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By: Ravindra Sikarwar

मध्य प्रदेश में परिवहन विभाग द्वारा लागू की गई ड्राइविंग लाइसेंस और वाहन पंजीयन की ई-कार्ड प्रणाली पूरी तरह सफल साबित हुई है। पिछले साल 1 अक्टूबर 2024 से प्लास्टिक कार्ड की छपाई बंद करने के बाद भी एक भी शिकायत दर्ज नहीं हुई। फिर भी विभाग अब फिर से पुरानी व्यवस्था बहाल करने की तैयारी में है, जबकि अन्य राज्यों ने इसी मॉडल को अपनाकर जनता को आर्थिक राहत प्रदान की है। यह स्थिति सवाल उठाती है कि तकनीकी प्रगति के बावजूद आम नागरिकों को क्यों लाभ नहीं पहुंचाया जा रहा।

ई-कार्ड व्यवस्था की सफलता और कोई शिकायत नहीं
परिवहन विभाग ने राजस्थान, केरल सहित कई अन्य राज्यों के मॉडल को देखते हुए ई-कार्ड को वैधानिक मान्यता दी थी। अधिसूचना जारी कर प्लास्टिक कार्ड की छपाई बंद कर दी गई और डिजिटल संस्करण को पूरी तरह कानूनी दर्जा प्रदान किया गया। परिवहन आयुक्त कार्यालय के अनुसार, इस बदलाव के बाद प्रदेश में एक भी मामला ऐसा सामने नहीं आया, जिसमें ई-कार्ड के कारण किसी व्यक्ति को असुविधा हुई हो या पुलिस-प्रशासन ने इसे अस्वीकार किया हो। ट्रैफिक चेकिंग से लेकर अन्य औपचारिकताओं में ई-कार्ड पूरी तरह स्वीकार्य रहा है। यह डिजिटल इंडिया की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था, जिसे विभाग खुद सफल मानता है।

फीस वसूली जारी, लेकिन कार्ड नहीं दिए गए
सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि ई-कार्ड लागू होने के बावजूद विभाग नए लाइसेंस और वाहन पंजीयन के लिए 200 रुपये प्रति कार्ड की फीस लेना बंद नहीं किया। प्रदेश में हर महीने औसतन तीन लाख नए लाइसेंस और वाहन पंजीयन होते हैं, जिससे विभाग को करीब छह करोड़ रुपये की मासिक आय हो रही है। कुल मिलाकर प्रति आवेदन 274 रुपये का शुल्क लिया जा रहा है, जिसमें कार्ड फीस शामिल है। लेकिन इनमें से किसी भी आवेदक को प्लास्टिक कार्ड जारी नहीं किया गया। ऑनलाइन भुगतान की सुविधा होने के बावजूद यह वसूली जारी है, जबकि मुख्यमंत्री की मंशा जनता को इस बोझ से राहत देने की थी।

अन्य राज्यों का उदाहरण और मध्य प्रदेश का अंतर
राजस्थान और केरल जैसे राज्यों में ई-कार्ड व्यवस्था लागू करने के साथ ही कार्ड फीस को पूरी तरह समाप्त या काफी कम कर दिया गया। वहां नागरिकों को डिजिटल कार्ड मुफ्त उपलब्ध कराया जाता है और प्लास्टिक कार्ड की जरूरत ही नहीं पड़ती। मध्य प्रदेश में भी शुरुआती फैसला मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सहमति से लिया गया था, जिसमें सफलता मिलने पर फीस में राहत देने का आश्वासन था। एक सेवानिवृत्त अधिकारी ने बताया कि उस समय यह स्पष्ट किया गया था कि यदि व्यवस्था सुचारु रही तो जनता को आर्थिक लाभ दिया जाएगा। लेकिन अब विभाग राजस्व के इस स्रोत को छोड़ने को तैयार नहीं दिखता।

छपाई फिर शुरू करने का प्रस्ताव और बजट प्रावधान
परिवहन आयुक्त कार्यालय ने शासन को प्रस्ताव भेजा है कि प्लास्टिक कार्ड की छपाई दोबारा शुरू की जाए। इसके लिए 30 करोड़ रुपये का बजट भी रखा गया है। विभाग का तर्क है कि कुछ लोग प्लास्टिक कार्ड की मांग करते हैं और जल्द ही पुराने आवेदनों के कार्ड छापकर वितरित किए जाएंगे। साथ ही फीस में राहत देने का आश्वासन भी दिया गया है। हालांकि, यह कदम डिजिटल प्रगति की दिशा में पीछे लौटने जैसा लगता है। विधानसभा में भी इस मुद्दे पर विधायकों ने सवाल उठाए हैं कि जब बिना कार्ड के काम चल रहा है तो फीस क्यों वसूली जा रही और अगर फीस ली गई तो कार्ड क्यों नहीं दिए गए।

जनता की जेब पर बोझ और पारदर्शिता की जरूरत
यह पूरा मामला विभागीय राजस्व संग्रह की प्राथमिकता और जनहित के बीच टकराव को दर्शाता है। जहां एक ओर डिजिटल व्यवस्था ने कागज और प्लास्टिक की बचत की, वहीं दूसरी ओर लाखों नागरिकों से अनावश्यक शुल्क वसूला जा रहा है। यदि फीस में राहत दी जाती तो मासिक राजस्व ग्राफ प्रभावित होता, जिससे अधिकारियों को शासन के सामने जवाबदेही का सामना करना पड़ता। विशेषज्ञों का मानना है कि ई-कार्ड को पूरी तरह मुफ्त या न्यूनतम शुल्क पर उपलब्ध कराकर जनता को वास्तविक लाभ दिया जाना चाहिए।

मध्य प्रदेश में यह व्यवस्था तकनीकी रूप से सफल रही, लेकिन जनता को आर्थिक राहत न मिलना अफसोसजनक है। उम्मीद है कि शासन स्तर पर इस प्रस्ताव की समीक्षा होगी और डिजिटल प्रगति के साथ जनहित को प्राथमिकता दी जाएगी।

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