by-Ravindra Sikarwar
भारत की राजधानी नई दिल्ली से एक ऐसा बयान आया है, जो क्षेत्रीय राजनीति में भूचाल ला सकता है। तालिबान शासित अफगानिस्तान के विदेश मंत्री मौलवी आमिर खान मुत्तकी ने पाकिस्तान को सख्त लहजे में चेतावनी दी है कि अफगान लोगों के हौसले की परीक्षा लेने की कोशिश न की जाए। यह बयान पाकिस्तान द्वारा हाल ही में अफगान सीमा पर किए गए हमलों के जवाब में आया है, जिसमें तेहरिक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के कैंपों को निशाना बनाया गया था। मुत्तकी का यह संदेश भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ बैठक के तुरंत बाद जारी किया गया, जो अफगानिस्तान-भारत संबंधों में नई गर्मजोशी का संकेत देता है। इस घटना ने न केवल अफगान-पाक तनाव को उजागर किया है, बल्कि भारत को क्षेत्रीय स्थिरता में मजबूत भूमिका निभाने का अवसर भी प्रदान किया है। आइए, इस पूरे घटनाक्रम को विस्तार से समझते हैं।
पाकिस्तान के हमलों ने बढ़ाया तनाव: सीमा पर हुई घटना का पूरा विवरण
पिछले कुछ दिनों से अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं। पाकिस्तान ने दावा किया है कि अफगान मिट्टी का इस्तेमाल आतंकवादी संगठनों द्वारा उसके खिलाफ हमलों के लिए किया जा रहा है। इसी क्रम में, इस्लामाबाद ने काबुल के पास सीमावर्ती इलाकों में टीटीपी के कैंपों पर हवाई हमले किए। पाकिस्तानी अधिकारियों ने कहा कि उनकी ‘धैर्य की सीमा’ पार हो चुकी है और ये कार्रवाई आत्मरक्षा में की गई है। इन हमलों में कई निर्दोष अफगान नागरिकों को नुकसान पहुंचा, जिससे काबुल में गुस्सा भड़क उठा।
अफगानिस्तान ने इन हमलों को ‘अवैध और आक्रामक’ करार दिया है। तालिबान सरकार का मानना है कि 40 वर्षों के संघर्ष के बाद देश में शांति और प्रगति की राह पर आखिरकार कदम बढ़ा है, और ऐसी कार्रवाइयां इस प्रक्रिया को बाधित करती हैं। मुत्तकी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पाकिस्तान की यह रणनीति गलत है और इससे समस्याओं का समाधान नहीं निकलेगा। उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए चेतावनी दी कि जो भी अफगानिस्तान के साथ ‘खेल’ खेलने की सोचे, वह सोवियत संघ, अमेरिका और नाटो जैसे शक्तियों से सीख ले। इन ताकतों ने भी अफगान मिट्टी पर कब्जा करने की कोशिश की थी, लेकिन अंत में असफल हो गईं। मुत्तकी का यह बयान न केवल पाकिस्तान के लिए बल्कि क्षेत्रीय शक्तियों के लिए एक संदेश है कि अफगानिस्तान अब कमजोर नहीं रहा।
भारत-अफगानिस्तान बैठक: जयशंकर-मुत्तकी वार्ता के प्रमुख बिंदु
मुत्तकी का यह दौरा अफगानिस्तान के विदेश मंत्री के रूप में उनका भारत का पहला आधिकारिक दौरा था। 10 अक्टूबर को नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ उनकी बैठक हुई, जो 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद पहली उच्च स्तरीय चर्चा थी। बैठक के दौरान दोनों पक्षों ने सुरक्षा सहयोग, क्षेत्रीय स्थिरता और द्विपक्षीय व्यापार पर विस्तृत बातचीत की। जयशंकर ने कहा कि भारत और अफगानिस्तान विकास और समृद्धि के प्रति प्रतिबद्ध हैं, लेकिन सीमा-पार आतंकवाद दोनों देशों के लिए साझा खतरा है। उन्होंने जोर दिया कि आतंकवाद के हर रूप का मुकाबला करने के लिए समन्वित प्रयास जरूरी हैं।
बैठक के सकारात्मक परिणामों में भारत ने काबुल में अपनी तकनीकी मिशन को पूर्ण राजदूत स्तर के दूतावास में अपग्रेड करने की घोषणा की। इसके अलावा, मानवीय और स्वास्थ्य सहायता को बढ़ाया जाएगा, जिसमें छह नई परियोजनाएं, 20 एम्बुलेंस वाहन, एमआरआई और सीटी स्कैन मशीनें, टीके, कैंसर दवाएं और संयुक्त राष्ट्र ड्रग्स एंड क्राइम कार्यालय के माध्यम से नशीली दवाओं की पुनर्वास सुविधाएं शामिल हैं। जयशंकर ने प्रतीकात्मक रूप से मुत्तकी को पांच एम्बुलेंस सौंपे। दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार की बाधाओं को दूर करने के लिए संयुक्त व्यापार समिति गठित करने पर सहमति जताई। मुत्तकी ने भारत की इस पहल का स्वागत किया और कहा कि अफगानिस्तान सभी देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना चाहता है, जिसमें भारत को मजबूत साझेदार के रूप में देखा जाता है।
