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by-Ravindra Sikarwar

भारतीय विमानन क्षेत्र में एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। एयर इंडिया के बोइंग 787 ड्रीमलाइनर विमानों में बार-बार हो रही तकनीकी खराबियों ने पायलटों के बीच गहरी चिंता पैदा कर दी है। देश के प्रमुख पायलट संगठन, फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स (एफआईपी), ने नागरिक उड्डयन मंत्री किंजरापु राम मोहन नायडू को पत्र लिखकर सभी बोइंग 787 विमानों को तत्काल ग्राउंड करने और उनके विद्युत सिस्टम की गहन जांच कराने की मांग की है। संगठन का कहना है कि इन विमानों में लगातार हो रही विद्युत और अन्य सिस्टम फेल्योर से हवाई यात्रा की सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है। एयर इंडिया ने इन आरोपों का खंडन किया है, लेकिन पायलटों की मांग ने विमानन नियामक डीजीसीए पर दबाव बढ़ा दिया है। आइए, इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।

जून के हादसे ने खोली विमानों की कमजोरियां:
यह विवाद जून 2025 में हुए एक भयानक हादसे से शुरू हुआ। 12 जून को एयर इंडिया की फ्लाइट एआई-171, जो बोइंग 787-8 विमान से अहमदाबाद से लंदन जा रही थी, अहमदाबाद हवाईअड्डे के पास ही दुर्घटनाग्रस्त हो गई। इस हादसे में 260 लोगों की जान चली गई, जो बोइंग 787 ड्रीमलाइनर का पहला पूर्ण नुकसान था। जांच अभी जारी है, लेकिन प्रारंभिक रिपोर्टों में विद्युत सिस्टम की खराबी को एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। इस दुर्घटना के बाद एयर इंडिया के बोइंग 787 फ्लीट पर सवाल उठने लगे। एफआईपी ने जून में ही डीजीसीए से सभी 787 विमानों के विद्युत सिस्टम की जांच की मांग की थी, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

पायलट संगठन के अनुसार, इस हादसे के बाद एयर इंडिया के 787 विमानों में कई छोटी-मोटी खराबियां सामने आईं। मार्च 2024 में एक अन्य घटना में, लाटम एयरलाइंस का बोइंग 787-9 विमान सिडनी से सैंटियागो जाते हुए अचानक 300 फीट नीचे गिर गया, जिसमें कई यात्री घायल हो गए। जून 2025 में एयर इंडिया की फ्लाइट एआई-315 हांगकांग से उड़ान भरने के 90 मिनट बाद ही ‘तकनीकी समस्या’ के कारण वापस लौटनी पड़ी। इन घटनाओं ने वैश्विक स्तर पर बोइंग 787 की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए।

हाल की घटनाएं जो बने खतरे की घंटी:
पिछले एक हफ्ते में दो गंभीर घटनाओं ने इस मुद्दे को फिर से सुर्खियों में ला दिया। पहली घटना 4 अक्टूबर को हुई, जब एयर इंडिया की फ्लाइट एआई-117 अमृतसर से बर्मिंघम (यूके) जा रही थी। बोइंग 787-8 (रजिस्ट्रेशन वीटी-एएनओ) विमान लैंडिंग के दौरान रनवे 33 पर अप्रोच कर रहा था, तभी इसका राम एयर टर्बाइन (आरएटी) – एक इमरजेंसी पावर सिस्टम – बिना किसी चेतावनी के स्वचालित रूप से तैनात हो गया। आरएटी विमान के फ्यूजलेज से बाहर निकलकर हवा से बिजली पैदा करता है, जो कुल विद्युत या हाइड्रोलिक फेलियर के समय इस्तेमाल होता है। लेकिन इस मामले में इंजन, विद्युत और हाइड्रोलिक सिस्टम पूरी तरह सामान्य थे।

पायलटों ने तुरंत स्थिति को संभाला और विमान सुरक्षित रूप से लैंड करा लिया। विमान को अस्थायी रूप से ग्राउंड किया गया, जहां इंजीनियरों ने प्रारंभिक जांच की और कोई समस्या नहीं पाई। फिर भी, रिटर्न फ्लाइट को रद्द कर दिया गया और अगले दिन ही सर्विस बहाल हुई। एफआईपी के अध्यक्ष कैप्टन चारनवीर सिंह रंधावा ने कहा, “मैंने कभी नहीं सुना कि आरएटी बिना किसी पावर लॉस या हाइड्रोलिक फेलियर के अपने आप तैनात हो जाए। यह बेहद असामान्य है।”

दूसरी घटना 9 अक्टूबर को घटी, जब फ्लाइट एआई-154 वियना (ऑस्ट्रिया) से दिल्ली आ रही थी। विमान में प्रमुख तकनीकी खराबी का पता चला, जिसके कारण इसे दुबई डायवर्ट करना पड़ा। यात्रियों को दिल्ली के बजाय दुबई में उतारा गया और बाद में वैकल्पिक व्यवस्था की गई। दोनों घटनाओं में बोइंग 787-8 विमान शामिल थे, जो लंबी दूरी की उड़ानों के लिए इस्तेमाल होते हैं।

