by-Ravindra Sikarwar
नई दिल्ली: प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने गुरुवार (13 नवंबर 2025) को जेपी इंफ्राटेक लिमिटेड (जेआईएल) के प्रबंध निदेशक मनोज गौर को मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम (पीएमएलए), 2002 के तहत गिरफ्तार कर लिया। यह कार्रवाई घर खरीददारों के साथ कथित धोखाधड़ी से जुड़े एक बड़े वित्तीय घोटाले की जांच का हिस्सा है, जिसमें लगभग 12,000 करोड़ रुपये की राशि का अपवाह और हेराफेरी शामिल बताई जा रही है। गिरफ्तारी दिल्ली में हुई, और गौर को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। ईडी के अधिकारियों के अनुसार, यह मामला जेपी समूह की प्रमुख कंपनियों—जेपी इंफ्राटेक और जेपी एसोसिएट्स—की वित्तीय गड़बड़ियों पर केंद्रित है, जहां घर खरीददारों द्वारा जमा की गई राशि का गलत उपयोग किया गया। इस घटना ने रियल एस्टेट क्षेत्र में पहले से चली आ रही असंतोष को और बढ़ा दिया है, जहां हजारों परिवार वर्षों से अपनी सपनों की फ्लैट्स का इंतजार कर रहे हैं।
गिरफ्तारी का विवरण: जांच की एक कड़ी
मनोज गौर की गिरफ्तारी मई 2025 में ईडी द्वारा की गई छापेमारी के बाद हुई। एजेंसी ने दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद और मुंबई में जेआईएल, जेपी एसोसिएट्स तथा उनके सहयोगी संस्थानों के 15 ठिकानों पर तलाशी ली थी। इस दौरान 1.7 करोड़ रुपये नकद, वित्तीय दस्तावेज, डिजिटल डेटा और प्रमोटरों, उनके परिवार सदस्यों तथा समूह कंपनियों के नाम पर संपत्ति के रिकॉर्ड जब्त किए गए। गौर को पूछताछ के दौरान हिरासत में लिया गया, क्योंकि जांच में उनके खिलाफ प्रत्यक्ष सबूत मिले। ईडी का आरोप है कि गौर ने घर खरीददारों से लिए गए पैसे को अन्य परियोजनाओं में डायवर्ट किया, जिससे फ्लैट्स का निर्माण रुक गया।
ईडी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “यह गिरफ्तारी पीएमएलए के तहत की गई है, और हम पूरे नेटवर्क को उजागर करने के लिए आगे की कार्रवाई करेंगे।” गौर को दिल्ली की एक विशेष अदालत में पेश किया गया, जहां जज ने हिरासत की मंजूरी दी। यह मामला राष्ट्रीय कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में पहले से चल रहे दिवालिया कार्यवाही से जुड़ा है, जहां आईडीबीआई बैंक ने जेआईएल के खिलाफ 526 करोड़ रुपये के डिफॉल्ट पर याचिका दायर की थी।
घोटाले का पृष्ठभूमि: घर खरीददारों का धोखा
यह मामला 2017 में दर्ज की गई प्राथमिकी (एफआईआर) से उपजा है, जब नोएडा और ग्रेटर नोएडा के घर खरीददारों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया। जेपी इंफ्राटेक ने 2010-2011 के दौरान ‘जेपी विश्टाउन’ और ‘जेपी ग्रीन्स’ जैसे प्रोजेक्ट्स में फ्लैट्स बेचने के वादे किए, लेकिन खरीददारों को न तो कब्जा मिला और न ही रिफंड। लगभग 20,000 से अधिक घर खरीददार प्रभावित हुए हैं, जिन्होंने कुल 12,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा की थी। ईडी का दावा है कि यह धनराशि जेपी एसोसिएट्स लिमिटेड (जेएएल) के माध्यम से अन्य क्षेत्रों जैसे बुनियादी ढांचा और ऊर्जा परियोजनाओं में स्थानांतरित कर दी गई, जिससे आवासीय प्रोजेक्ट्स ठप हो गए।
| प्रमुख तथ्य | विवरण |
| घोटाले की राशि | 12,000 करोड़ रुपये (घर खरीददारों की जमा राशि का अपवाह) |
| प्रभावित खरीददार | 20,000 से अधिक परिवार (नोएडा, ग्रेटर नोएडा क्षेत्र) |
| प्रमुख प्रोजेक्ट्स | जेपी विश्टाउन, जेपी ग्रीन्स (फ्लैट्स का वादा 2010-11 में, कब्जा लंबित) |
| कानूनी आधार | आपराधिक साजिश (धारा 420 आईपीसी), धोखाधड़ी और पीएमएलए उल्लंघन |
| बैंक डिफॉल्ट | आईडीबीआई बैंक को 526 करोड़ रुपये का नुकसान |
