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by-Ravindra Sikarwar

कीमतों में उछाल के बावजूद उत्सव की धूम, दिल्ली में अकेले 10,000 करोड़ का व्यापार; जानिए विभिन्न क्षेत्रों का विस्तृत ब्रेकडाउन और विशेषज्ञ विश्लेषण

इस वर्ष धनतेरस ने भारतीय अर्थव्यवस्था को एक जबरदस्त झटका दिया, जब उपभोक्ताओं ने कुल 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक का खर्च कर रिकॉर्ड तोड़ बिक्री दर्ज की। यह आंकड़ा ऑल इंडिया ट्रेडर्स कन्फेडरेशन (सीएआईटी) द्वारा जारी किया गया है, जो दर्शाता है कि सोने और चांदी की ऊंची कीमतों के बावजूद त्योहारी माहौल ने खरीदारी की ललक को दोगुना कर दिया। धनतेरस, जो दीपावली के पांच दिवसीय उत्सव की शुरुआत का प्रतीक है, परंपरागत रूप से धन, समृद्धि और सौभाग्य के प्रतीक माने जाने वाले सामानों की खरीद का विशेष अवसर होता है। 2025 में यह पर्व 18 अक्टूबर को मनाया गया, और बाजारों में भीड़ उमड़ पड़ी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह खर्च न केवल आर्थिक सुधार का संकेत है, बल्कि उपभोक्ता विश्वास की मजबूती को भी दर्शाता है।

धनतेरस का सांस्कृतिक महत्व और परंपराएं:
कार्तिक मास की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाने वाला धनतेरस धन्वंतरि जयंती के रूप में भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस दिन आयुर्वेद के देवता धन्वंतरि का अवतरण समुद्र मंथन के दौरान हुआ था, जो स्वास्थ्य और कल्याण का प्रतीक है। वास्तु शास्त्र में इसे धन के देवता कुबेर की पूजा का दिन माना गया है, इसलिए लोग सोना-चांदी, बर्तन, वाहन और अन्य उपयोगी वस्तुएं खरीदते हैं। मान्यता है कि इस दिन की खरीदारी वर्ष भर समृद्धि लाती है। इस वर्ष, वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच, उपभोक्ताओं ने सोने-चांदी को सुरक्षित निवेश के रूप में चुना, जिससे बिक्री में वृद्धि हुई।

खर्च का विस्तृत ब्रेकडाउन: क्षेत्रवार विश्लेषण
सीएआईटी के अनुमान के मुताबिक, कुल 1 लाख करोड़ रुपये के कारोबार में सोने-चांदी ने सबसे बड़ा योगदान दिया। यहां विभिन्न श्रेणियों का विस्तार से विवरण दिया गया है:

  • सोना और चांदी: कुल खर्च का 60% यानी 60,000 करोड़ रुपये। पिछले वर्ष की तुलना में 25% की वृद्धि। सोने की कीमतें 62.65% ऊंची पहुंच गईं, जहां 10 ग्राम 24 कैरेट सोना 1,32,400 रुपये तक बिका, जबकि चांदी 1,80,000 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई (पिछले वर्ष के 98,000 रुपये से 55% अधिक)। फिर भी, उपभोक्ताओं ने हल्के डिजाइन वाले आभूषण, सिक्के और स्ट्रिप्स पर जोर दिया। दिल्ली के बुलियन बाजारों में अकेले 10,000 करोड़ रुपये का व्यापार हुआ, जो शहर की आर्थिक गतिविधि को दर्शाता है।
  • बर्तन और रसोई उपकरण: 15,000 करोड़ रुपये। तांबे के बर्तन, स्टील के कुकवेयर और मॉडर्न किचन एप्लायंसेज की मांग बढ़ी, जो घरेलू सुख-समृद्धि के प्रतीक के रूप में देखे जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह श्रेणी मध्यम वर्ग के उपभोक्ताओं द्वारा प्राथमिकता दी गई।
  • इलेक्ट्रॉनिक्स और विद्युत सामग्री: 10,000 करोड़ रुपये। स्मार्टफोन, टीवी, वाशिंग मशीन और अन्य गैजेट्स की बिक्री में उछाल आया। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स ने भारी छूट देकर इस सेक्टर को बढ़ावा दिया।
  • सजावटी सामान और धार्मिक वस्तुएं: 3,000 करोड़ रुपये। रंगोली सामग्री, दीपक, पूजा किट और सजावटी आइटम्स की खरीदारी ने बाजारों को रंगीन बना दिया। इसके अलावा, वाहन (कार, बाइक) और वस्त्रों पर भी हजारों करोड़ का खर्च हुआ।
  • अन्य क्षेत्र: वाहन खरीद पर 5,000 करोड़ से अधिक, जबकि कपड़ों और सहायक सामग्री पर 7,000 करोड़ रुपये। कुल मिलाकर, यह खर्च छोटे व्यापारियों, कारीगरों और निर्माताओं को लाभ पहुंचाने वाला साबित हुआ।

कीमतों का प्रभाव और उपभोक्ता व्यवहार:
सोने की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गईं, लेकिन वॉल्यूम में 10-15% की गिरावट के बावजूद मूल्य में तेजी आई। ऑल इंडिया जेम एंड ज्वेलरी डोमेस्टिक काउंसिल के चेयरमैन राजेश रोक्डे ने कहा, “धनतेरस 2025 पर कुल वॉल्यूम में 10-15% कमी आई, लेकिन मूल्य में उछाल आया… हम उम्मीद करते हैं कि समग्र त्योहारी बिक्री 50,000 करोड़ रुपये को पार कर जाएगी।” उपभोक्ताओं ने ‘मेक इन इंडिया’ अभियान का समर्थन करते हुए स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता दी, जिससे जीएसटी में कमी और स्थानीय विनिर्माण को बढ़ावा मिला। सीएआईटी महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने बताया, “उपभोक्ता स्पष्ट रूप से भारतीय उत्पादों को पसंद कर रहे हैं, जो छोटे व्यापारियों को फायदा पहुंचा रहा है।”

आर्थिक प्रभाव और भविष्य की संभावनाएं:
यह रिकॉर्ड खर्च भारतीय खुदरा क्षेत्र को गति प्रदान करेगा, खासकर जब वैश्विक मंदी की आशंकाओं के बीच उपभोक्ता विश्वास मजबूत है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि दीपावली के पूरे उत्सव में कुल बिक्री 4-5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। हालांकि, ऊंची कीमतों ने कुछ उपभोक्ताओं को सतर्क किया, लेकिन त्योहारी भावना ने बाजारों को जीवंत रखा। दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगरों में दुकानें देर रात तक खुली रहीं, और ऑनलाइन बिक्री ने ग्रामीण क्षेत्रों को भी जोड़ा।

यह धनतेरस न केवल आर्थिक उत्साह का प्रतीक है, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर को मजबूत करने वाला भी। आने वाले दिनों में नरक चतुर्दशी, दीपावली और भाई दूज पर भी इसी तरह की धूम की उम्मीद है।

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