By: Ravindra Sikarwar
झाबुआ जिला मुख्यालय पर वर्षों से चल रहे एक फर्जी क्लिनिक का पर्दाफाश होने से स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद का रहने वाला इमरान बीते तीन–चार वर्षों से झाबुआ में खुद को ‘डॉ. राना’ बताकर अवैध रूप से क्लिनिक संचालित कर रहा था। बुधवार को स्वास्थ्य विभाग की टीम ने कार्रवाई करते हुए इस फर्जी क्लिनिक को सील कर दिया और आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया। जांच के दौरान कथित डॉक्टर के पास से कई संदिग्ध और फर्जी डिग्रियां बरामद हुईं, जबकि पहचान के नाम पर केवल एक आधार कार्ड मिला।
स्वास्थ्य विभाग को लंबे समय से इस क्लिनिक को लेकर शिकायतें मिल रही थीं, लेकिन ठोस कार्रवाई अब जाकर की गई। स्वास्थ्य विभाग के नोडल अधिकारी डॉ. देवेंद्र भायल और चिकित्सा अधिकारी डॉ. विजेंद्र अपनी टीम के साथ मुस्लिम बस्ती स्थित हुड़ा क्षेत्र पहुंचे, जहां ‘डॉ. राणा’ नाम से क्लिनिक संचालित किया जा रहा था। मौके पर जब इमरान से क्लिनिक के पंजीयन और चिकित्सकीय योग्यता से जुड़े दस्तावेज मांगे गए, तो वह कोई वैध कागजात प्रस्तुत नहीं कर सका।
अधिकारियों द्वारा पूछताछ बढ़ाने पर कथित डॉक्टर के पास से अलग-अलग नामों से तीन से चार डिग्रियां मिलीं, जिनकी प्रामाणिकता संदिग्ध पाई गई। पहचान के लिए जो दस्तावेज मिला, वह आधार कार्ड था, जिसमें उसका असली नाम इमरान और पता गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश दर्ज था। इससे साफ हो गया कि वह झूठी पहचान के सहारे लोगों का इलाज कर रहा था।
कार्रवाई के दौरान इलाके में रहने वाले लोग बड़ी संख्या में मौके पर एकत्र हो गए। कुछ लोगों ने कथित डॉक्टर के पक्ष में नरमी बरतने की बात भी कही, लेकिन अधिकारियों ने नियमों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि बिना वैध पंजीयन और मान्यता के चिकित्सा कार्य करना गंभीर अपराध है। इसके बाद क्लिनिक को तत्काल सील कर दिया गया और पुलिस को सूचना दी गई।
थाना प्रभारी आर.सी. भास्करे ने बताया कि स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के आधार पर इमरान के खिलाफ किसी अन्य के नाम का उपयोग कर अवैध रूप से चिकित्सकीय कार्य करने का प्रकरण दर्ज किया गया है। आरोपी को हिरासत में लेकर आगे की जांच शुरू कर दी गई है। पुलिस अब यह भी पता लगाने में जुटी है कि वह कब से झाबुआ में रह रहा था और उसके नेटवर्क में और कौन-कौन शामिल हो सकते हैं।
स्वास्थ्य विभाग के जिला संचार अधिकारी प्रेम डेनियल ने जानकारी दी कि क्लिनिक से जो दस्तावेज बरामद हुए हैं, उनमें भोपाल निवासी मोहम्मद इरफान पिता मोहम्मद उस्मान की बीईएमएस और डीईएमएस से संबंधित डिग्रियां, उज्जैन निवासी मुस्तकीम अहमद पिता मुकीम अहमद की आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा पद्धति की रजिस्ट्रेशन प्रमाण पत्र, तथा रिजवान अली पिता अहसन अली के अन्य दस्तावेज शामिल हैं। ये सभी दस्तावेज पुलिस को सौंप दिए गए हैं, ताकि उनकी जांच की जा सके।
इस पूरे मामले ने झाबुआ शहर की सुरक्षा और प्रशासनिक सतर्कता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। पूर्व में भी ऐसे उदाहरण सामने आ चुके हैं, जब गंभीर अपराधों में शामिल लोग नाम बदलकर या गलत पते के सहारे जिले में लंबे समय तक छिपे रहे। इसके बावजूद किरायेदारों और बाहरी लोगों की जानकारी पुलिस को देने संबंधी आदेशों का कितना पालन हो रहा है, यह संदेह के घेरे में है।
प्रथम दृष्टया यह साफ है कि इमरान बिना किसी वैध योग्यता के वर्षों तक लोगों का इलाज करता रहा और उनकी जान जोखिम में डालता रहा। ऐसे में सवाल उठता है कि समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय क्यों नहीं की गई। यह घटना न केवल स्वास्थ्य विभाग के लिए चेतावनी है, बल्कि प्रशासन के लिए भी एक सबक है कि भविष्य में इस तरह की लापरवाही दोबारा न हो।
