By: Ravindra Sikarwar
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना के शताब्दी वर्ष में देश भर में हिंदू सम्मेलनों का आयोजन जोर-शोर से चल रहा है। इसी कड़ी में 31 दिसंबर 2025 को छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले के अभनपुर क्षेत्र में स्थित सोनपैरी गांव के असंग देव कबीर आश्रम में एक भव्य हिंदू सम्मेलन का आयोजन हुआ। इस कार्यक्रम में संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय संत असंग देव और विशिष्ट अतिथि के रूप में गायत्री परिवार की वरिष्ठ समाजसेवी उर्मिला नेताम ने शिरकत की। हजारों की संख्या में एकत्रित लोगों ने संघ की शताब्दी यात्रा को उत्साह के साथ मनाया और समाज में सकारात्मक बदलाव की दिशा में प्रेरणा ग्रहण की।
डॉ. मोहन भागवत ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि संघ का शताब्दी वर्ष कोई मात्र उत्सव या प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र निर्माण और समाज सेवा के कार्य को नई गति प्रदान करने का सुनहरा अवसर है। देश के विभिन्न हिस्सों में मंडल स्तर पर हो रहे इन सम्मेलनों का उद्देश्य स्वयंसेवकों को ‘पंच परिवर्तन’ के संदेश के साथ समाज के हर घर तक पहुंचाना है। उन्होंने जोर देकर कहा कि हम केवल समस्याओं या संकटों की चर्चा नहीं करते, बल्कि उनके समाधान पर भी विचार करते हैं। यदि समाज दृढ़ संकल्पित रहे, तो कोई भी चुनौती हमें प्रभावित नहीं कर सकती।
संघ प्रमुख ने अपनी बात को और रोचक बनाने के लिए एक प्रेरणादायक कहानी सुनाई। एक खरगोश सो रहा था, तभी एक पत्ता गिरने की आवाज से वह घबरा गया। उसने भगवान से प्रार्थना की कि उसे छोटा क्यों बनाया, हाथी जैसा बड़ा बना देते तो अच्छा होता। भगवान ने उसकी इच्छा पूरी कर दी। अब खरगोश तालाब पर पानी पीने गया, तो मेढकों ने चेतावनी दी कि वहां मगरमच्छ है। खरगोश ने फिर भगवान से मोटी खाल मांगी, और भगवान ने वह भी दे दी। अगले दिन जंगल में भैंसों का झुंड आया, तो जानवरों ने कहा कि मोटी खाल यहां काम नहीं आएगी। अंत में भगवान ने खरगोश को समझाया कि अलग-अलग शारीरिक बदलाव मांगने के बजाय भय को ही खत्म करने का वरदान मांगना चाहिए था। इस कहानी के माध्यम से डॉ. भागवत ने संदेश दिया कि समाज की समस्याओं का समाधान बाहरी बदलावों में नहीं, बल्कि आंतरिक दृढ़ता और एकता में छिपा है।
#### पंच परिवर्तन के पांच स्तंभ
डॉ. भागवत ने विस्तार से ‘पंच परिवर्तन’ के सिद्धांतों की व्याख्या की, जो संघ के शताब्दी वर्ष का मुख्य फोकस हैं। ये पांच बदलाव समाज को मजबूत, समरस और पर्यावरण अनुकूल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं:
1. **सामाजिक समरसता**: समाज में भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करना जरूरी है। हर वर्ग के लोगों के साथ उठना-बैठना, सुख-दुख में साथ होना चाहिए। सभी को अपना मित्र मानकर व्यवहार करना ही सच्ची समरसता है। उदाहरण के तौर पर, पानी का स्रोत चाहे कोई भी हो, वह सभी के लिए सुलभ होना चाहिए। इससे समाज में एकता और विश्वास बढ़ेगा।
2. **कुटुंब प्रबोधन (परिवार जागरण)**: हर घर में सप्ताह में एक दिन निर्धारित कर परिवार के सभी सदस्य एक साथ भजन करें, घर का बना भोजन साझा करें। इस दौरान आपसी सुख-दुख की बातें करें, देश की वर्तमान स्थिति पर चर्चा करें और महान आदर्शों को जीवन में उतारने के तरीके पर विचार करें। एक-दूसरे को प्रेरित करना परिवार को मजबूत बनाएगा।
