by-Ravindra Sikarwar
वाशिंगटन: अमेरिकी रक्षा विभाग के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सख्त विदेश नीति की सराहना की है। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी का रुख यह दर्शाता है कि अब अमेरिका भारत को हल्के में नहीं ले सकता। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर रणनीतिक साझेदारी के साथ-साथ कुछ मतभेद भी सामने आए हैं।
मोदी के रुख से भारत की मजबूत स्थिति उजागर:
पूर्व पेंटागन अधिकारी ने एक मीडिया इंटरव्यू में कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने दिखाया है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखता है, भले ही इसके लिए अमेरिका से कड़ा रुख अपनाना पड़े। उनका मानना है कि मोदी सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब कोई ऐसा देश नहीं है जिसे अमेरिका अपने भू-राजनीतिक लक्ष्यों के लिए आसानी से ‘इस्तेमाल’ कर सके।
अधिकारी ने कहा, “मोदी ने अमेरिका को यह साफ संदेश दिया है कि भारत अपनी शर्तों पर काम करेगा। चाहे वह रूस से तेल खरीदने का मामला हो, या रक्षा समझौते का, भारत ने अपनी स्वतंत्रता का परिचय दिया है। यही कारण है कि आज अमेरिका को भारत के साथ अपने संबंधों में अधिक सावधानी और सम्मान बरतना पड़ रहा है।”
रक्षा और व्यापार में साझेदारी, फिर भी स्वायत्तता:
यह टिप्पणी इस बात की ओर इशारा करती है कि अमेरिका में भी कुछ लोग भारत की बढ़ती वैश्विक शक्ति और रणनीतिक स्वायत्तता को स्वीकार कर रहे हैं। अधिकारी ने स्वीकार किया कि भारत और अमेरिका के बीच रक्षा और व्यापार के क्षेत्र में मजबूत साझेदारी है, लेकिन भारत ने अपनी विदेश नीति को किसी एक देश के प्रभाव में आने से बचाया है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, तो भारत ने अपने ऊर्जा और रक्षा संबंधों को बनाए रखा। इस फैसले को पीएम मोदी के मजबूत नेतृत्व का परिणाम माना गया। पूर्व अधिकारी के अनुसार, यह दृष्टिकोण न केवल भारत के लिए फायदेमंद है, बल्कि यह एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है।
“अब भारत को ‘धक्का’ नहीं दे सकते”:
अधिकारी ने अपने बयान में कहा, “वह दिन चले गए जब अमेरिका किसी भी देश को ‘धक्का’ दे सकता था। मोदी ने यह सुनिश्चित किया है कि भारत को अब इस तरह से नहीं देखा जा सकता। उनका यह सख्त रुख दिखाता है कि भारत अब एक प्रमुख शक्ति है और उसके फैसले का सम्मान किया जाना चाहिए।”
यह बयान उन अमेरिकी हलकों में बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है जो भारत को एक स्वतंत्र और महत्वपूर्ण वैश्विक खिलाड़ी के रूप में देख रहे हैं, न कि सिर्फ अमेरिका के सहयोगी के रूप में।

