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by-Ravindra Sikarwar

नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग की ओर से शुरू की गई विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन – SIR) प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता पर गहन बहस की तैयारी कर ली है। जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस ज्योमल्या बागची की बेंच ने शुक्रवार (8 नवंबर 2025) को कई याचिकाओं को 11 नवंबर सुबह 11:15 बजे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर लिया। यह मामला मूल रूप से बिहार विधानसभा चुनावों से जुड़ा है, जहां SIR के तहत ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 65 लाख से अधिक नाम कटने के आरोप लगे हैं। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह प्रक्रिया लाखों वैध वोटरों को अयोग्य ठहराने का माध्यम बन रही है, जो लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर रही है। निर्वाचन आयोग (ECI) ने इसे ‘सटीक और पारदर्शी’ बताते हुए इन आरोपों को ‘झूठे’ करार दिया है, लेकिन कोर्ट में अब इसकी कानूनी बुनियाद पर तीखी दलीलें होंगी।

SIR प्रक्रिया की शुरुआत और विस्तार: बिहार से पैन-इंडिया अभियान तक
निर्वाचन आयोग ने 24 जून 2025 को बिहार विधानसभा चुनावों से पहले SIR अभियान की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य वोटर लिस्ट को शुद्धिकरण करना बताया गया। इस प्रक्रिया में बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) घर-घर जाकर वोटरों का सत्यापन करते हैं, जिसमें 11 दस्तावेजों (जैसे पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस) की मांग की जाती है। बिहार में SIR के बाद ड्राफ्ट लिस्ट से 65 लाख नाम हटाए गए, जबकि 21.53 लाख नए नाम जोड़े गए। अंतिम वोटर लिस्ट 30 सितंबर को जारी हुई, जिसमें कुल मतदाताओं की संख्या 7.89 करोड़ से घटकर 7.42 करोड़ रह गई – यानी शुद्धिकरण के नाम पर 47 लाख नामों का नेट कमी। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि यह कमी विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय में असमान रूप से हुई, जो ‘वोटर सप्रेशन’ का रूप ले चुकी है।

ECI ने SIR को पूरे देश में विस्तारित करने का फैसला लिया, जिसके दूसरे चरण में 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (जैसे तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, पुडुचेरी) के 51 करोड़ वोटरों को कवर किया जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि यह समयबद्ध तरीके से चुनावी रणनीति का हिस्सा है, क्योंकि बिहार चुनावों के पहले चरण (121 सीटें) 7 नवंबर को संपन्न हो चुके हैं, जबकि दूसरे चरण (122 सीटें) 11 नवंबर को ही है। वोटिंग के दौरान ही सुनवाई होना इस मामले को और संवेदनशील बनाता है।

याचिकाकर्ताओं की प्रमुख दलीलें: लोकतंत्र पर हमला और आधार कार्ड की अनदेखी
याचिकाएं एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), द्रविड़ मुनेत्र कढ़गम (DMK), तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद और अन्य संगठनों ने दाखिल की हैं। वकील प्रशांत भूषण, जो ADR का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, ने कोर्ट में कहा, “यह मुद्दा लोकतंत्र की जड़ को छूता है। SIR प्रक्रिया में ECI का पूर्ण विवेकाधीन अधिकार असंवैधानिक है, जो लाखों वोटरों को हाशिए पर धकेल रहा है।”  उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट के 8 सितंबर 2025 के आदेश के बावजूद ECI आधार कार्ड को 12वें दस्तावेज के रूप में स्वीकार नहीं कर रहा, जो पहचान स्थापित करने के लिए अनुमत था (हालांकि नागरिकता का प्रमाण नहीं)।

DMK ने तमिलनाडु में SIR पर ‘तत्काल स्टे’ की मांग की, दावा करते हुए कि हाल ही में समरी रिविजन के बाद यह प्रक्रिया ‘संवैधानिक अतिचार’ है और व्यावहारिक रूप से ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC)’ का रूप ले रही है। पश्चिम बंगाल में TMC सांसद ने राज्य सरकार की ओर से याचिका दाखिल की, जिसमें कहा गया कि SIR ने बूथ लेवल पर फॉर्म वितरण में भारी अनियमितताएं कीं। ADR ने 8 अगस्त को एक अंतरिम आवेदन दाखिल किया, जिसमें बिहार SIR के दौरान नाम कटौती पर ECI से जवाब मांगा गया।

