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घटनास्थल पर ही हाईटेक जांच

ICMR: सड़क दुर्घटनाओं और आपात स्थितियों में घायल लोगों की जान बचाने के लिए अब अस्पताल पहुंचना ही जरूरी नहीं होगा। एम्स भोपाल और आईआईटी इंदौर मिलकर एक ऐसी अत्याधुनिक तकनीक विकसित कर रहे हैं, जो इलाज की पूरी दिशा बदल सकती है।

यह दुनिया की पहली एआई आधारित पोर्टेबल 3डी एक्स-रे यूनिट होगी, जिससे मौके पर ही गंभीर जांच संभव हो सकेगी।

ICMR: एम्स भोपाल–आईआईटी इंदौर की अनोखी पहल

एम्स भोपाल और आईआईटी इंदौर के वैज्ञानिक और डॉक्टर संयुक्त रूप से एक पोर्टेबल 3डी एक्स-रे सिस्टम पर काम कर रहे हैं।

यह यूनिट बिना अस्पताल ले जाए ही सीटी स्कैन जैसी उच्च गुणवत्ता वाली 3डी इमेज उपलब्ध कराएगी।

इस परियोजना को भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने मंजूरी दी है और इसके लिए 8 करोड़ रुपये की फंडिंग भी स्वीकृत की गई है।

ICMR: समय पर इलाज न मिलना मौत की बड़ी वजह

भारत में सड़क हादसों और ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाली आपात घटनाओं में मौत का सबसे बड़ा कारण समय पर जांच और इलाज का अभाव है।

केवल मध्यप्रदेश में ही हर साल करीब डेढ़ लाख लोग गंभीर हादसों में घायल होते हैं।

स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, ट्रॉमा मरीजों की मृत्यु में जांच सुविधाओं तक पहुंचने में लगने वाला समय निर्णायक भूमिका निभाता है।

कम रेडिएशन में मिलेगी 3डी हाई-डेफिनेशन इमेज

यह एआई आधारित यूनिट कई अलग-अलग कोणों से एक्स-रे इमेज लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से 3डी तस्वीर तैयार करेगी।

खास बात यह है कि इसका रेडिएशन स्तर पारंपरिक सीटी स्कैन की तुलना में लगभग 500 गुना कम होगा, जिससे मरीजों पर पड़ने वाला खतरा भी न्यूनतम रहेगा।

महंगी और भारी मशीनों की समस्या का समाधान

वर्तमान में मौजूद सीटी स्कैन जैसी आधुनिक जांच मशीनें बेहद महंगी हैं।

इन्हे चलाने के लिए बड़े अस्पताल, विशेषज्ञ स्टाफ और भारी ढांचे की जरूरत होती है।

यही कारण है कि दुर्घटना के तुरंत बाद सही निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है।

नई पोर्टेबल 3डी एक्स-रे यूनिट इस चुनौती का व्यावहारिक समाधान पेश करेगी।

एंबुलेंस से आपदा क्षेत्र तक होगा उपयोग

इस प्रोजेक्ट के प्रमुख शोधकर्ताओं में एम्स भोपाल के मैक्सिलोफेशियल सर्जन डॉ. बी.एल. सोनी और डॉ. अंशुल राय शामिल हैं।

डॉ. राय के अनुसार यह मशीन पूरी तरह पोर्टेबल होगी।

इसे एंबुलेंस, सड़क हादसे के स्थल और आपदा प्रभावित क्षेत्रों में इस्तेमाल किया जा सकेगा।

इससे “गोल्डन आवर” में ही इलाज शुरू कर मरीज की जान बचाने की संभावना कई गुना बढ़ जाएगी।

यह परियोजना राष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

ICMR को देशभर से मिले 1224 प्रस्तावों में से केवल 38 का चयन हुआ।

जिनमें मध्यप्रदेश से यह एकमात्र प्रोजेक्ट है।

शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि सफल परीक्षण के बाद यह तकनीक न सिर्फ भारत बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्वास्थ्य सेवाओं में नई पहचान बनाएगी।

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