By: Yogendra Singh
Gariaband : समाज में कुछ काम ऐसे होते हैं जिन्हें बेहद कठिन और केवल पुरुषों के वर्चस्व वाला माना जाता है। लेकिन छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले की सरस्वती सहानी ने इन रूढ़ियों को तोड़कर साहस की एक नई परिभाषा लिखी है। राजिम क्षेत्र की रहने वाली सरस्वती आज उन महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं, जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपना रास्ता खुद बनाना जानती हैं।
जब पुरुष पीछे हटे, तब सरस्वती ने संभाली जिम्मेदारी
Gariaband सरस्वती सहानी के इस चुनौतीपूर्ण सफर की शुरुआत एक संयोग से हुई। करीब 9 वर्ष पहले अस्पताल में एक शव के पोस्टमार्टम के लिए किसी सहायक की सख्त जरूरत थी। उस वक्त काम की संवेदनशीलता को देखते हुए जब कोई पुरुष आगे नहीं आया, तब अस्पताल में ‘आया’ के रूप में कार्यरत सरस्वती ने हिम्मत दिखाई। उन्होंने न केवल उस जिम्मेदारी को स्वीकार किया, बल्कि उसे पूरी निपुणता से निभाया। तब से लेकर आज तक, वे डॉक्टरों की देखरेख में इस कार्य को निरंतर कर रही हैं।
2 हजार से अधिक शवों का पोस्टमार्टम और अटूट साहस
Gariaband पिछले 9 वर्षों के अपने कार्यकाल में सरस्वती अब तक 2,000 से भी अधिक शवों का पोस्टमार्टम कर चुकी हैं। उनकी कार्यक्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक बार में लगातार 9 शवों के पोस्टमार्टम की प्रक्रिया में सहयोग कर अपनी मानसिक मजबूती का परिचय दिया था। मछली और मुर्गा बेचने जैसे संघर्षपूर्ण कार्यों से जीवन की शुरुआत करने वाली सरस्वती आज पुलिस और फॉरेंसिक जांच में एक महत्वपूर्ण कड़ी बन चुकी हैं, जिससे कई जटिल कानूनी गुत्थियों को सुलझाने में मदद मिलती है।
संघर्ष से सफलता तक: महिला सशक्तिकरण का जीवंत उदाहरण
Gariaband सरस्वती सहानी का जीवन संघर्षों की जीती-जागती कहानी है। शुरुआत में समाज और परिवार के लिए यह काम स्वीकार करना आसान नहीं था, लेकिन उनके अडिग हौसले ने सभी का मुंह बंद कर दिया। आज वे न केवल अपने परिवार का भरण-पोषण कर रही हैं, बल्कि प्रशासनिक गलियारों में भी उनके काम को सम्मान की नजर से देखा जाता है। उनकी यह कहानी बताती है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि उसे करने का जज्बा व्यक्ति को महान बनाता है।
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