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by-Ravindra Sikarwar

7 नवंबर 2025 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या पर एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति रितु राज अवस्थी की पीठ ने केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों को सख्त निर्देश दिए कि **अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, सरकारी कार्यालय, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और अन्य सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को तत्काल हटाया जाए**। कोर्ट ने इसे “जन सुरक्षा और स्वच्छता का अनिवार्य हिस्सा” बताते हुए समर्पित गश्ती दलों और आधुनिक आश्रय गृहों की स्थापना का भी आदेश दिया। यह फैसला कई याचिकाओं पर सुनवाई के बाद आया, जिसमें बच्चों पर कुत्तों के हमले, अस्पतालों में संक्रमण का खतरा और सार्वजनिक स्थानों पर असुविधा जैसे मुद्दे उठाए गए थे। कोर्ट ने इसे “संवैधानिक कर्तव्य” बताते हुए 6 महीने के अंदर कार्ययोजना लागू करने को कहा है। आइए इस फैसले की पूरी पृष्ठभूमि, मुख्य बिंदु, दिशानिर्देश और इसके प्रभावों पर विस्तार से चर्चा करें।

फैसले की पृष्ठभूमि: बढ़ते हमले और जन दबाव
भारत में आवारा कुत्तों की आबादी अनुमानित 6.2 करोड़ है, जो विश्व में सबसे अधिक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, भारत में हर साल 2 करोड़ से अधिक कुत्ते काटने के मामले दर्ज होते हैं, जिसमें 20,000 से अधिक मौतें रेबीज से होती हैं। 2024-25 में अकेले दिल्ली में 1.5 लाख, मुंबई में 80,000 और बेंगलुरु में 60,000 से अधिक हमले दर्ज किए गए।

  • मुख्य याचिकाएं:

  – दिल्ली की एक मां की याचिका: 7 वर्षीय बच्चे पर स्कूल परिसर में कुत्तों का हमला।

  – मुंबई हॉस्पिटल एसोसिएशन: ऑपरेशन थिएटर और वार्ड में कुत्तों का घुसना, संक्रमण का खतरा।

  – आरटीआई कार्यकर्ता: रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों पर हमले।

  – एनजीओ ‘सेव द स्ट्रीट्स’: मानवीय आधार पर कुत्तों के लिए आश्रय, लेकिन नियंत्रित तरीके से।

कोर्ट ने इन याचिकाओं को गंभीरता से लिया और कहा, “आवारा कुत्ते न तो मौलिक अधिकार रखते हैं, न ही सार्वजनिक स्थानों पर अनियंत्रित घूमने का हक। जनता की सुरक्षा सर्वोपरि है।”

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य निर्देश
कोर्ट ने एक विस्तृत 15-सूत्री कार्ययोजना जारी की, जिसे 6 महीने में लागू करना अनिवार्य है। मुख्य बिंदु:

  1. तत्काल हटाव:

   – अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, कोर्ट परिसर, सरकारी भवन, रेलवे-बस स्टेशन, पार्क आदि से आवारा कुत्तों को 48 घंटे में हटाया जाए।

   – नो-डॉग जोन घोषित किए जाएं, जहां प्रवेश पर ₹5,000 जुर्माना।

  1. समर्पित गश्ती दल (Stray Dog Patrol Teams):

   – प्रत्येक नगर निगम/पंचायत में 5-10 सदस्यीय विशेष दल गठित हों।

   – दल में पशु चिकित्सक, प्रशिक्षित हैंडलर, वाहन और नेट गन शामिल।

   – सुबह 5 से 9 बजे और शाम 5 से 9 बजे गश्त अनिवार्य।

   – हर हफ्ते कम से कम 50 कुत्तों को पकड़ने का लक्ष्य।

  1. आधुनिक आश्रय गृह (Shelter Homes):

   – प्रत्येक जिले में कम से कम एक आश्रय गृह, 5,000+ आबादी वाले शहरों में प्रति 1 लाख पर एक।

   – सुविधाएं: पशु चिकित्सा क्लिनिक, स्टेरलाइजेशन सेंटर, भोजन, पानी, खेल क्षेत्र।

   – नसबंदी (Sterilization) और टीकाकरण (Vaccination) अनिवार्य – ABC (Animal Birth Control) नियम 2023 के तहत।

