By: Ravindra Sikarwar
भोपाल के वल्लभ भवन स्थित मध्य प्रदेश सचिवालय (मंत्रालय) में चार वर्ष पूर्व शुरू की गई केंद्रीयकृत डाक प्राप्ति इकाई (सीआरयू) को अब पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है। सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) द्वारा इस संबंध में औपचारिक आदेश जारी किए गए हैं। इस इकाई के बंद होने के बाद, मंत्रालय में आने वाले सभी पत्र और डाक अब पहले की तरह प्रत्येक विभाग द्वारा अलग-अलग प्राप्त किए जाएंगे। यह व्यवस्था पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में उनकी महत्वाकांक्षी योजना के रूप में पेश की गई थी, लेकिन कार्यान्वयन में आई कमियों के कारण यह असफल साबित हुई।
यह केंद्रीयकृत प्रणाली मई 2021 में शुरू की गई थी, जब ई-ऑफिस सिस्टम को मंत्रालय में लागू करने का निर्णय लिया गया। इसका मुख्य उद्देश्य बाहर से आने वाली सभी डाक को एक ही जगह पर प्राप्त करना और फिर उसे संबंधित विभागों तक पहुंचाना था, ताकि प्रक्रिया तेज और सुव्यवस्थित हो सके। शुरुआत में यह सुविधा केवल 22 विभागों के लिए उपलब्ध कराई गई थी, जबकि योजना सभी 56 विभागों तक इसका विस्तार करने की थी। वल्लभ भवन के आधार तल में एक विशेष इकाई स्थापित की गई, जहां आधुनिक तकनीक का उपयोग करने का दावा किया गया।
इस प्रोजेक्ट को प्रभावी बनाने के लिए विभाग ने कंप्यूटर, फर्नीचर, स्कैनर और अन्य उपकरणों की बड़े पैमाने पर खरीदारी की, जिसमें करोड़ों रुपये खर्च हुए। अधिकारियों का कहना था कि इससे डाक पंजीकरण और वितरण की गति बढ़ेगी तथा कागजी कार्यवाही कम होगी। हालांकि, वास्तविकता इससे उलट साबित हुई। खरीदे गए कंप्यूटरों की गुणवत्ता बेहद निम्न स्तर की थी, जिसके कारण वे धीमी गति से काम करते थे। नतीजतन, डाक दर्ज करने और आगे भेजने की प्रक्रिया पहले से भी अधिक समय लेने लगी। कर्मचारियों की कमी और प्रशिक्षण की अनुपस्थिति ने भी इस व्यवस्था को कमजोर कर दिया।
समय के साथ यह इकाई सिमटती गई और अंत में केवल सात विभागों तक सीमित रह गई। कई विभागों ने इसे अप्रभावी बताते हुए पुरानी व्यवस्था पर वापस लौटने की मांग की। पूर्व में जीएडी के अपर मुख्य सचिव मनीष रस्तोगी ने इसकी समीक्षा की थी, जिसमें सुधार के सुझाव दिए गए थे, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। अंततः वर्तमान अपर मुख्य सचिव संजय शुक्ला ने पूरी व्यवस्था को बंद करने का फैसला लिया। आदेशों के अनुसार, पहले 31 दिसंबर और फिर 19 दिसंबर 2025 के बाद सीआरयू में कोई नई डाक स्वीकार नहीं की जाएगी।
इस पूरे मामले में अनियमितताओं के आरोप भी लगे हैं। खरीद प्रक्रिया में भ्रष्टाचार की आशंका जताई जा रही है, खासकर तत्कालीन अपर मुख्य सचिव विनोद कुमार के कार्यकाल में हुई खरीदारी को लेकर। एक पूर्व उपसचिव की भूमिका भी संदिग्ध बताई जाती है। संबंधित दस्तावेजों को विभाग ने गोपनीय घोषित कर दिया है, और सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मांगी गई जानकारी भी सार्वजनिक नहीं की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शुरुआत में ही उचित निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण रखा जाता, तो यह प्रणाली सफल हो सकती थी, लेकिन लापरवाही ने इसे विफल बना दिया।
अब मंत्रालय पुरानी विभागीय डाक व्यवस्था पर वापस आ गया है, जहां प्रत्येक विभाग अपनी डाक खुद संभालता है। इससे ई-ऑफिस के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अधिक जोर दिया जा रहा है, ताकि भविष्य में कागजी डाक की निर्भरता कम हो सके। यह घटना सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में आने वाली चुनौतियों को उजागर करती है, जहां बड़ी घोषणाओं के बावजूद जमीन पर असर नहीं दिखता। मध्य प्रदेश सरकार के लिए यह एक सबक है कि किसी भी नई पहल को सफल बनाने के लिए निरंतर मॉनिटरिंग और संसाधनों का सही उपयोग आवश्यक है।