मुत्तकी के प्रमुख बयान: पाकिस्तान को खरी-खरी सुनाई
बैठक के बाद प्रेस ब्रीफिंग में मुत्तकी ने पाकिस्तान पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने कहा, “सीमा के पास दूरदराज इलाकों में हमला हुआ है। हम पाकिस्तान की इस कार्रवाई को गलत मानते हैं। अफगानिस्तान ने 40 वर्षों के बाद शांति और विकास की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। अफगानों का साहस परखने की कोशिश न की जाए। अगर कोई ऐसा करना चाहता है, तो सोवियत संघ, अमेरिका और नाटो से पूछ ले, ताकि वे बता सकें कि अफगानिस्तान के साथ खेलना ठीक नहीं।” उन्होंने आगे चेतावनी दी, “पाकिस्तान सरकार को सलाह है कि ऐसी रणनीति से मुद्दों का हल नहीं निकलेगा। हम अफगान मिट्टी का किसी भी देश के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होने देंगे। दोनों पक्ष इस मुद्दे पर संपर्क में रहेंगे।”
मुत्तकी ने पाकिस्तान के हमलों की निंदा करते हुए कहा कि अफगान लोगों की सहनशीलता और हिम्मत को चुनौती न दी जाए। उन्होंने जोर दिया कि शांति एकतरफा दृष्टिकोण से हासिल नहीं की जा सकती और तालिबान क्षेत्रीय सहयोग में रुचि रखता है। यह बयान भारत की मिट्टी से जारी होना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पाकिस्तान के लिए अप्रत्यक्ष संदेश भी देता है कि अफगानिस्तान अब अकेला नहीं है।
क्षेत्रीय प्रभाव: भारत के लिए नया अवसर, पाकिस्तान के लिए चुनौती
यह घटना अफगान-पाकिस्तान संबंधों में आई दरार को उजागर करती है, जहां सीमा-पार आतंकवाद लंबे समय से विवाद का कारण रहा है। पाकिस्तान अफगानिस्तान पर आतंकियों को पनाह देने का आरोप लगाता रहा है, जबकि काबुल इसे पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का जवाब मानता है। भारत के लिए यह स्थिति फायदेमंद साबित हो रही है। भारत ने अफगानिस्तान में 3 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है, जिसमें मानवीय सहायता, विकास परियोजनाएं और पुनर्निर्माण शामिल हैं। तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता न देने के बावजूद, भारत ने व्यावहारिक सहयोग जारी रखा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मुत्तकी का दौरा भारत-अफगानिस्तान संबंधों में नया अध्याय खोल सकता है। यह न केवल आर्थिक सहयोग बढ़ाएगा, बल्कि सुरक्षा मुद्दों पर भी साझा रुख अपनाने में मदद करेगा। दूसरी ओर, पाकिस्तान के लिए यह चेतावनी एक झटका है, क्योंकि इससे इस्लामाबाद की क्षेत्रीय रणनीति पर सवाल उठते हैं। अफगानिस्तान ने स्पष्ट किया है कि वह शांति चाहता है, लेकिन अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाएगा।
भविष्य की संभावनाएं: क्षेत्रीय शांति के लिए क्या?
यह घटना दक्षिण एशिया में शांति प्रयासों के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। भारत ने हमेशा अफगानिस्तान की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और स्वतंत्रता का समर्थन किया है। जयशंकर ने बैठक में कहा, “हमारी निकट सहयोग अफगानिस्तान के राष्ट्रीय विकास के साथ-साथ क्षेत्रीय स्थिरता और लचीलापन बढ़ाने में योगदान देगा।” मुत्तकी ने भी भारत के साथ संबंधों को मजबूत करने की इच्छा जताई। अब सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान इस चेतावनी को गंभीरता से लेगा या तनाव और बढ़ेगा। क्षेत्रीय शक्तियों को संवाद की राह अपनानी होगी, ताकि आतंकवाद और सीमा विवादों का अंत हो सके। अफगानिस्तान का यह साहसी रुख न केवल तालिबान सरकार की मजबूती दिखाता है, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक सबक भी है कि हस्तक्षेप कभी सफल नहीं होता।
