जबकि सत्ताधारी झामुमो ने इसे “व्यक्तिगत चूक” बताते हुए सुधारों का वादा किया। सोशल मीडिया पर #JusticeForInfectedKids और #JharkhandHealthFail जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, जहां लोग रक्त सुरक्षा मानकों पर सवाल उठा रहे हैं।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर प्रभाव: व्यापक चिंताएं
यह घटना झारखंड की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की कमजोरियों को उजागर करती है। रक्त आधान से एचआईवी संक्रमण दुर्लभ है, लेकिन अपर्याप्त स्क्रीनिंग, पुरानी मशीनें और प्रशिक्षण की कमी इसके प्रमुख कारण हैं। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (एनएसीओ) के अनुसार, भारत में हर साल हजारों रक्त आधान होते हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में 20% से अधिक मामलों में स्क्रीनिंग अनियमित होती है। विशेषज्ञों ने मांग की है कि ब्लड बैंकों में स्वतंत्र निगरानी, डिजिटल ट्रैकिंग और नियमित ऑडिट अनिवार्य हों। यह मामला अन्य राज्यों के लिए भी चेतावनी है, जहां थैलेसीमिया मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

प्रभावित परिवारों की पीड़ा: भावुक अपील
प्रभावित माता-पिताओं का दर्द बयां करना मुश्किल है। एक मां ने कहा, “हमारा बच्चा थैलेसीमिया से लड़ रहा था, अब एचआईवी की चिंता ने जीवन नर्क बना दिया। डॉक्टरों पर भरोसा था, लेकिन लापरवाही ने सब छीन लिया।” परिवार न्याय और मुआवजे की मांग कर रहे हैं, साथ ही बच्चों के भविष्य के इलाज की चिंता जता रहे हैं।

कानूनी प्रावधान और सुधार के उपाय:

  • कानूनी पक्ष: राष्ट्रीय रक्त नीति 2002 और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत रक्त स्क्रीनिंग अनिवार्य है। उल्लंघन पर 10 वर्ष तक की सजा और जुर्माना।
  • बचाव के टिप्स:

  – रक्त आधान से पहले दानकर्ताओं की दोहरी जांच (ईआईए और आरपीसी) कराएं।

  – सरकारी ब्लड बैंकों में डिजिटल रिकॉर्ड रखें।

  – माता-पिता: बच्चों के नियमित टेस्ट कराएं और संदिग्ध लक्षणों पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

  – सरकार: ब्लड बैंकों में एआई-आधारित स्क्रीनिंग मशीनें लगाएं और प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाएं।

  – शिकायत: राष्ट्रीय स्वास्थ्य हेल्पलाइन 108 या स्थानीय डीएम कार्यालय पर रिपोर्ट करें।

यह घटना चिकित्सा नैतिकता और जिम्मेदारी पर पुनर्विचार की मांग करती है। जांच रिपोर्ट से सच्चाई सामने आएगी, लेकिन असली बदलाव तभी संभव है जब स्वास्थ्य प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो। प्रभावित बच्चों के लिए प्रार्थना और न्याय की कामना।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

× Whatsapp