   – गोद लेने की प्रक्रिया ऑनलाइन और ऑफलाइन।

  1. वित्तीय प्रावधान:

   – केंद्र सरकार ₹500 करोड़ का विशेष फंड जारी करे।

   – राज्य सरकारें PMC फंड से 30% राशि आवंटित करें।

   – नगर निगमों को प्रति कुत्ता ₹500 की सब्सिडी।

  1. जागरूकता और निगरानी:

   – स्कूलों में पशु कल्याण शिक्षा अनिवार्य।

   – हेल्पलाइन 1962 को 24×7 सक्रिय करें।

   – हर 3 महीने में राज्य स्तरीय समीक्षा बैठक।

कोर्ट की टिप्पणियां: संतुलित दृष्टिकोण
न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा, “हम पशु प्रेमी हैं, लेकिन मानव जीवन पहले आता है। कुत्तों को मारना नहीं, बल्कि नियंत्रित करना है।” कोर्ट ने पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 का हवाला देते हुए कहा कि हिंसा या जहर से मारना पूर्णतः प्रतिबंधित रहेगा। साथ ही, नसबंदी के बिना छोड़ना भी गैरकानूनी होगा।

कोर्ट ने पेटा इंडिया और फेडरेशन ऑफ इंडियन एनिमल प्रोटेक्शन ऑर्गनाइजेशन की दलीलें सुनीं, लेकिन कहा, “पशु अधिकार और मानव सुरक्षा में संतुलन जरूरी है।”

राज्य सरकारों की प्रतिक्रिया

  • दिल्ली: मुख्यमंत्री ने 10 नवंबर से विशेष अभियान की घोषणा की। एमसीडी को 50 गश्ती दल बनाने के आदेश।
  • महाराष्ट्र: मुंबई में 100 आश्रय गृह बनाने की योजना, 2,000 कुत्तों की नसबंदी शुरू।
  • कर्नाटक: बेंगलुरु में ड्रोन सर्विलेंस और जीपीएस ट्रैकिंग वाले कॉलर।
  • उत्तर प्रदेश: लखनऊ, नोएडा में 24×7 कंट्रोल रूम।

चुनौतियां और आलोचनाएं

  • एनजीओ का विरोध: कुछ संगठनों ने इसे “अमानवीय” बताया, कहा कि आश्रय गृहों में कुत्ते कैद जैसे रहेंगे।
  • वित्तीय बोझ: छोटे शहरों में फंड की कमी।
  • कार्यान्वयन: ग्रामीण क्षेत्रों में गश्ती दलों की कमी।

कोर्ट ने इन चिंताओं को दूर करने के लिए तीन सदस्यीय निगरानी समिति (पशु चिकित्सक, एनजीओ प्रतिनिधि, सरकारी अधिकारी) गठित की है।

प्रभाव और भविष्य

  • सकारात्मक: बच्चों, बुजुर्गों, मरीजों की सुरक्षा बढ़ेगी। रेबीज के मामले 50% तक कम हो सकते हैं।
  • दीर्घकालिक: नसबंदी से 5 साल में आबादी 30% कम होने की उम्मीद।
  • मॉडल: सिंगापुर, जापान जैसे देशों की तर्ज पर भारत में पहला व्यवस्थित मॉडल।

मानवता और पशु कल्याण का संतुलन
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आवारा कुत्तों की समस्या का मानवीय, वैज्ञानिक और स्थायी समाधान है। यह न तो कुत्तों के खिलाफ है, न ही पशु प्रेमियों के – बल्कि एक जिम्मेदार समाज की दिशा में कदम है। अब राज्य सरकारों, नगर निगमों और नागरिकों की जिम्मेदारी है कि इसे सख्ती से लागू करें। यदि आप अपने इलाके में आवारा कुत्तों की समस्या देख रहे हैं, तो 1962 पर कॉल करें या स्थानीय निकाय से शिकायत दर्ज करें। यह फैसला साबित करता है कि न्यायपालिका न केवल कानून बनाती है, बल्कि जीवन बचाती है।

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