पायलट संगठन की तीन प्रमुख मांगें:
10 अक्टूबर को एफआईपी ने नागरिक उड्डयन मंत्री को पत्र लिखा, जिसका शीर्षक था “लगातार विद्युत समस्याओं के मद्देनजर सभी बी-787 को ग्राउंड करना और एयर इंडिया विमानों की रखरखाव के लिए विशेष डीजीसीए ऑडिट”। पत्र में कहा गया कि एआई-171 हादसे के बाद एयर इंडिया के विमानों में कई फेलियर हुए हैं, लेकिन इनके कारणों की जांच न होने से हवाई सुरक्षा खतरे में है। संगठन ने तीन मुख्य मांगें रखीं:

  1. दोनों हालिया घटनाओं की गहन जांच: एआई-117 और एआई-154 की घटनाओं की स्वतंत्र और विस्तृत जांच कराई जाए, जिसमें आरएटी डिप्लॉयमेंट और अन्य सिस्टम फेलियर के कारणों का पता लगाया जाए।
  2. पूरे फ्लीट को ग्राउंड करना: सभी एयर इंडिया बोइंग 787 विमानों को तत्काल ग्राउंड किया जाए और उनके विद्युत सिस्टम, हाइड्रोलिक्स तथा अन्य बार-बार हो रही खराबियों की पूरी जांच कराई जाए। एफआईपी ने चेतावनी दी कि “खराबियां दिन-प्रतिदिन बढ़ रही हैं, जो हवाई सुरक्षा को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही हैं।”
  3. विशेष डीजीसीए ऑडिट: डीजीसीए के फ्लाइट सेफ्टी डायरेक्टोरेट (एफएसडी), एयर सेफ्टी और एयरवर्थिनेस के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा एयर इंडिया के रखरखाव का विशेष ऑडिट कराया जाए। इसमें मिनिमम इक्विपमेंट लिस्ट (एमईएल) रिलीज और दोहराव वाली खराबियों पर विशेष ध्यान दिया जाए।

एफआईपी ने यह भी आरोप लगाया कि एयर इंडिया के इन-हाउस इंजीनियरिंग टीम को सौंपे गए रखरखाव कार्य के बाद से खराबियां बढ़ी हैं। संगठन 6,000 से अधिक पायलटों का प्रतिनिधित्व करता है और विमानन सुरक्षा के लिए सक्रिय रूप से काम करता है।

एयर इंडिया का जवाब: ‘सुरक्षा सर्वोपरि, कोई विद्युत फेलियर नहीं’
एयर इंडिया ने पायलटों के आरोपों का तीखा खंडन किया है। एयरलाइन के प्रवक्ता ने कहा, “यात्रियों और क्रू की सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है। एआई-117 में किसी विद्युत या हाइड्रोलिक फेलियर का कोई दावा गलत है। प्रारंभिक जांच में सभी पैरामीटर सामान्य पाए गए। हमने डीजीसीए को रिपोर्ट सौंप दी है।” एयर इंडिया के पास अप्रैल 2025 तक 34 बोइंग 787 विमान हैं, जिनमें से अधिकांश लंबी दूरी की अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए इस्तेमाल होते हैं। कंपनी ने कहा कि सभी रखरखाव अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हैं।

बोइंग ने भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और मामले को भारतीय विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो पर छोड़ दिया। डीजीसीए ने कहा कि वह दोनों घटनाओं की जांच कर रहा है और आवश्यक कदम उठाएगा।

व्यापक प्रभाव और सुरक्षा पर बहस:
यह विवाद न केवल एयर इंडिया बल्कि पूरे भारतीय विमानन उद्योग को प्रभावित कर सकता है। यदि सभी 787 विमान ग्राउंड होते हैं, तो दिल्ली से न्यूयॉर्क, लंदन और अन्य प्रमुख मार्गों पर उड़ानें प्रभावित होंगी, जिससे हजारों यात्री फंस सकते हैं और करोड़ों का नुकसान हो सकता है। एफआईपी का कहना है कि बोइंग 787 जैसे आधुनिक विमानों में कंपोजिट फ्यूजलेज और उन्नत सिस्टम होने के बावजूद रखरखाव की कमी घातक साबित हो सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना वैश्विक स्तर पर बोइंग 787 की सुरक्षा पर पुनर्विचार की मांग करती है। नागरिक उड्डयन मंत्री नायडू ने हाल ही में एयरलाइनों से सुरक्षा प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन करने को कहा था। अब सवाल यह है कि क्या सरकार पायलटों की मांग मानेगी या एयर इंडिया के दावों पर भरोसा करेगी। हवाई यात्रा के इस दौर में, जहां भारत दुनिया का सबसे तेज बढ़ता विमानन बाजार है, सुरक्षा को कभी समझौता नहीं किया जा सकता। यह मामला पायलटों, एयरलाइन और नियामकों के बीच संवाद की जरूरत को रेखांकित करता है, ताकि भविष्य में कोई बड़ा हादसा न हो।

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