By: Ravindra Sikarwar
भारत ने विज्ञान और रक्षा के क्षेत्र में दो बड़ी सफलताएं हासिल की हैं। एक तरफ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अमेरिकी कंपनी AST SpaceMobile के ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 उपग्रह का सफल प्रक्षेपण किया, जो अब तक का सबसे भारी कमर्शियल पेलोड है। दूसरी तरफ, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने नई पीढ़ी की आकाश-एनजी वायु रक्षा मिसाइल प्रणाली के यूजर ट्रायल्स सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं। ये दोनों घटनाएं भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक हैं, जो वैश्विक स्तर पर देश की स्थिति को मजबूत कर रही हैं।


इसरो की ऐतिहासिक उपलब्धि: ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 का सफल प्रक्षेपण
इसरो ने 24 दिसंबर 2025 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से LVM3-M6 रॉकेट के जरिए 6,100 किलोग्राम वजनी ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 उपग्रह को लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में सफलतापूर्वक स्थापित किया। यह भारत से प्रक्षेपित किया गया अब तक का सबसे भारी कमर्शियल उपग्रह है, जो इसरो की भारी प्रक्षेपण क्षमता का प्रमाण है।
यह मिशन न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) और अमेरिकी कंपनी AST SpaceMobile के बीच कमर्शियल समझौते का हिस्सा है। ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 एक अत्याधुनिक संचार उपग्रह है, जो सामान्य स्मार्टफोन्स को सीधे 4G और 5G ब्रॉडबैंड सेवाएं प्रदान करने में सक्षम है। बिना ग्राउंड टावरों के यह तकनीक दूरदराज के इलाकों, पहाड़ी क्षेत्रों, समुद्रों और आपदा प्रभावित जगहों पर संचार सुविधा उपलब्ध कराएगी। उपग्रह में बड़ा फेज्ड ऐरे एंटीना लगा है, जो वैश्विक कनेक्टिविटी को क्रांतिकारी बना सकता है।
इस सफलता से इसरो की विश्वसनीयता और बढ़ी है। LVM3 रॉकेट ने अपनी 100% सफलता दर बरकरार रखी है, और यह मिशन भारत को अंतरराष्ट्रीय कमर्शियल अंतरिक्ष बाजार में मजबूत खिलाड़ी बनाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे गगनयान जैसे भविष्य के मिशनों के लिए मजबूत आधार बताया है।


रक्षा क्षेत्र में मजबूती: आकाश-एनजी के सफल यूजर ट्रायल्स
इसी सप्ताह डीआरडीओ ने आकाश-एनजी (नेक्स्ट जेनरेशन) मिसाइल सिस्टम के यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल्स सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं। यह पूरी तरह स्वदेशी वायु रक्षा प्रणाली है, जो अब भारतीय सेना और वायुसेना में शामिल होने के लिए तैयार है।
ट्रायल्स के दौरान मिसाइल ने विभिन्न दूरी और ऊंचाई पर हवाई लक्ष्यों को सटीकता से नष्ट किया, जिसमें कम ऊंचाई पर सीमा के पास उड़ने वाले और दूर उच्च ऊंचाई वाले लक्ष्य शामिल थे। आकाश-एनजी में स्वदेशी रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर, डुअल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर और आधुनिक रडार सिस्टम लगे हैं। इसकी मारक क्षमता बढ़ाकर 70-80 किलोमीटर तक की गई है, और यह ड्रोन, क्रूज मिसाइलें, लड़ाकू विमान जैसे आधुनिक खतरों का मुकाबला कर सकती है।
यह प्रणाली ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ की भावना को साकार करती है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ, वायुसेना और उद्योग को बधाई दी, कहा कि यह भारतीय वायु रक्षा को और मजबूत बनाएगी।



इन सफलताओं का व्यापक महत्व
ये दोनों उपलब्धियां अलग-अलग क्षेत्रों की हैं, लेकिन इनका संदेश एक है – भारत अब तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर और वैश्विक साझेदार बन चुका है। अंतरिक्ष में कमर्शियल लॉन्च से आर्थिक लाभ और अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ेगा, जबकि रक्षा में स्वदेशी मिसाइल से सीमाओं की सुरक्षा मजबूत होगी।
सरकार की नीतियों, जैसे अंतरिक्ष और रक्षा में निजी क्षेत्र की भागीदारी और अनुसंधान को प्रोत्साहन, ने इन सफलताओं को संभव बनाया है। ये घटनाएं भारत को विकास और सुरक्षा दोनों मोर्चों पर विश्व शक्ति के रूप में स्थापित कर रही हैं। आने वाले वर्षों में गगनयान, चंद्र मिशन और नई रक्षा प्रणालियां इसी आत्मविश्वास से आगे बढ़ेंगी।
