By: Ravindra Sikarwar
भोपाल: मध्य प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को एक नया सम्मान मिला है। भारत सरकार ने प्रदेश की चार अनमोल शिल्प कलाओं को भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication – GI) टैग प्रदान कर दिया है। इस सूची में ग्वालियर का पारंपरिक पत्थर शिल्प और पेपर मेशे क्राफ्ट, खजुराहो की विश्व प्रसिद्ध स्टोन क्राफ्ट, छतरपुर की लकड़ी की फर्नीचर कारीगरी तथा बैतूल की अनोखी भेरवा धातु शिल्प कला शामिल हैं। जैसे ही यह खबर शिल्पकारों तक पहुँची, उनके घरों-कारखानों में खुशी का माहौल छा गया। कई दशकों से चली आ रही इन कलाओं को अब वैश्विक पहचान मिलने वाली है।
आखिर GI टैग होता क्या है?
GI टैग कोई साधारण प्रमाण-पत्र नहीं है। यह एक कानूनी सुरक्षा कवच है जो किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र में सदियों से चली आ रही विशिष्ट कारीगरी या उत्पाद को मिलता है। इसका मतलब यह है कि अब दुनिया में कहीं भी यदि कोई व्यक्ति या कंपनी “खजुराहो स्टोन क्राफ्ट”, “ग्वालियर स्टोन कार्विंग”, “बैतूल भेरवा मेटल क्राफ्ट” या “छतरपुर फर्नीचर” नाम का इस्तेमाल करना चाहेगी, तो उसे साबित करना होगा कि उसका उत्पाद वास्तव में मध्य प्रदेश के इन इलाकों में उसी पारंपरिक तरीके से बना है। यदि कोई बाहर का व्यक्ति या फैक्ट्री इन नामों का दुरुपयोग कर नकली माल बेचेगी, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकेगी।
साधारण भाषा में कहें तो जैसे दार्जिलिंग चाय सिर्फ दार्जिलिंग में उगाई गई चाय को ही कहा जा सकता है, वैसे ही अब खजुराहो की नक्काशीदार मूर्तियाँ सिर्फ खजुराहो क्षेत्र में बने पत्थरों से बनी कलाकृतियों को ही असली माना जाएगा।
शिल्पकारों को क्या-क्या फायदे होंगे?
- नकली सामान पर रोक: बाजार में सस्ते चीनी या दूसरे राज्यों के नकली प्रोडक्ट नहीं बिक सकेंगे।
- अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान: अब ये कलाकृतियाँ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स, अंतरराष्ट्रीय मेलों और निर्यात में प्रीमियम कीमत पर बिकेंगी।
- सरकारी गिफ्ट में शामिल होने का मौका: विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और मेहमानों को प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या राजदूत अब आत्मविश्वास के साथ ये कलाकृतियाँ भेंट कर सकेंगे।
- शिल्पकारों की आय में बढ़ोतरी: असली पहचान मिलने से ग्राहक सीधे कारीगरों से जुड़ेंगे, बिचौलियों की मनमानी कम होगी।
- नई पीढ़ी का जुड़ाव: जब बच्चे देखेंगे कि उनके पूर्वजों की कला को देश-दुनिया सम्मान दे रही है, तो वे भी इस विरासत को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित होंगे।
कौन-कौन सी कलाएँ शामिल हुईं?
- खजुराहो स्टोन क्राफ्ट: यूनेस्को विश्व धरोहर मंदिरों की नक्काशी से प्रेरित यह कला अब कानूनी रूप से सिर्फ खजुराहो क्षेत्र की ही कहलाएगी।
- ग्वालियर पत्थर शिल्प और पेपर मेशे: ग्वालियर का किला और महल इसके जीते-जागते प्रमाण हैं। साथ ही रंग-बिरंगी पेपर मेशे की मूर्तियाँ और खिलौने भी अब सुरक्षित।
- छतरपुर फर्नीचर: बुंदेलखंड की लकड़ी पर की जाने वाली बारीक नक्काशी वाला फर्नीचर अब दुनिया में “छतरपुर स्टाइल” के नाम से जाना जाएगा।
- बैतूल भेरवा मेटल क्राफ्ट: आदिवासी बहुल बैतूल जिले की यह पीतल और कांस्य की अनोखी धातु कला है, जिसे गोंड और कोरकू समुदाय के कारीगर पीढ़ियों से संजोए हुए हैं।
नेताओं और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
एमएसएमई मंत्री ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को धन्यवाद देते हुए कहा कि यह जीआई टैग प्रदेश की कला और कारीगरों के लिए ऐतिहासिक दिन है। वहीं “जीआई मैन ऑफ इंडिया” के नाम से मशहूर पद्मश्री डॉ. रजनीकांत ने इसे मध्य प्रदेश की कला-संस्कृति के लिए स्वर्णिम अध्याय बताया। उन्होंने कहा, “एक साथ चार जीआई टैग मिलना बहुत बड़ी उपलब्धि है। इससे न केवल कारीगरों का आर्थिक उत्थान होगा, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ भी अपनी धरोहर पर गर्व करेंगी।”
शिल्पकारों का कहना है कि अब उन्हें लगता है कि उनकी मेहनत को देश ने सम्मान दिया है। कई कारीगरों ने बताया कि पहले बाहर के व्यापारी उनकी कलाकृतियाँ खरीदकर दूसरे नाम से बेच देते थे, अब ऐसा नहीं होगा।
मध्य प्रदेश अब जीआई टैग की दौड़ में तेजी से आगे बढ़ रहा है। पहले चंदेरी साड़ी, महेश्वरी साड़ी, बटिक प्रिंट, लेदर टॉयज आदि को यह सम्मान मिल चुका है। इन चार नई कलाओं के शामिल होने से प्रदेश का कुल जीआई टैगों का आँकड़ा और मजबूत हुआ है।
यह खुशी की लहर सिर्फ शिल्पकारों तक सीमित नहीं है। यह पूरे मध्य प्रदेश की जीत है, उस विरासत की जीत है जो सदियों से हमारे हाथों में साँस ले रही थी। अब दुनिया उसे असली नाम और असली पहचान के साथ जानेगी।
