By: Ishu Kumar
Ghaziabad : तीन सगी बहनों द्वारा आत्महत्या की घटना ने पूरे समाज को भीतर तक झकझोर दिया है। यह घटना केवल एक परिवार का व्यक्तिगत दुख नहीं है, बल्कि डिजिटल युग में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, परवरिश की जटिलताओं और हमारी सामूहिक सामाजिक जिम्मेदारी पर गहरे सवाल छोड़ जाती है। 12, 14 और 16 वर्ष की बच्चियों का यह कदम इस बात की चेतावनी है कि मोबाइल और ऑनलाइन गेम्स किस तरह मासूम मन पर हावी होकर जीवन की समझ तक को विकृत कर सकते हैं।
Ghaziabad आभासी खेलों का मनोवैज्ञानिक जाल
ऑनलाइन टास्क-बेस्ड गेम्स और तथाकथित “लव गेम्स” बच्चों को पहले भावनात्मक रूप से अपने जाल में फंसाते हैं। दोस्ती, प्रशंसा और अपनापन देकर भरोसा बनाया जाता है, फिर धीरे-धीरे ऐसे कार्य दिए जाते हैं जो मानसिक दबाव बढ़ाते जाते हैं। इनकार करने पर डर, अपराधबोध और धमकी का सहारा लिया जाता है। परिणामस्वरूप बच्चा वास्तविक दुनिया से कटने लगता है। स्कूल जाना छूट जाता है, सामाजिक व्यवहार बदल जाता है और परिवार से संवाद लगभग समाप्त हो जाता है। गाजियाबाद की घटना में भी यही संकेत मिले—बच्चियां लंबे समय से एकांत में जी रही थीं और बाहरी दुनिया से उनका संपर्क लगभग टूट चुका था।
Ghaziabad परवरिश की बदलती जिम्मेदारियां
इस तरह की त्रासदियों के बाद अक्सर उंगलियां माता-पिता पर उठती हैं, लेकिन सच यह है कि डिजिटल दौर में परवरिश पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई है। कई बार माता-पिता बच्चों की लत को देर से समझ पाते हैं और जब समझते हैं, तो अचानक सख्ती या पूर्ण प्रतिबंध लगा देते हैं। संवाद के बिना लगाया गया यह अंकुश बच्चों को और अधिक अकेला व गोपनीय बना देता है। आज जरूरत है कि अभिभावक बच्चों के ऑनलाइन जीवन में रुचि लें, उनके खेल, दोस्तों और भावनाओं को समझें और डर के बजाय भरोसे का माहौल बनाएं।
समाज, स्कूल और सरकार की भूमिका
इस समस्या का समाधान केवल परिवार तक सीमित नहीं है। सरकार को सख्त लेकिन मानवीय डिजिटल नीतियां लागू करनी होंगी। खतरनाक गेम्स पर सिर्फ प्रतिबंध पर्याप्त नहीं, बल्कि प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही, उम्र-उपयुक्त कंटेंट और त्वरित शिकायत व्यवस्था जरूरी है। स्कूलों में डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को शिक्षा का हिस्सा बनाना समय की मांग है। समाज को भी यह समझना होगा कि मोबाइल केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि बच्चों के मन को गहराई से प्रभावित करने वाली शक्ति है।
यह घटना हमें चेतावनी देती है कि यदि बच्चों, तकनीक और कुटुंब के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो ऐसी पीड़ाएं बार-बार सामने आती रहेंगी। संवेदनशील संवाद, भावनात्मक सुरक्षा और सामूहिक जागरूकता ही टूटते बचपन और बिखरते कुटुंब को संभालने का रास्ता है।
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