जेपी इंफ्राटेक की वित्तीय स्थिति पहले से ही कमजोर थी। 2021 में एनसीएलटी ने कंपनी को दिवालिया घोषित कर दिया, और 2023 में मुंबई की सुरक्षित ग्रुप ने इसे 3,000 करोड़ रुपये में अधिग्रहित किया। हालांकि, अधिग्रहण के बावजूद घर खरीददारों की शिकायतें बनी हुई हैं, और ईडी की जांच में प्रमोटरों की भूमिका पर सवाल उठे हैं।
छापेमारी और जब्त सामग्री: सबूतों की बरामदगी
ईडी की मई 2025 की छापेमारी में न केवल जेपी समूह के कार्यालयों को निशाना बनाया गया, बल्कि प्रमुख सहयोगी कंपनियों जैसे गौरसॉन्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, गुलशन होम्स प्राइवेट लिमिटेड और महागुन रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड के दफ्तरों पर भी तलाशी ली गई। इन छापों से:
- नकद जब्ती: 1.7 करोड़ रुपये।
- दस्तावेज: वित्तीय रिकॉर्ड, बैंक स्टेटमेंट और लेन-देन के प्रमाण।
- डिजिटल डेटा: कंप्यूटर और मोबाइल से रिकवर की गई फाइलें, जो फंड ट्रांसफर को दर्शाती हैं।
- संपत्ति रिकॉर्ड: प्रमोटर परिवारों और समूह कंपनियों के नाम पर रजिस्टर्ड प्रॉपर्टी दस्तावेज।
ये सामग्री ईडी के आरोपों को मजबूत करती हैं कि फंड्स को जानबूझकर डायवर्ट किया गया, ताकि घर खरीददारों को चूना लगाया जा सके। जांच में पाया गया कि जेपी समूह ने खरीददारों को आकर्षित करने के लिए झूठे वादे किए, जैसे समय पर कब्जा और आधुनिक सुविधाएं, लेकिन वास्तव में धन का उपयोग कर्ज चुकाने या अन्य व्यवसायों में किया गया।
कानूनी प्रक्रिया और अगले कदम:
मनोज गौर को पीएमएलए की धारा 19 के तहत गिरफ्तार किया गया, जो मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में हिरासत की अनुमति देती है। अदालत ने 14 दिनों की रिमांड मंजूर की है, जिसमें ईडी उनसे और गहन पूछताछ करेगी। मामला नोएडा पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (जालसाजी) और अन्य प्रावधान शामिल हैं। ईडी अब जेपी समूह के अन्य अधिकारियों, जैसे जेपी एसोसिएट्स के चेयरमैन मनोज गौर के भाई और वित्तीय सलाहकारों को निशाना बना सकती है।
एनसीएलटी की कार्यवाही में भी ईडी की रिपोर्ट शामिल की जाएगी, जो दिवालिया संपत्तियों के वितरण को प्रभावित करेगी। घर खरीददार संगठनों ने स्वागत किया है, लेकिन मांग की है कि रिफंड प्रक्रिया तेज की जाए।
प्रभावित पक्षों की प्रतिक्रियाएं:
- घर खरीददार: नोएडा के एक प्रभावित खरीददार, राजेश कुमार ने कहा, “हम 10 साल से फ्लैट का इंतजार कर रहे हैं। गौर की गिरफ्तारी न्याय की पहली किरण है, लेकिन हमारी राशि कब लौटेगी?”
- जेपी समूह: कंपनी ने कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया, लेकिन स्रोतों के अनुसार, वे कानूनी सहायता ले रहे हैं।
- विशेषज्ञ: रियल एस्टेट विशेषज्ञ अजय अग्रवाल ने कहा, “यह गिरफ्तारी रियल्टी क्षेत्र में पारदर्शिता लाने का संकेत है। डेवलपर्स को अब खरीददारों के फंड्स का सख्ती से उपयोग करना होगा।”
- सरकारी पक्ष: वित्त मंत्रालय ने कहा, “ईडी भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई जारी रखेगी।”
रियल एस्टेट में विश्वास बहाली की जरूरत:
यह गिरफ्तारी जेपी इंफ्राटेक घोटाले में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जो हजारों मध्यम वर्गीय परिवारों की जिंदगी बर्बाद करने वाली साजिश को उजागर करती है। 12,000 करोड़ रुपये का यह मामला न केवल वित्तीय अपराध का उदाहरण है, बल्कि रेगुलेटरी ढांचे की कमजोरियों को भी दर्शाता है। ईडी की जांच से आशा है कि दोषियों को सजा मिलेगी और प्रभावितों को न्याय। सरकार को अब रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट (रेरा) को और मजबूत करने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में ऐसे धोखे न हों। घर खरीददारों के लिए यह संदेश स्पष्ट है—सतर्क रहें और कानूनी सहायता लें।
