Greenland crisisGreenland crisis
Spread the love

Greenland crisis : जनवरी 2026 में ग्रीनलैंड को लेकर उठा विवाद केवल अमेरिका और डेनमार्क के बीच का टकराव नहीं है, बल्कि यह उस वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था के भविष्य पर सवाल खड़ा करता है, जो दशकों से स्थिरता की प्रतीक मानी जाती रही है। अमेरिका के पूर्व और वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक नीतियों ने यह साफ कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय कानून, गठबंधन और साझे मूल्य अब पहले जैसे निर्णायक नहीं रह गए हैं। ग्रीनलैंड का मुद्दा नाटो के भीतर छिपे मूल संकट को उजागर करता है।

Greenland crisis ग्रीनलैंड क्यों बना महाशक्तियों की नजर में

ग्रीनलैंड भले ही बर्फ से ढका और कम आबादी वाला द्वीप हो, लेकिन इसकी भौगोलिक और रणनीतिक अहमियत असाधारण है। यह अमेरिका और रूस के बीच स्थित है, जिससे आर्कटिक क्षेत्र में सैन्य और निगरानी दृष्टि से इसका महत्व बढ़ जाता है। इसके नीचे दुर्लभ खनिजों और कीमती धातुओं के विशाल भंडार बताए जाते हैं, जो आधुनिक तकनीक, रक्षा उद्योग और हरित ऊर्जा के लिए अनिवार्य हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ पिघलने से नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं, जो वैश्विक व्यापार को तेज और सस्ता बना सकते हैं। पहले से मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने इस द्वीप को वॉशिंगटन के लिए और भी आकर्षक बनाते हैं।

Greenland crisis नाटो के सामने अभूतपूर्व चुनौती

ग्रीनलैंड विवाद ने नाटो के मूल सिद्धांत—“एक पर हमला, सब पर हमला”—को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। यदि एक सदस्य देश दूसरे सदस्य को सैन्य या आर्थिक दबाव से धमकाता है, तो गठबंधन की विश्वसनीयता कैसे बचेगी? यूरोपीय देशों द्वारा डेनमार्क के समर्थन में कदम उठाने और अमेरिका की जवाबी धमकियों ने यह स्पष्ट कर दिया कि नाटो के भीतर भरोसे की दरार गहरी हो चुकी है। पहली बार ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जो शक्ति सुरक्षा की गारंटी देती है, वही सबसे बड़ा खतरा भी बन सकती है। यह स्थिति नाटो को केवल सैन्य गठबंधन नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी कमजोर करती है।

अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का बदलता स्वरूप

ग्रीनलैंड संकट को अलग-थलग घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है, जिसमें ताकतवर देश अपने हितों के लिए संप्रभुता और कानून की सीमाओं को चुनौती दे रहे हैं। दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी व्यवस्था समानता, नियमों और संस्थाओं पर आधारित थी, लेकिन अब “ताकत ही कानून है” का सिद्धांत फिर उभरता दिख रहा है। संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं केवल बयानबाजी तक सीमित रह गई हैं, जबकि जमीनी हकीकत सैन्य और आर्थिक दबाव तय कर रहा है।

भारत के लिए संदेश और सबक

भारत के लिए यह संकट एक चेतावनी है। भारत ने हमेशा बहुपक्षीय व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय कानून और संतुलित कूटनीति से लाभ उठाया है। यदि प्रभाव क्षेत्रों की राजनीति हावी होती है, तो एशिया और हिंद-प्रशांत में भी अस्थिरता बढ़ सकती है। भारत को अब यह समझना होगा कि गठबंधन महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अंतिम सुरक्षा आत्मनिर्भरता, सैन्य क्षमता और स्वतंत्र निर्णय से ही आएगी।

ग्रीनलैंड विवाद बताता है कि दुनिया एक बार फिर अनिश्चित, बहुध्रुवीय और शक्ति-प्रधान दौर की ओर बढ़ रही है। इस नई वास्तविकता में भारत को अपने हितों की रक्षा के लिए अधिक सजग, मजबूत और रणनीतिक रूप से तैयार रहना होगा—क्योंकि आने वाले समय में संधियों से अधिक महत्व ताकत और संतुलन का होगा।

Also Read This: Delhi: निपाह वायरस-एक शांत लेकिन घातक चेतावनी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *