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By: Ravindra Sikarwar

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता पर हुए हमले का सच किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। 41 वर्षीय राजेश सकारिया, जो गुजरात के राजकोट का निवासी है, 20 अगस्त 2025 को दिल्ली सरकार की जनसुनवाई में अचानक मुख्यमंत्री पर टूट पड़ा था। लेकिन दिल्ली पुलिस द्वारा तीस हजारी कोर्ट में दायर 429 पन्नों की चार्जशीट बताती है कि यह घटना आकस्मिक नहीं थी—यह एक मानसिक उथल-पुथल, धार्मिक संकेतों की गलत व्याख्या और सोशल मीडिया से उपजी आक्रामकता का खतरनाक मिश्रण था। चार्जशीट में राजेश का वह बयान भी शामिल है जिसमें उसने दावा किया कि इस पूरी घटना की शुरुआत एक “सपने” से हुई थी। उसके मुताबिक, एक रात उसने अपने मंदिर में शिवलिंग के पास खड़े एक कुत्ते को देखा, जो उससे कह रहा था कि “दिल्ली में कुत्ते बहुत पीड़ा झेल रहे हैं।” यह सपना ही उसके लिए एक कथित ‘दैवी संदेश’ बन गया।

राजेश पहले भी ऐसी हरकतें कर चुका था। मई 2025 में वह अयोध्या में बंदरों को लेकर भूख हड़ताल पर बैठ गया था और एक विवाद के बाद पुलिस ने उसे हिरासत में लिया था। उसकी माँ के अनुसार, उसे आवारा जानवरों से गहरा लगाव था और मानसिक तनाव भी रहता था। परिवार का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले ने उसे झकझोर दिया था जिसमें NCR के आवारा कुत्तों को स्थायी शेल्टर में ले जाने का निर्देश दिया गया था—हालाँकि बाद में यह फैसला वापस ले लिया गया। सोशल मीडिया पर फैले उन वीडियो ने भी उसकी सोच को प्रभावित किया, जिनमें कुछ लोग दिल्ली में कुत्तों को कथित तौर पर नुकसान पहुँचाए जाने के खिलाफ विरोध कर रहे थे और इसके लिए मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को जिम्मेदार ठहरा रहे थे। चार्जशीट में लिखा है कि इन वीडियो को देखने के बाद वह और अधिक उग्र हो गया और दिल्ली आने का निर्णय लिया।

दिल्ली आने से पहले वह उज्जैन गया, जहाँ उसने ‘महाकाल’ से अनुमति लेने की एक अनोखी प्रक्रिया अपनाई। उसने दो पर्चियाँ बनाई—एक पर ‘हां’ और दूसरी पर ‘ना’ लिखकर मंदिर में चढ़ाई। वह मानता है कि जो पर्ची उठेगी वही देवता का आदेश होगा। उसके मुताबिक, जब उसने पर्ची उठाई तो उस पर ‘हां’ लिखा था, जिसे उसने दिल्ली जाकर भूख हड़ताल करने और “जरूरत पड़े तो किसी को भी नुकसान पहुँचाने” की अनुमति मान लिया। पैसे न होने पर पत्नी ने उसकी मदद करने से इनकार कर दिया, लेकिन उसके दोस्त तहसीन रजा ने उसे ₹2,000 भेज दिए। यही रकम लेकर वह दिल्ली पहुँच गया। कश्मीरी गेट के पास उसने एक फल बेचने वाले से चाकू उठाया और गुजराती समाज धर्मशाला में ठहर गया। अगले दिन जब उसने मुख्यमंत्री की सभा के आसपास भारी पुलिस बल देखा, तो उसने चाकू फेंक दिया, लेकिन अपने इरादों से नहीं डिगा।

20 अगस्त की सुबह करीब 8:45 बजे उसे जनसुनवाई सदन में सीएम के करीब जाने का मौका मिला। चार्जशीट के अनुसार, उसने पहले उनसे कहा कि “कुत्तों पर प्रतिबंध गलत है और इसके परिणाम भुगतने होंगे।” इसके बाद वह अचानक उन पर हमला करने लगा—पहले थप्पड़ मारे, फिर बाल पकड़कर जमीन पर गिराया और पूरे जोर से उनकी गर्दन दबाने लगा। उसके शब्द थे—“मैं तुम्हें जिंदा नहीं छोड़ूंगा।” पुलिस सुरक्षा अधिकारियों ने तुरंत कार्रवाई न की होती तो सीएम की जान जा सकती थी। विशेष लोक अभियोजक प्रदीप राणा ने अदालत में कहा कि यह कोई भावनात्मक उबाल नहीं था, बल्कि पहले से बनी हुई योजना थी। चार्जशीट के अनुसार, आरोपी शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट परिसर में कुछ गड़बड़ी करने की योजना बना रहा था, लेकिन सुरक्षा देखकर उसने उसे छोड़ दिया और जनसुनवाई को निशाना चुना।

इस घटना ने न केवल दिल्ली की राजनीति बल्कि सुरक्षा व्यवस्था को भी झकझोर दिया। चार्जशीट इस बात को स्पष्ट करती है कि राजेश सकारिया के कदम पूरी तरह से एक भ्रमित मानसिकता और सोशल मीडिया से प्रेरित उग्रता का परिणाम थे। सपना, पर्ची, ‘दैवी आदेश’ और जानवरों के प्रति अतिशय भावनात्मक लगाव ने उसे एक हिंसक रास्ते पर ढकेल दिया। अदालत में चल रही सुनवाई अब यह तय करेगी कि यह घटना केवल व्यक्तिगत विक्षिप्तता का मामला है या इसके पीछे कोई और बड़ी साजिश छिपी हुई है।

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