by-Ravindra Sikarwar
असरानी को हाल ही में उम्र-संबंधी जटिलताओं के कारण मुंबई के जुहू में स्थित भारतीय आरोग्य निधि अस्पताल में भर्ती कराया गया था। चिकित्सकों ने बताया कि उनके फेफड़ों में ‘तरल का संग्रह’ (fluid accumulation) हुआ था।
- उनका निधन लगभग 3:00 PM के करीब हुआ।
- अंतिम संस्कार परिवार-सदस्यों की उपस्थिति में शांतिपूर्वक मुंबई के सांताक्रूज़ श्मशान में किया गया।
असरानी के परिवार ने एक बयान में कहा: “हमारे प्रिय, जिसने सबके चेहरे पर मुस्कान लाई, असरानी जी अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके द्वारा छू आ गई कलाकारी हमारी यादों में हमेशा रहेगी।”
उन्होंने अपनी इच्छा जाहिर की थी कि उनके अंतिम संस्कार को सार्वजनिक घटना न बनाया जाए—इसी अनुरोध के तहत शांति-पूर्वक अन्तिम क्रियाएँ संपन्न हुईं।
जीवन-परिचय:
- जन्मः 1 जनवरी 1941, जयपुर, राजस्थान में एक सिन्धी-हिन्दू मध्यवर्गीय परिवार में।
- प्रारंभिक शिक्षा सेंट जेवियर्स स्कूल, जयपुर में हुई और आगे राजस्थान कॉलेज से स्नातक। आर्थिक मदद के लिए उन्होंने All India Radio (जयपुर) में वॉइस आर्टिस्ट के रूप में कार्य भी किया।
- उन्होंने अभिनय-शिक्षा: Film & Television Institute of India (FTII) पुणे से प्राप्त की।
करियर-उपलब्धियाँ:
- उन्होंने अपनी शुरुआत हिन्दी फिल्मों में वर्ष 1967 में ‘हरे कांच की चूड़ियाँ’ से की।
- पूरी पांच दशक से अधिक की अवधि में उन्होंने 300 से अधिक फिल्मों में काम किया।
- उन्हें विशेष रूप से फिल्म Sholay (1975) में जेलर की भूमिका के लिए याद किया जाता है, जिस संवाद-“हम अंग्रेजों के ज़माने के जेलर हैं” ने संस्कृति में अपनी जगह बना ली।
- उनकी हास्य-सूझ, संवाद-बाँटने की कला और चरित्र-भूमिकाओं की विविधता ने उन्हें हिन्दी सिनेमा में एक विशेष स्थान दिलाया।
शोक और श्रद्धांजलियाँ:
सिने-दुनिया के कई बड़े नामों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है, जिसमें अभिनेता सलमान ख़ान और अभिनेत्री हेमा मालिनी शामिल हैं। उन्होंने असरानी को “वास्तव में हँसी के एक महानायक” कहा।
असरानी ने हास्य और चरित्र-अभिनय में जो क्रम स्थापित किया, वह आगामी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा। उनकी उपस्थिति-शैली, सहजता और विनम्र व्यक्तित्व काफ़ी प्रभावशाली रहा है। हिन्दी सिनेमा आज एक ऐसे चेहरे को विदा कह रहा है जिसने लाखों दिलों में मुस्कान जगाई। उनकी कमी लंबे समय तक महसूस होगी।