3. **पर्यावरण संरक्षण**: ग्लोबल वार्मिंग जैसी बड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास जरूरी हैं। सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग कम करें, अधिक से अधिक पेड़ लगाएं और जल संचयन (वाटर हार्वेस्टिंग) की व्यवस्था करें। प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना हमारा दायित्व है।
4. **स्व आधारित जीवन शैली**: अपनी सांस्कृतिक पहचान को अपनाएं। घर, परिवार और समाज में अपनी मातृभाषा बोलें। यदि दूसरे प्रदेश में रहते हैं, तो वहां की भाषा भी सीखें, लेकिन अपनी भाषा न भूलें। पारंपरिक वेशभूषा पहनें, कम से कम पूजा-पाठ के समय तो जरूर। स्वदेशी उत्पादों का अधिक उपयोग करें। यह स्व का बोध जागृत करेगा और आत्मनिर्भरता बढ़ाएगा।
5. **नागरिक कर्तव्य और धर्मसम्मत आचरण**: संविधान का पालन करें, क्योंकि इसमें हमारे पूर्वजों की संस्कृति और मूल्यों का प्रतिबिंब है। कानून से परे भी नैतिक कर्तव्य निभाएं, जैसे माता-पिता और बुजुर्गों के चरण स्पर्श करना, जो विनम्रता सिखाता है। बच्चों को संस्कार दें और दान की परंपरा शुरू करें, ताकि उनमें जिम्मेदारी का भाव आए।
डॉ. भागवत ने बताया कि स्वयंसेवक इन पांच सिद्धांतों को पहले खुद अपनाते हैं, फिर समाज में ले जाते हैं। इन बदलावों को अपनाकर हर व्यक्ति राष्ट्र उन्नति में योगदान दे सकता है।
#### मातृशक्ति के प्रति सम्मान का प्रेरक दृश्य
कार्यक्रम में एक हृदयस्पर्शी पल तब आया जब मंच पर अतिथियों को आमंत्रित किया गया। आयु के कारण चलने में असुविधा महसूस कर रही उर्मिला नेताम को डॉ. मोहन भागवत ने खुद सहारा देकर मंच पर लाया और भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पित करने में मदद की। यह मातृशक्ति के प्रति आदर और स्नेह का जीवंत उदाहरण था, जिसने सभी को भावुक कर दिया।
#### अन्य वक्ताओं के विचार
मुख्य अतिथि राष्ट्रीय संत असंग देव ने कहा कि संघ स्वयंसेवा का पाठ पढ़ाता है। मधुमक्खियों की संगठित शक्ति हाथी को भी चुनौती देती है। मनुष्य जीवन देवताओं से भी श्रेष्ठ है, लेकिन इसके लिए संस्कार जरूरी हैं। हिंदू धर्म सभी संप्रदायों की जड़ है। आज की वैश्विक चुनौतियों में बंटने का नहीं, एकजुट होने का समय है। आपदा में संघ के स्वयंसेवक बिना प्रचार के सबसे आगे रहते हैं।
विशिष्ट अतिथि उर्मिला नेताम ने जोर दिया कि समाज को संगठन की सबसे ज्यादा जरूरत है। परिवार बिखर रहे हैं, विदेशी संस्कृति का आकर्षण बढ़ रहा है। भारतीय संस्कृति को बचाने के लिए संस्कार और मातृशक्ति का जागरण आवश्यक है।
#### सांस्कृतिक और पर्यावरणीय संदेश
सम्मेलन में छत्तीसगढ़ी लोक गायिका आरु साहू और उनकी टीम ने भजन और लोकगीत प्रस्तुत किए, जिससे वातावरण आध्यात्मिक हो उठा। कार्यक्रम के अंत में डॉ. भागवत ने गांव में कोविदार का पौधा रोपकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।
यह सम्मेलन न केवल संघ की शताब्दी यात्रा का हिस्सा था, बल्कि समाज को एक नई दिशा देने वाला आयोजन साबित हुआ। पंच परिवर्तन के इन सिद्धांतों को अपनाकर हम एक मजबूत, समृद्ध और समरस भारत का निर्माण कर सकते हैं। संघ का यह प्रयास आने वाले वर्षों में समाज में गहरा प्रभाव छोड़ेगा।
