by-Ravindra Sikarwar
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स (आईएसएम) धनबाद ने एक ऐतिहासिक फैसले में अपने 75% अनिवार्य उपस्थिति नियम को समाप्त करने की घोषणा की है। यह बदलाव 2025-26 शैक्षणिक वर्ष से लागू होगा और इसका उद्देश्य छात्रों को अधिक लचीली और स्वायत्त शिक्षा प्रदान करना है। यह कदम आधुनिक उच्च शिक्षा के रुझानों के अनुरूप है, जो व्यक्तिगत विकास, अनुसंधान और नवाचार को प्राथमिकता देता है। यह निर्णय न केवल छात्रों के बीच उत्साह पैदा कर रहा है, बल्कि शिक्षा क्षेत्र में एक नई दिशा की ओर संकेत भी दे रहा है।
निर्णय का अवलोकन:
आईआईटी (आईएसएम) धनबाद ने 24 सितंबर 2025 को एक आधिकारिक अधिसूचना जारी कर घोषणा की कि स्नातक (बी.टेक, बी.आर्क, इंटीग्रेटेड एम.टेक) और स्नातकोत्तर (एम.टेक, एम.एससी, एमबीए) पाठ्यक्रमों के लिए 75% उपस्थिति की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया है। इस नियम के तहत पहले छात्रों को सेमेस्टर परीक्षा में बैठने के लिए न्यूनतम 75% कक्षा उपस्थिति सुनिश्चित करनी पड़ती थी। अब, संस्थान ने उपस्थिति के बजाय शैक्षणिक प्रदर्शन और प्रोजेक्ट-आधारित मूल्यांकन पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया है।
संस्थान के निदेशक ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा, “आधुनिक शिक्षा का लक्ष्य रटने और कठोर नियमों से हटकर रचनात्मकता, अनुसंधान और स्व-निर्देशित शिक्षण को बढ़ावा देना है। उपस्थिति नियम को हटाने से छात्रों को अपनी गति से सीखने और नवाचार पर ध्यान देने की स्वतंत्रता मिलेगी।” यह निर्णय राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के अनुरूप है, जो लचीली और समग्र शिक्षा प्रणाली पर जोर देती है।
बदलाव का उद्देश्य और प्रभाव:
इस नीति का मुख्य उद्देश्य छात्रों को कक्षा में शारीरिक उपस्थिति के दबाव से मुक्त करना और उनके सीखने के अनुभव को अधिक समृद्ध बनाना है। आईआईटी (आईएसएम) धनबाद का मानना है कि यह कदम निम्नलिखित क्षेत्रों में सकारात्मक प्रभाव डालेगा:
- लचीली शिक्षा को प्रोत्साहन: छात्र अब ऑनलाइन लेक्चर्स, डिजिटल संसाधनों और स्व-निर्देशित प्रोजेक्ट्स के माध्यम से अपनी पढ़ाई को अनुकूलित कर सकेंगे। संस्थान ने डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म्स को अपग्रेड करने की योजना बनाई है, जिसमें वर्चुअल क्लासरूम और रिकॉर्डेड लेक्चर्स शामिल होंगे।
- अनुसंधान और नवाचार पर ध्यान: उपस्थिति नियम हटने से छात्रों को अनुसंधान, स्टार्टअप्स और इंटर्नशिप जैसे क्षेत्रों में अधिक समय देने का अवसर मिलेगा। खासकर बी.टेक और एम.टेक के अंतिम वर्ष के छात्रों को इससे लाभ होगा।
- छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य: कठोर उपस्थिति नियमों के कारण होने वाला तनाव कम होगा, जिससे छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होगा। यह विशेष रूप से उन छात्रों के लिए महत्वपूर्ण है जो दूरदराज के क्षेत्रों से आते हैं और स्वास्थ्य या पारिवारिक कारणों से नियमित उपस्थिति में कठिनाई का सामना करते हैं।
- वैश्विक मानकों के साथ तालमेल: विश्व के कई शीर्ष संस्थान, जैसे एमआईटी और स्टैनफोर्ड, उपस्थिति पर कम जोर देते हैं और शैक्षणिक उत्कृष्टता को प्राथमिकता देते हैं। यह कदम आईआईटी (आईएसएम) को वैश्विक शिक्षा मानकों के करीब लाएगा।
