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By: Ravindra Sikarwar

ग्वालियर की विशेष अदालत ने बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से संबंधित एक संवेदनशील मामले में सख्त रुख अपनाते हुए आरोपी को लंबी कैद की सजा सुनाई है। यह फैसला न केवल पीड़िता को न्याय प्रदान करता है, बल्कि समाज में ऐसे जघन्य अपराधों के खिलाफ एक मजबूत संदेश भी देता है। अदालत ने पीड़ित बच्ची के पुनर्वास और सहायता पर भी विशेष ध्यान दिया, जो ऐसे मामलों में दुर्लभ लेकिन सराहनीय कदम है।

मामले की पृष्ठभूमि
यह घटना ग्वालियर शहर से जुड़ी हुई है, जहां एक सात वर्षीय मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म करने का प्रयास किया गया था। आरोपी की उम्र लगभग 60 वर्ष बताई जा रही है, जिसका नाम सुलेमान खान है। यह मामला कुछ समय पहले दर्ज किया गया था और पुलिस जांच के बाद विशेष सत्र न्यायालय में विचार के लिए आया। बच्ची की उम्र को देखते हुए यह मामला पॉक्सो एक्ट (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेज एक्ट) के तहत दर्ज किया गया, जो नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों पर सख्त प्रावधान रखता है।

घटना के समय बच्ची अकेली थी और आरोपी ने मौके का फायदा उठाने की कोशिश की। हालांकि, दुष्कर्म का पूरा प्रयास सफल नहीं हुआ, लेकिन यह प्रयास ही इतना गंभीर था कि अदालत ने इसे गंभीरता से लिया। पीड़िता के परिवार ने तुरंत पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद जांच शुरू हुई। मेडिकल परीक्षण और अन्य सबूतों ने आरोपी की संलिप्तता को पुष्ट किया।

अदालत का फैसला और सजा के प्रावधान
ग्वालियर के विशेष सत्र न्यायालय ने लंबी सुनवाई के बाद आरोपी सुलेमान खान को दोषी करार दिया। अदालत ने उसे 20 वर्ष की कठोर कैद की सजा सुनाई, जो ऐसे मामलों में न्यूनतम सजा से काफी अधिक है। पॉक्सो एक्ट के तहत दुष्कर्म के प्रयास में भी कड़ी सजा का प्रावधान है, और न्यायाधीश ने अपराध की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया।

इसके अलावा, अदालत ने आरोपी पर 1500 रुपये का जुर्माना भी लगाया। हालांकि जुर्माने की राशि कम लग सकती है, लेकिन अदालत का मुख्य फोकस पीड़िता की सहायता पर था। न्यायालय ने निर्देश दिए कि पीड़िता को राज्य की प्रतिकर योजना के तहत 2 लाख रुपये की आर्थिक मदद प्रदान की जाए। यह राशि बच्ची के इलाज, शिक्षा और पुनर्वास में उपयोग की जाएगी। ऐसे निर्देश ऐसे मामलों में पीड़ितों को मजबूती प्रदान करते हैं, क्योंकि अक्सर परिवार आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं और लंबी कानूनी लड़ाई से थक जाते हैं।

अपराध की गंभीरता और सामाजिक प्रभाव
बच्चों के खिलाफ यौन अपराध समाज की सबसे बड़ी बुराइयों में से एक हैं। एक सात साल की बच्ची के साथ ऐसा प्रयास न केवल शारीरिक रूप से घातक है, बल्कि मानसिक रूप से भी जीवनभर का आघात पहुंचाता है। आरोपी की उम्र 60 वर्ष होने के बावजूद उसने कोई संवेदना नहीं दिखाई, जो समाज में नैतिक पतन का संकेत है। ऐसे मामले बढ़ रहे हैं, और अदालतों का सख्त रुख जरूरी है ताकि अपराधियों में डर पैदा हो।

पॉक्सो एक्ट 2012 में लागू होने के बाद से ऐसे मामलों में तेज सुनवाई और कड़ी सजाओं का प्रावधान है। ग्वालियर अदालत का यह फैसला अन्य अदालतों के लिए भी मिसाल बन सकता है। विशेष रूप से, पीड़िता को 2 लाख रुपये की सहायता का निर्देश दिखाता है कि न्याय केवल सजा तक सीमित नहीं है, बल्कि पीड़ित के पुनरुत्थान तक जाता है।

पीड़िता और परिवार की स्थिति
पीड़िता बच्ची अब सुरक्षित है और परिवार के साथ रह रही है। घटना के बाद बच्ची को मनोवैज्ञानिक सहायता की जरूरत थी, जिसके लिए सरकारी योजनाओं का सहारा लिया गया। प्रतिकर राशि से बच्ची की शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जा सकेगा। ऐसे मामलों में परिवार अक्सर सामाजिक कलंक से जूझता है, लेकिन न्याय मिलने से उन्हें कुछ राहत जरूर मिलती है।

न्याय की जीत
यह फैसला बच्चों की सुरक्षा के प्रति समाज और न्याय व्यवस्था की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। ग्वालियर की यह अदालत ने साबित कर दिया कि उम्र या परिस्थिति चाहे जो भी हों, अपराधी को सजा मिलनी ही चाहिए। उम्मीद है कि ऐसे फैसले अपराधों को रोकने में मदद करेंगे और पीड़ितों को मजबूत बनाएंगे। समाज को भी जागरूक होना होगा ताकि बच्चे सुरक्षित रहें।

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