Festival: लोहड़ी उत्तर भारत का एक प्रमुख लोक पर्व है, जो केवल मौसम के बदलाव का प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन में नई उम्मीद और सामूहिक उत्साह का संदेश भी देता है। यह पर्व किसान, समाज और प्रकृति के बीच के अनोखे संबंध को उजागर करता है।
Festival: लोहड़ी: सर्दियों की विदाई और नई ऊर्जा का प्रतीक
उत्तर भारत में लोहड़ी सर्दियों के अंत और बसंत ऋतु के आगमन का उत्सव है। यह ठिठुरन के बाद उष्मा, अंधकार के बाद प्रकाश और ठहराव के बाद गति का प्रतीक माना जाता है। जीवन में कठिनाईयों के बाद आने वाली राहत और उम्मीद का संदेश यह पर्व हमें सिखाता है।
Festival: कृषि और प्राकृतिक चक्र से जुड़ाव
लोहड़ी का मूल कृषि-जीवन में है।
रबी की फसलों की बुआई के बाद खेतों में हरियाली देखकर किसान में आशा और उत्साह का संचार होता है। गेहूं, सरसों और चने की फसलें आने वाले समय की समृद्धि का संकेत देती हैं। यह पर्व किसान की मेहनत, धैर्य और प्रकृति पर विश्वास का सम्मान करता है।
आग और सामूहिकता का महत्व
लोहड़ी के दौरान आग के चारों ओर तिल, गुड़, मूंगफली और रेवड़ी अर्पित करना केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार का प्रतीक है। आग ठंड और निराशा को भस्म कर नई ऊर्जा का संचार करती है। सामूहिक रूप से आग के चारों ओर खड़े होने से समाज में एकजुटता और सांस्कृतिक संवेदना विकसित होती है।
लोक कथाओं और लोकगीतों का संदेश
दुल्ला भट्टी की कथा और लोकगीत लोहड़ी को सिर्फ मौसमी पर्व नहीं बल्कि सामाजिक चेतना का प्रतीक बनाते हैं। यह न केवल अन्याय के खिलाफ खड़े होने, कमजोरों की रक्षा और स्त्री सम्मान के संदेश देती है, बल्कि बच्चों के लिए संस्कार और सामाजिक मूल्यों का माध्यम भी बनती है।
बदलती परंपराओं और आधुनिक प्रभाव
शहरीकरण और उपभोक्तावाद ने लोहड़ी की पारंपरिक सादगी और सामूहिकता को प्रभावित किया है। तेज संगीत, दिखावे और अनावश्यक खर्च ने पर्व के मूल भाव को कमजोर कर दिया है। फिर भी, लोकपरंपराएं पीढ़ियों के बीच संवाद कायम रखती हैं और हमें हमारी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती हैं। लोहड़ी का उत्सव हमें यह सिखाता है कि ऋतु परिवर्तन और प्राकृतिक चक्र केवल मौसम नहीं बदलते, बल्कि जीवन में सामूहिकता, उम्मीद और नई ऊर्जा का संचार भी करते हैं।