भूषण और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने तत्काल सुनवाई की मांग की, क्योंकि CEC नियुक्ति कानून (2023) की याचिका भी 11 नवंबर को ही है। उन्होंने SIR को प्राथमिकता दी, क्योंकि यह ‘वोटर लिस्ट की पवित्रता’ से जुड़ा है। कोर्ट ने अन्य महत्वपूर्ण मामलों (जैसे तमिलनाडु-केरल जल विवाद, शिवसेना सिंबल विवाद) को समायोजित कर SIR को समय दिया।

ECI का पक्ष: ‘झूठे आरोप’, कोई अपील नहीं और सटीक प्रक्रिया
निर्वाचन आयोग ने SIR को ‘वोटर लिस्ट शुद्धिकरण’ का आवश्यक कदम बताते हुए याचिकाकर्ताओं के आरोपों को खारिज किया। 16 अक्टूबर 2025 की सुनवाई में ECI ने कहा कि बिहार SIR ‘सटीक’ है और राजनीतिक दलों व एनजीओ द्वारा ‘झूठे आरोप’ लगाए जा रहे हैं ताकि प्रक्रिया को बदनाम किया जाए। आयोग के अनुसार, अंतिम लिस्ट जारी होने के बाद नाम हटाने के खिलाफ एक भी अपील नहीं आई। मुस्लिम समुदाय में ‘असमान कटौती’ के दावे को भी ECI ने ‘असत्य’ बताया।

ECI ने जोर दिया कि SIR डुप्लिकेट, मृत और अयोग्य वोटरों को हटाने के लिए है, जो चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करता है। 15 सितंबर को कोर्ट ने कहा था कि ECI संवैधानिक संस्था होने के नाते कानूनी मानकों का पालन कर रहा है, लेकिन किसी भी अवैधता पर प्रक्रिया रद्द हो सकती है। 28 जुलाई को कोर्ट ने स्पष्ट किया कि SIR पर स्टे नहीं लगाएगा, लेकिन 29 जुलाई को यदि याचिकाकर्ता 15 नामों का उदाहरण दें तो निगरानी करेगा।

कोर्ट के पिछले हस्तक्षेप: पारदर्शिता के निर्देश और सहायता
सुप्रीम कोर्ट ने पहले कई अहम निर्देश दिए हैं। 8 सितंबर को आधार को 12वें दस्तावेज के रूप में मान्यता दी, ताकि नाम शामिल करने में आसानी हो। 9 अक्टूबर को बिहार स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (SLSA) को नाम कटे वोटरों को तत्काल सहायता प्रदान करने का आदेश दिया। 4 नवंबर को सुनवाई टली क्योंकि जज संविधान पीठ में व्यस्त थे। कोर्ट ने ड्राफ्ट लिस्ट की तत्काल प्रकाशना और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के उपाय किए।

बिहार चुनावों का संदर्भ: वोटिंग और टर्नआउट पर प्रभाव
बिहार में 243 सीटों वाली विधानसभा के पहले चरण की वोटिंग 7 नवंबर को संपन्न हुई, जिसमें 64.66% टर्नआउट दर्ज किया गया – 1951 के बाद सबसे अधिक। दूसरे चरण की वोटिंग 11 नवंबर को है, और गिनती 14 नवंबर को। SIR के कारण वोटरों में भ्रम और नाम कटने की शिकायतें आईं, लेकिन ECI का कहना है कि प्रक्रिया ने चुनावी रुचि बढ़ाई। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद प्रवासी मजदूरों और अल्पसंख्यकों के वोटिंग पैटर्न को प्रभावित कर सकता है।

व्यापक निहितार्थ: राष्ट्रीय स्तर पर लोकतांत्रिक चुनौतियां
यह सुनवाई न केवल बिहार तक सीमित है, बल्कि पूरे देश की SIR प्रक्रिया पर असर डालेगी। यदि कोर्ट वैधता पर सवाल उठाता है, तो अन्य राज्यों में चल रही प्रक्रिया रुक सकती है। याचिकाकर्ता इसे ‘चुनाव चोरी’ का हथियार बताते हैं, जबकि ECI इसे ‘सुशासन’ का उपकरण। वकील नेहा राठी ने उल्लेख किया कि यह CEC नियुक्ति कानून से जुड़ा है, लेकिन SIR को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

11 नवंबर की सुनवाई लोकतंत्र की मजबूती पर केंद्रित होगी, जहां कोर्ट ECI के विवेकाधीन अधिकार, वोटर अधिकार और चुनावी निष्पक्षता पर फैसला ले सकता है। जैसा कि मामला आगे बढ़ेगा, यह भारत की निर्वाचन प्रक्रिया में एक मील का पत्थर साबित होगा।

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