नई मूल्यांकन प्रणाली:
उपस्थिति नियम हटने के साथ, संस्थान ने मूल्यांकन प्रणाली में भी बदलाव की घोषणा की है। अब छात्रों का मूल्यांकन निम्नलिखित आधारों पर होगा:
- निरंतर मूल्यांकन: असाइनमेंट, क्विज और प्रोजेक्ट्स पर अधिक वेटेज दिया जाएगा।
- प्रैक्टिकल और प्रोजेक्ट कार्य: विशेष रूप से इंजीनियरिंग और विज्ञान पाठ्यक्रमों में, प्रैक्टिकल और प्रोजेक्ट-आधारित कार्यों को प्राथमिकता दी जाएगी।
- सेमेस्टर परीक्षा: परीक्षाएं पहले की तरह अनिवार्य रहेंगी, लेकिन उपस्थिति के बजाय प्रदर्शन पर जोर होगा।
- स्व-निर्देशित शिक्षण: छात्रों को ऑनलाइन कोर्सेज, जैसे एनपीटीईएल और कौरसेरा, के माध्यम से क्रेडिट अर्जित करने की अनुमति होगी।
छात्रों और शिक्षकों की प्रतिक्रिया:
छात्र समुदाय ने इस निर्णय का व्यापक स्वागत किया है। बी.टेक तृतीय वर्ष के एक छात्र ने कहा, “यह नियम हमें अपनी पढ़ाई को अपनी रुचि के अनुसार ढालने की आजादी देता है। अब हम अनुसंधान और स्टार्टअप्स पर अधिक ध्यान दे सकते हैं।” हालांकि, कुछ शिक्षकों ने चिंता जताई है कि उपस्थिति नियम हटने से कुछ छात्र कक्षा में अनुशासन की कमी दिखा सकते हैं। इसके जवाब में, संस्थान ने कहा कि वह नियमित मॉनिटरिंग और मेंटरिंग सिस्टम लागू करेगा ताकि शैक्षणिक गुणवत्ता प्रभावित न हो।
भारत में उच्च शिक्षा के लिए निहितार्थ:
आईआईटी (आईएसएम) धनबाद का यह कदम भारत में उच्च शिक्षा के परिदृश्य को बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। एनईपी 2020 के तहत, कई अन्य आईआईटी और एनआईटी भी लचीली शिक्षा नीतियों की ओर बढ़ रहे हैं। यह निर्णय अन्य संस्थानों को भी प्रेरित कर सकता है कि वे पारंपरिक नियमों को फिर से विचार करें और छात्र-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाएं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत को वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में मजबूत करेगा, खासकर तब जब तकनीकी नवाचार और स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। धनबाद, जो खनन और तकनीकी शिक्षा के लिए जाना जाता है, इस बदलाव के साथ एक नया शैक्षणिक मॉडल प्रस्तुत कर रहा है।
भविष्य की योजनाएं:
संस्थान ने घोषणा की है कि वह 2025-26 शैक्षणिक वर्ष से पहले एक व्यापक डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करेगा, जिसमें हाइब्रिड क्लासरूम, ऑनलाइन मूल्यांकन टूल्स और छात्रों के लिए मेंटरिंग प्रोग्राम शामिल होंगे। इसके अलावा, छात्रों को अनुसंधान और उद्यमिता के अवसर प्रदान करने के लिए नए इनक्यूबेशन सेंटर स्थापित किए जाएंगे। संस्थान ने यह भी सुनिश्चित किया है कि यह नीति सभी छात्रों के लिए समान अवसर प्रदान करेगी, चाहे उनकी पृष्ठभूमि कुछ भी हो।
निष्कर्ष:
आईआईटी (आईएसएम) धनबाद का 75% अनिवार्य उपस्थिति नियम समाप्त करने का निर्णय आधुनिक शिक्षा की दिशा में एक प्रगतिशील कदम है। यह छात्रों को स्वायत्तता, रचनात्मकता और अनुसंधान के लिए प्रोत्साहित करेगा, साथ ही भारत की उच्च शिक्षा को वैश्विक मानकों के करीब लाएगा। यदि आप इस संस्थान के छात्र हैं या शिक्षा क्षेत्र में रुचि रखते हैं, तो इस बदलाव पर नजर रखें। अधिक जानकारी के लिए संस्थान की आधिकारिक वेबसाइट (iitism.ac.in) पर जाएं।
