Spread the love

By: Ravindra Sikarwar

भारतीय परिवार कानून में एक बड़ा बदलाव आया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में स्पष्ट किया है कि आपसी सहमति से तलाक (म्यूचुअल कंसेंट डिवोर्स) लेने के लिए पति-पत्नी का कम से कम एक साल तक अलग-अलग रहना अनिवार्य नहीं है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13बी(1) में यह प्रावधान है, लेकिन कोर्ट ने इसे निर्देशात्मक (डायरेक्टरी) बताया, न कि बाध्यकारी (मैंडेटरी)। इसका मतलब है कि विशेष परिस्थितियों में इस शर्त को माफ किया जा सकता है, जिससे कई जोड़ों को लंबी प्रतीक्षा से राहत मिलेगी।

यह फैसला दिल्ली हाईकोर्ट की तीन जजों की पूर्ण पीठ ने दिया, जिसमें जस्टिस नवीन चावला, अनुप जयराम भंबानी और रेणु भटनागर शामिल थे। कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या अदालत को ऐसे जोड़ों को जबरन वैवाहिक रिश्ते में बांधे रखना चाहिए जो पहले से ही अलग होने का मन बना चुके हैं? कोर्ट का कहना था कि अनिच्छुक पक्षों को वैवाहिक सुख की जगह वैवाहिक गर्त में धकेलना उचित नहीं। यह फैसला उन मामलों में राहत देगा जहां विवाह पूरी तरह टूट चुका है, लेकिन कानूनी शर्तें पूरी नहीं हो पातीं।

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13बी आपसी सहमति से तलाक का प्रावधान करती है। इसके तहत पहली याचिका (फर्स्ट मोशन) दाखिल करने से पहले दंपति को कम से कम एक साल अलग रहना होता है। इसके बाद दूसरी याचिका (सेकंड मोशन) के लिए छह महीने की कूलिंग-ऑफ पीरियड होती है। पहले यह माना जाता था कि एक साल की अलगाव अवधि सख्त है, लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 13बी(1) को धारा 14(1) के साथ मिलाकर पढ़ा जाना चाहिए। धारा 14(1) में असाधारण कठिनाई या दुर्व्यवहार के मामलों में प्रतीक्षा अवधि माफ करने का अधिकार है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक साल की अवधि और छह महीने की कूलिंग-ऑफ अवधि अलग-अलग हैं। एक को माफ करने से दूसरी अपने आप माफ नहीं हो जाती। अगर दोनों अवधियां माफ करने लायक हैं, तो तलाक की डिक्री तुरंत प्रभावी हो सकती है। हालांकि, यह छूट हर मामले में नहीं मिलेगी। केवल असाधारण कठिनाई या गंभीर दुर्व्यवहार साबित होने पर ही कोर्ट इसे मंजूर करेगा। कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर छूट लेने के लिए गलत जानकारी दी गई, तो याचिका खारिज हो सकती है या बाद में रद्द की जा सकती है।

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पहले कई जोड़े एक साल की अवधि पूरी करने के लिए मजबूरन इंतजार करते थे, भले ही उनका रिश्ता पूरी तरह खत्म हो चुका हो। अब परिवार अदालतें या हाईकोर्ट विशेष मामलों में छूट दे सकती हैं। कोर्ट ने कहा कि विवाह समाज और संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन जब दोनों पक्ष अलग होना चाहते हैं, तो सामाजिक मान्यताओं को व्यक्तिगत स्वायत्तता पर हावी नहीं होने देना चाहिए। टूटे रिश्ते को जबरन जोड़े रखना दोनों पक्षों के लिए मानसिक और भावनात्मक पीड़ा का कारण बनता है।

पहले सुप्रीम कोर्ट ने छह महीने की कूलिंग-ऑफ अवधि को माफ करने का अधिकार दिया था, जैसे अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर मामले में। अब दिल्ली हाईकोर्ट ने एक साल की अलगाव अवधि पर भी छूट की राह खोली है। इससे उन जोड़ों को फायदा होगा जो जल्दी अलग होना चाहते हैं, खासकर जहां बच्चे नहीं हैं या संपत्ति-गुजारे जैसे मुद्दे पहले ही सुलझ चुके हैं।

समाजशास्त्री मानते हैं कि यह फैसला आधुनिक भारत की जरूरतों के अनुरूप है। आजकल विवाह टूटने के मामले बढ़ रहे हैं, और लंबी कानूनी प्रक्रिया दोनों पक्षों को और पीड़ा देती है। हालांकि, कुछ लोग इसे चिंता की नजर से देखते हैं कि कहीं यह तलाक को बहुत आसान न बना दे। कोर्ट ने खुद कहा कि छूट सामान्य नहीं होगी, बल्कि केवल योग्य मामलों में।

यह फैसला अन्य हाईकोर्ट्स और परिवार अदालतों के लिए मार्गदर्शक बनेगा। अब जोड़े अगर असाधारण परिस्थितियां साबित कर सकें, तो एक साल का इंतजार किए बिना आपसी सहमति से तलाक ले सकते हैं। इससे न केवल समय बचेगा, बल्कि भावनात्मक बोझ भी कम होगा। भारतीय न्याय व्यवस्था एक बार फिर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करने की दिशा में आगे बढ़ी है।

अंत में, यह याद रखना जरूरी है कि विवाह एक पवित्र बंधन है, लेकिन जब वह बोझ बन जाए, तो अलग होना दोनों के हित में होता है। यह फैसला उन लाखों जोड़ों के लिए उम्मीद की किरण है जो कानूनी जंजाल में फंसे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

× Whatsapp